New Delhi (Capital of India)। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह 11 बजे मन की बात की। रेडियो पर लोगों ने ध्यान लगाकर सुना। इस बार कोरोना, अक्षय तृतीय, किसान, पुलिस, आयुर्वेद, रमजान पर केन्द्रित रही मन की बात। उन्होंने नया नारा दिया- दो गज दूरी-बहुत है जरूरी। इस बार रमजान में अधिक इबादत करने की बात कही ताकि ईद तक पूरे विश्व से कोरोना समाप्त हो जाए।
जब पूरा विश्व इस महामारी के संकट से जूझ रहा है। भविष्य में जब इसकी चर्चा होगी, उसके तौर-तरीकों की चर्चा होगी, मुझे विश्वास है कि भारत की यह people driven लड़ाई की जरूर चर्चा होगी। आप सब लॉकडाउन में मन की बात सुन रहे हैं। इस समय फोन कॉल और लोगों की बातें बड़ी संख्या में मुझ तक पहुंच रही हैं। कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा पढ़ पाऊं और सुन सकूं। भारत जैसा विशाल देश, जो विकास के लिए प्रयत्नशील है, ग़रीबी से निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है। उसके पास CORONA से लड़ने और जीतने का यही एक तरीका है और हम भाग्यशाली हैं कि आज पूरा देश, देश का हर नागरिक, जन-जन इस लड़ाई का सिपाही है और लड़ाई का नेतृत्व कर रहा है।
हमारे किसान भाई-बहनों को ही देखिये – एक तरफ, वो, इस महामारी के बीच अपने खेतों में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और इस बात की भी चिंता कर रहे हैं कि देश में कोई भी भूखा ना सोये | हर कोई, अपने सामर्थ्य के हिसाब से, इस लड़ाई को लड़ रहा है| शहर हो या गाँव, ऐसा लग रहा है, जैसे देश में एक बहुत बड़ा महायज्ञ चल रहा है, जिसमें, हर कोई अपना योगदान देने के लिये आतुर है। ताली, थाली, दीया, मोमबत्ती, इन सारी चीज़ों ने जो भावनाओं को जन्म दिया, जिस ज़ज्बे से देशवासियों ने, कुछ-न-कुछ करने की ठान ली। हर किसी को इन बातों ने प्रेरित किया है|
गरीबों के लिए खाने से लेकर, राशन की व्यवस्था हो, Lockdown का पालन हो, अस्पतालों की व्यवस्था हो, Medical equipment का देश में ही निर्माण हो। आज पूरा देश, एक लक्ष्य, एक दिशा, साथ-साथ चल रहा है| जरूरतमंदों को खाना और दवा पहुंचा रही है। जिस तरह से पुलिस सामने आ रही है, उससे पुलिस का मानवीय पक्ष उभकर सामने आया है। हमारे दिल को छू लिया है।
प्रकृति, विकृति और संस्कृति को एकसाथ देखें तो जीवन का नया द्वार खुलता प्रतीत होगा। जो मेरा नहीं, उसे दूसरे से छीनकर उपयोग मे लाना विकृति कह सकते हैं। प्रकृति और विकृति से ऊपर कोई व्यवहार करता है, तो संस्कृति नजर आती है। अपने हक की चीज, जरूरी चीज की परवाह किए बिना किसी व्यक्ति की जरूरत को देखते हुए अपने हक के हिस्से को बांटना संस्कृति है। जब कसौटी का काल होता है तो इन गुणों का प्रदर्शन होता है। भारत ने अपनी सोच के अनुरूप हमारी संस्कृति का निर्वहन करते हुए फैसले लिए हैं। समृद्ध देशों के लिए भी दवाइयों का संकट रहा है। भारत ने अपनी संस्कृति के अनुरूप फैसला लिया। दुनियाभर की आ रही मानवता की रक्षा की पुकार पर भी पूरा ध्यान दिया। विश्व के हर जरूरतमंद तक दवाइयां पहुंचाने का बीड़ा उठाया। मानवता के काम को करके दिखाया। अनेक राष्ट्राध्यक्ष भारत की जनता का आभार जरूर प्रकट करते हैं।
