इक आवारा तितली सी मैं
उड़ती फिरती थी सड़कों पे…
दौड़ा करती थी राहों पे
इक चंचल हिरनी के जैसे …
इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ
बेपरवाह घूमा करती थी…
कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के
पत्ते चूमा करती थी…
चलते चलते यूँ ही लब पर
जो गीत मधुर आ जाता था…
बदरंग हवाओं में जैसे
सुख का मंजर छा जाता था…
बीते पल की यादों से फिर
मैं मन ही मन भरमाती थी…
इठलाती थी बलखाती थी
लहराती फिर सकुचाती थी…
हैं आज कदम कुछ ठहरे से
गुमसुम से सहमे सहमे से…
डर डर के बढ़ते हैं ऐसे
जैसे निकले हों पहरे से…
ना गीत जुबां पर है कोई
ना जाम हैं शोखनिगहों के…
बस इक टक देखा करती हूँ
कंकड़ पत्थर इनराहों के…
हैं कदम बड़े डगमग डगमग
यूँ संभल-संभल के चलते हैं…
इन ऊँची नीची राहों पर
आगे बढ़ने से डरते हैं…
चलते-चलते रुक जाती हूँ
ना जाने क्या हो जाता है…
अधरों पे हँसी लिए ये मन
अंदर अंदर घबराता है…
सबको तो बहुत लुभाती हैं
पर मुझे सताती हैं हर पल…
पांवों में बेड़ी लगती हैं
ये ऊँची एड़ी की चप्पल….. !!
रक्षिता सिंह (दीपू), उझानी, बदायूं
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