Agra (Uttar Pradesh, India)। उत्तर प्रदेश से लेखिका मंच की पावस गोष्ठी में महा व्याधि कोरोना के प्रकोप के बावजूद पावस ऋतु में प्रकृति के सौंदर्य के संरक्षण और सांस्कृतिक परंपराओं के पुनर्जीवन का आह्वान किया गया। हरियाली का उत्सव जहां प्राकृतिक विरासत और प्राणी जगत की सुरक्षा का संदेश देता है, वहीं मानव मन की जिजीविषा और प्रफुल्लता का वाहक है। साहित्य में यह हमेशा से प्रतिबिंबित हुआ है, चाहे वह रामचरितमानस में तुलसीदास हों या कालिदास की ऋतुसंहार हो। रक्षाबंधन जैसे त्योहार जहां मानवों को जोड़ते हैं, वही नाग पंचमी, हरियाली अमावस्या, श्रावणी, उपागम जीव जंतुओं और वृक्षों के पालन का संदेश देते हैं।
यह जल संरक्षण का पर्व
इस अवसर पर मंच की सदस्याओं ने शिव वंदना, मल्हार, बजरी, स्वरचित कविताओं के माध्यम से पावस के महत्व को अभिव्यक्ति दी। गोष्ठी का प्रारंभ ज्योत्सना सिंह के शिव वंदना से हुआ। दीपा रावत ने कहा कि यह जल संरक्षण का पर्व है जिसके संस्कार बचपन से ही पड़ने चाहिए। प्रियंका सिंह ने प्रकृति से जुड़ने का आह्वान किया ताकि मन, शरीर और आत्मा इतनी सशक्त हो कि किसी भी रोग का सामना कर सकें।
पता नहीं क्यों सावन में आंखें भर आती हैं
मीरा गुप्ता ने ज्योतिर्लिंग की आराधना और शिव पुराण के प्रसंग सुनाकर सात्विक जीवन का महत्व रेखांकित किया। प्रवीण कुलश्रेष्ठ ने कविता सुनाई- कान्हा जी का दर्शन पाकर हो जाऊंगी हरी सखी। डॉ. अमिता सरकार ने ‘मन में छिपा बच्चा फिर जीवित हो उठा’ सुनाया। शशि मल्होत्रा ने प्यासी धरती की प्यास बुझाने आंगन में सावन आया.., गीता शर्मा ने इस बार का सावन कुछ रूठ गया सुनाया। सीमा सिंह ने कहा- पता नहीं क्यों सावन में आंखें भर आती हैं।
सावन की घटाएं बरखा बनकर छाई
विनोद बोहरा ने राधा झूल रही कान्हा संग और सुजाता ने सावन की घटाएं बरखा बनकर छाई सुनाया। राजश्री ने समिति मल्हार सुनाया- अरी बहना कैसो सावन आयो न कुछ भी मन को भायो हो कैसा यह कोरोनावायरस..। डॉ शिखा श्रीधर ने भी मल्हार सुनाया। अध्यक्ष प्रीति आनंद ने निर्भय बरस रहे हैं बादल सावन में तू खुशियां चुन.. सुनाया। बलजीत ग्रेवाल ने पंजाबी गिद्दा सुनाया। शिखा श्रीधर ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का संचालन प्रीति आनंद ने किया।
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