दुनियाभर में भारत के आयुर्वेद को विशिष्ट भाव से देख रहे हैं। आयुष मंत्रालय ने इम्युनिटी बढाने के लिए जो प्रोटोकॉल दिया है, उसका पालन जरूर कर रहे होंगे। इसका फायदा होगा। कोई दूसरा देश जब हमारा फार्मूला हमें बताता है तो हाथोंहाथ ले लेते हैं। हमें अपनी ही शक्ति पर विश्वास नहीं होता है। भारत की युवा पीढ़ी को इस चुनौती को स्वीकार करना होगा। जैसे विश्व ने योग को सहजभाव किया है, वैसे ही हमरे हजारों वर्षों पुराने आयुर्वेद के सिद्धांतों को विश्व को अवश्य स्वीकार करना होगा। वैज्ञानिक भाषा में समझाना होगा।
कोविड-19 के कारण कई सकारात्मक बदलाव आए हैं। इस संकट ने कैसे अलग-अलग विषयों पर हमारी चेतना को जाग्रत किया है। मास्क पहनना भी हमारे जीवन का हिस्सा बन रहा है। हमें इसकी आदत कभी नहीं रही है। मास्क लगाने वाले भी बीमार नहीं होते हैं। एक जमाना था, जब कोई नागरिक फल खरीदता दिखता तो आसपास के लोग जरूर पूछते थे कि क्या घर में कोई बीमार है। ये धारणा समय के साथ बदल गई है। वैसे ही मास्क को लेकर धारणा बदलने वाली है। मास्क सभ्य समाज का प्रतिबिंब बन जाएगा। मेरा तो सिम्पल सुझाव है गमछा। लोग समझ रहे हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर थूकने का क्या परिणाम हो सकता है। अब थूकने की आदत छोड़ देनी चाहिए। ये आदतें कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद करेंगी।
सुखद संयोग है कि आज अक्षय तृतीय का पर्व भी है। जो कभी समाप्त न हो, वह अक्षय है। इस साल हमारे लिए विशेष महत्व है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी आत्मा और भावना अक्षय है। कठिनाइयों से जूझने की मानवीय भावनाएं अक्षय हैं। यही वह दिन है जिस दिन पांडवों को अक्षय पात्र मिला था। ऐसा बर्तन जिसमें भोजन कभी समाप्त नहीं होता है। हमारे अन्नदाता किसान इसी भावना से परिश्रम करते हैं। उन्हीं के परिश्रम से आज सबके लिए देश के पास अक्षय अन्न भंडार है। हमें अपने पर्यावरण, जंगल, नदियां, ईको सिस्टम के बारे में सोचना चाहिए। हम अक्षय रहना चाहते हैं तो हमारी धरती अक्षय रहे। जैन परम्परा में भी यह पवित्र दिन है। पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव भगवान के जीवन में महत्व है। हम सब मिलकर अपने प्रायसों से अपनी धरती को अक्षय और अविनाशी बनाने का संकल्प ले सकते हैं क्या। भगवान बसेश्वर की जयंती भी है आज।
रमजान का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। किसी ने सोचा नहीं था कि इस बार इतनी बड़ी मुसीबत का समान करना होगा। रमजान पर पहले से अधिक इबादत करें ताकि ईद आन से पहले दुनिया कोरोना से मुक्त हो जाए। कोरोना के खिलाफ चल रड़ी लड़ाई को और मजबूत करेंगे। सामाजिक दूरी का पालन बहुत आश्यक है। जो दो गज दूरी और घर से बाहर न निकलने को लेकर जागरूक कर रहे हैं, उनका आभार है। दुनियाभर में त्योहोरों को मनाने का ढंग बदल दिया है। हमारे यहां अनेक त्योहार आए और लोगों ने घर में रहकर सादगी के साथ समाज के शुभचिंतन के साथ मनाया। हर किसी ने संयम बरता। ईसाई दोस्तों ने ईस्टर भी घर पर मनाया।
वैश्विक महामारी के संकट के बीच परिवार का सदस्य के नाते संकेत और सुझाव मेरा दायित्व है। हम कतई अति आत्माविश्वास में न फँसें। ऐसा विचार न पाल लें कि हमारे यहां अभी तक कोरोना नहीं पहुंचा है तो पहुंचने वाला भी नहीं है। ऐसी गलती न करना। सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी। दो गज दूरी- बहुत है जरूरी।
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