कोविड वॉरियर पत्रकार का क्रूर शहादतनामा, जरूर पढ़िए

कोविड वॉरियर पत्रकार का क्रूर शहादतनामा, जरूर पढ़िए

HEALTH NATIONAL REGIONAL वायरल

अनिल शुक्ल

विगत गुरुवार हिंदी के प्रमुख अख़बार ‘दैनिक जागरण’ के आगरा संस्करण के उप समाचार संपादक पंकज कुलश्रेष्ठ कोरोना विरुद्ध युद्ध हार गए। संभव है पंकज यह लड़ाई जीत जाते लेकिन  कोविड 19  को लेकर सारे देश में कुख्याति बटोर चुके आगरा के क्रूर और लापरवाह चिकित्सा और प्रशासकीय तंत्र ने मिलकर उन्हें परास्त हो जाने को मजबूर कर दिया। शुरू के 4-5 दिन वह अपनी जांच के लिए यहाँ से वहां गिड़गिड़ाते घूमते रहे। किसी तरह ढेरों ‘सोर्स’ और  ‘सिफारिशों’ के बाद आखिरकार जब जांच हुई भी तो एक सप्ताह तक जांच रिपोर्ट नहीं आयी।  रिपोर्ट आयी तो शुरू के 2-3 दिन उनका ग़ैर ज़िम्मेदाराना इलाज चला। अंतिम दो दिन ज़रूर उन्हें वेंटिलेटर प्रदान करने के सम्मान से नवाज़ा (!) गया लेकिन तब तक वायरस उनके भीतर सुरसा रूप ग्रहण कर चुका था। अंततः उन्हें ‘कोविड वॉरियर’ का शहादतनामा जबरन स्वीकार करना पड़ा। पॉज़िटिव पाए जाने वाले आगरा ‘जागरण’ के अन्य 12 पत्रकार भी शहर से 35 किमी० दूर एक इंजीनियरिंग कॉलेज को तात्कालिक रूप से बदल कर तैयार हुए एक ‘दो टके’ के अस्पताल में दाखिल हैं। ‘संस्थान’ के एक संदेहास्पद पत्रकार और एक ग़ैर पत्रकार कर्मी को शहर के एक वृद्धाश्रम में क्वैरेन्टाइन किया गया है। कुछ अशगुन हो तो कुछ बुज़ुर्ग भी निबटें! उधर इसी संस्थान के 5 वरिष्ठ पत्रकार और गैर पत्रकारों को जिलाधिकारी और सीएमओ० की विशेष अनुमति के साथ अखबार के दफ्तर में ही क्वैरेन्टाइन करके रखा गया है। आखिर संस्करण भी तो छापना था। ऐसी खबर भी है कि संक्रमण के संदेह में संस्थान के कई दूसरे पत्रकारों ने खुद को घरों में  क़्वेरेन्टाइन कर लिया है।

यूं तो मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, श्रीनगर, हैदराबाद, मंगलूर, कानपुर जैसे कई बड़े शहरों के अलावा छोटे शहरों के सैकड़ों पत्रकार भी कोविड 19 से संक्रमित होने के बाद जंग में जान हलाकान किये हुए है लेकिन आगरा में वाली यह मौत देश में महामारी के विरुद्ध होने वाले युद्ध में किसी पत्रकार के बलिदान की पहली कड़ी है जो आने वाले दिनों में ऐसे फौजियों के संभावित नरसंहार का संकेत देती है जो मोर्चे पर गोला-बारूद का मुक़ाबला करने को खदेड़ कर लाए तो गए हैं लेकिन जिनके पास आत्मरक्षार्थ फुटुल्ली देसी तमंचा भी नहीं। पिछले 4 दशकों में अख़बारों के आंचलिक संस्करणों की बंदरबांट में समाचारों के आवागमन पर जिस तरह से रोकथाम की गयी है, वह यदि नहीं होती तो कोविड 19 के शहादतनामों में मीडिया जनों की तादाद सैकड़ों-सैकड़ों में आंकी जा सकती थी ।

