लॉटरी के कारण वेश्या बन गई थी मां, बेटा अपने दोस्तों तक पहुंचा तो कर ली आत्महत्या, इसके बाद सपा नेता ने छेड़ा आंदोलन
पुराने लोग जानते हैं कि एक समय था देश भर में हर सड़क हर गली और हर बाजार मे लॉटरी बहुत बड़ा व्यवसाय बन गया था। परिवार के परिवार तबाह हो रहे थे । उसी दौर में मुझे कुछ घटनाएं पता लगी जिसमें से अभी सिर्फ एक का जिक्र कर दे रहा हूँ-
एक मध्यम वर्ग की महिला भी इसका शिकार हो गयी। हुआ ये कि वो घर का सामान लेने जाती और इस उम्मीद में लॉटरी का टिकट भी खरीद लेती कि शायद घर की हालात कुछ अच्छे हो जायें। उसकी एक बेटी थी शादी को। पति ने घर खर्च काट काट कर कुछ पैसा इकट्ठा किया था। धीरे-धीरे जुआरियों की तरह वो उस पैसे से भी ज्यादा टिकट खरीदने लगी और सब बर्बाद कर बैठी। फिर सब खत्म हो जाने पर परेशान रहने लगी। किसी दुकान पर उसकी किसी औरत से दोस्ती हो गयी थी और जब उसे समस्या का पता लगी तो उसने इस महिला को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया। अक्सर ये महिला आत्महत्या करने का सोचती थी। इसलिए उसने सारा ब्योरा और अपना गुनाह एक जगह लिख कर रख दिया कि उसकी मौत के लिए वो खुद जिम्मेदार है। दूसरे कागज पर अपने पति को सारी बात और अपना माफीनामा। वेश्यावृत्ति के चक्कर मे एक दिन वह जहां पहुंची वहां उसके खुद का बेटा और उसके दोस्त थे, जिन्होंने दलाल से उसे बुलवाया था। सामने बेटे को देखकर उसने आत्महत्या कर ली ।
कुछ और दर्दनाक घटनाएं हैं, जो मैं आत्मकथा में विस्तार से लिखूंगा। न जाने कितने लाख घर और लोग बर्बाद हुए, कितनों ने आत्महत्या कर ली। एक घटना मेरे संज्ञान में आई तो मेरी आत्मा ने धिक्कारा कि क्या सिर्फ जिन्दाबाद मुर्दाबाद ही राजनीति है या समाज के असली जहर के खिलाफ लड़ना। आलोक रंजन, जो उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव पद से रिटायर हुये हैं और अभी भी लखनऊ में है, वे आगरा में डीएम थे और बाबा हरदेव सिंह एडीएम सिटी। उत्तर प्रदेश में भाजपा की कल्याण सिंह की सरकार थी।
मैं अलोक रंजन से मिला और उनके सामने मैनें वो सारी घटनाएं रखीं और कहा कि मैं कम से कम अपने शहर में तो लॉटरी नहीं बिकने दूंगा। वे बोले कि सरकार के बड़े राजस्व का भी सवाल है और कानून व्यव्स्था का भी, पर नैतिक रूप से मैं आप की बात का समर्थन करता हूँ। बस एक प्रेस कांफ्रेंस और उसके बाद लॉटरी फाड़ो अभियान की शुरुआत हो गयी। उस वक्त की मीडिया ऐसी नहीं थी। सारे अखबारों ने रोज बड़ा कवरेज दिया। मेरा समाचार पूरे देश के एडिशन में छापा। मैंने आग्रह किया था कि ये देश भर में अभियान शायद बन जाए। हां, भारतीय जनता पार्टी पूरी ताकत से इस आन्दोलन के खिलाफ और लॉटरी व्यापार के पक्ष में थी।

बहुत कुछ झेलना पड़ा। पथराव, झगड़े। एक बड़ा माफिया जो अब जेल में है, उसका लॉटरी का होल सेल का काम था। उसने धमकी के साथ लालट भी दिया। उस समय मुझे 5 लाख रुपये में खरीदने या गोली खाने का आफर मिला। मेरा वही जवाब कि बिकाऊ मैं हूँ नहीं और मुझे मार सकना तेरे वश में नहीं है। अगर अच्छे काम के लिए मर भी गया तो शायद ये अन्दोलन भी जोर पकड़ ले और कामयाबी मिल जाये, वर्ना कम से कम अच्छे काम के लिए मरूँगा।
देश में मेरा समचार देख कर अन्य जगहों पर भी लोगों ने छिटपुट अन्दोलन शुरू कर दिया।
कितना लोकप्रिय था वह मेरा अन्दोलन इसे इससे समझ लीजिये- नैनीताल मे समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक तय हो गयी। मुझे ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिला तो सीधे ट्रेन पर पहुंच गया। ट्रेन में टीटी ने पहचान लिया और बर्थ दे दी। यही काठगोदाम में हुआ। वहां के स्टेशन मास्टर ने पहचान लिया बैठा कर चाय पिलाई और नैनीताल उनके एक दोस्त जा रहे थे। उनके साथ मुझे भेजा और वापसी के रिजर्वेशन का इन्तजाम भी किया। ऐसा मेरे साथ मुशर्रफ वाले अन्दोलन में भी हुआ था जब उसके अगले दिन मैं फैजाबाद गया तो बस स्टेशन के पास जो उस बक्त का अच्छा होटल था, उसमें किसी ने रुकने का इन्तजाम किया था। मैं काउंटर पर पहुंचा तो आजतक चैनल पर मेरा ही समाचार चल रहा था। वहां बैठा। मालिक टीवी और मुझे आश्चर्य से देखने लगा। खैर फिर उसने होटल के बजाय अपने घर का खाना खिलाया और कमरे का पैसा लेने से भी इन्कार कर दिया।
थोड़े दिन बाद हमारी सरकार (समाजवादी पार्टी की) बन गयी। मुलायम सिंह यादव जी मुख्यमंत्री बने। तब उनके सामने मैंने उत्तर प्रदेश में लाटरी खत्म करने का प्रस्ताव किया जिसका एक पूरा विभाग था। 300 या 400 करोड़ रुपये का राजस्व लॉटरी से उत्तर प्रदेश को मिलता था। मेरे अन्दोलन का नैतिक दबाव भी था। मुख्यमंत्री ने भी जरूरी समझा और उत्तर प्रदेश में तत्काल प्रभाव से लॉटरी बंद कर दी गयी। फिर ऐसा माहौल बना कि धीरे-धीरे सभी प्रदेशों को लॉटरी बंद करनी पड़ी।
(डॉ. चन्द्र प्रकाश राय की फेसबुक दीवार से साभार)
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