कोरोना की बिसात पर जो लोग ‘फेन्स’ के दूसरी तरफ चौसर लिए पांव पसारे बैठे हैं, वे तत्काल ज्ञान बघार सकते हैं कि महाभारत में चक्रव्यूह के भीतर जब दूसरे घुस रहे हैं और हलाल हो रहे हैं तो मीडियाकर्मियों को लेकर काहे का स्यापा? यह सही है कि गुज़रे 2 महीने में कोविड 19 सैकड़ों की तादाद में डॉक्टरों, नर्सों,पैरा मेडिकल स्टाफ़,सफाई कर्मचारी और पुलिसकर्मियों को लील गया। यह भी सही है कि उनकी हौसला अफ़ज़ाई के लिए जिस दिन सारे देश से ताली  और थाली बजवाई गयी, ठीक उसी दिन उनकी सुरक्षा के लिए पहली बार मेडिकल सूट (पीपीई) का अंतर्राष्ट्रीय टेंडर भेजा गया। डॉक्टरों, नर्सों और पारा मेडिकल स्टाफ और उनकी यूनियनों ने जब हो हल्ला मचाया तो कुछ कुछ सप्लाई शुरू की गयी। पेशेवर पीपीई तो कम ही लोगों को महफूज़ हुए, बाकियों को रेनकोट में लपेट कर प्राणघातक वायरस के सामने खड़ा कर दिया गया। मरता क्या न करता। डॉक्टर और नर्स बेचारे कुछ प्लास्टिक कवच की ताकत के दम पर और कुछ आत्मबल के रथ पर सवार होकर चक्रव्यूह भेदने को कूच कर गए। जो शहीद हो गए, देश ने उनकी क़ुरबानी के जज़्बे को सलाम किया, फौज ने बैंड बजाकर और एयरफोर्स के जहाज़ों ने फूल बरसाकर उनका गुणगान कर लिया। उनके पीछे रोते-कलपते उनके बीबी बच्चों ने उनकी नौकरियों के ग्रुप इंश्योरेंस के झुनझुने से सब्र कर लिया। केजरीवाल के दिल्ली के शहीदों पर लगाए गए एक करोड़ के मरहम ने ज़रूर देश भर के कोविड शहीदों के बीबी बच्चों के सामने ‘हाय हुसैन (हम दिल्ली में) न हुए’ के वीतराग का पांसा फेंका लेकिन देश के बाकी मुख्यमंत्रियों ने अपने कान में सीसा उड़ेल लिया। चलिए इन लोगों की तो कुछ सुनवाई हुई। वे ख़ुद जिगरे वाले थे। चीख सकते थे, दहाड़ सकते थे। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास याचिका का कटोरा लेकर रिरिया सकते थे, मीडिया की मदद से देश भर में भोकाल बना सकते थे। कमज़ोर पड़ता देख उनकी यूनियनें इंक़लाब-ज़िंदाबाद कर सकती थीं।

पत्रकार बेचारा कहां जाय? उसके पास न तो भीतर का कवच है न बाहर का। पीपीई की बात दरकिनार, कंपनी एन-95 मास्क और सैनिटाइज़र भी खरीद कर नहीं दे सकती। अपनी जेब से खरीदना पड़ता है तो बीबी से हाथ पाँव जोड़ पुरानी टीशर्ट कटवा के मास्क सिलवा लेता है और चेहरे पर ‘इकोनॉमी आइटम’ बांधकर चाहे जिस घटना-दुर्घटना में सारस की तरह अपनी गर्दन निकाल कर हाज़िर हो जाता है। ऑफ़िस को सेनिटाइज़ करने के नाम पर एडमिन वाले 5 सौ एमएल की सैनिटाइज़र की एक शीशी और ‘एक्वा’ के घालमेल से 1 हज़ार एमएल की तीन बोतल तैयार कर लेते हैं। पीपीई की मांग करते डॉक्टरों और नर्सों के आंदोलन की स्टोरी फ़ाइल करते हुए उसे बड़ी उबकाई आती है। उसका जी करता है कि सम्पादक जी या जीएम के सामने खड़ा होकर दहाड़े और ‘पीपीई ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए। लेकिन मजबूर है।  उसकी अपनी कोई यूनियन नहीं है। कुछ साल पहले ‘नॉन जर्नलिस्टों’ ने दफ्तर में प्लांट यूनियन बनाने की जब  कोशिश की थी और हड़ताल हुई तब रात में अख़बारों के बण्डल कंधे पर ढो कर सर्कुलेशन की गाड़ियों तक वही पहुंचता था। 

मुख्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वह सोचकर जाता है कि सरकार की तरफ से विशेष कोविड इंश्योरेंस दिए जाने की की मांग उठाएगा लेकिन उसका नम्बर ही नहीं आ पाता। हार कर वह चीफ सेक्रेटरी की डेली ब्रीफिंग में पत्रकारों को पीपीई0 दिए जाने का सवाल उठाना चाहता है। तब लेकिन उसे याद आता है कि यह तो एकतरफा ब्रीफ़िंग है, सवाल पूछने की थोड़े ही होती है।

रोज़ सुबह एडिटोरियल मीटिंग में यह सोचकर वह जाता है कि सम्पादक जी और जीएम सर से पूछेगा कि ऐसे मौके पर, जबकि वह और उस जैसे उसके दूसरे साथी जान हथेली पर रखकर अपने कर्तव्य पालन को जूझ रहे हैं, उन्हें अतिरिक्त भत्ते मिलने की जगह आधी तनख्वा में क्यों सिमटाया जा रहा है? कुछ पूछने से पहले ही संपादक जी और जीएम सर उसी से पूछ बैठते हैं- कोरोना के चक्कर में विज्ञापन और सर्कुलेशन लगातार गिरते जा रहे हैं, क्या करना चाहिए? 

बच्चे बड़े समझदार हैं। उन्हें मालूम है कि पापा की तनख्वाह आधी हो गयी है। रोज़ सुबह घर से निकलते समय बेटे और बेटी को दुलारता है। वे हैरान हैं। सोचते हैं कि पापा को क्या हो गया है ? हम तो अब कोई डिमांड करते नहीं। वे नहीं जानते कि पापा ये सोचकर दुलार रहे हैं कि मालूम नहीं  शाम को इनका मुंह देखना नसीब होगा कि नहीं। क्या पता सीधे आइसोलेशन वार्ड भेज दिया जाऊं। दिन में छ-आठ बार बीबी खरखराती आवाज़ में फ़ोन करके इश्क बघारती है तो उसे हंसी आती है। वह समझ जाता है, बेचारी तौल रही है- अभी तक ज़िंदा हूं या कोविड की भेंट चढ़ गया।

अनिल शुक्ल

(लेखक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और रंगकर्मी हैं। आगरा की लोककला भगत को विश्वस्तर पर पुनर्जीवित किया है)

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