हजूरी भवन, पीपलमंडी, आगरा राधास्वामी मत (Hazuri Bhawan, Peepal mandi, Agra) का आदि केन्द्र है। यहीं पर राधास्वामी मत (Radha Soami Faith) के सभी गुरु विराजे हैं। राधास्वामी मत के वर्तमान आचार्य और अधिष्ठाता दादाजी महाराज (प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर) हैं, जो आगरा विश्वविद्यालय ) Agra University)के दो बार कुलपति रहे हैं। हजूरी भवन (Hazuri Bhawan) में हर वक्त राधास्वामी नाम की गूंज होती रहती है। दिन में जो बार अखंड सत्संग होता है। दादाजी महाराज ने राधास्वामी मत के अनुयायियों का मार्गदर्शन करने के लिए पूरे देश में भ्रमण किया। इसी क्रम में 26 अक्टूबर, 1999 को दादाजी महाराज कोटरा, पुष्कर रोड, अजमेर (राजस्थान) में सतसंग के दौरान दादाजी महाराज (Dadaji maharaj Prof Agam Prasad Mathur) ने कहा- हमारे ऋषि-मुनियों ने जो मूल्य बताए हैं उन्हीं का पालन करने से तनाव से राहत मिल सकती है।
दादाजी महाराज के पहुंचने से मची हलचल
भारत के राजस्थान के अजमेर में सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है। मोइनुद्दीन चिश्ती को ख्वाजा गरीब नवाज भी कहा जाता है। अजमेर शरीफ का मतलब ही मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से है। दुनियाभर से यहां श्रद्धालु चादर चढ़ाने आते हैं। इसी ख्वाजा की नगरी में 21 साल पहले जब राधास्वामी मत के आचार्य दादाजी महाराज पहुंचे तो हलचल मच गई। यह बात 26 अक्टूबर, 1999 की है। पहली बार सूफी संत की नगरी में एक ऐसे संत के चरन पड़े कि जो विश्व कल्याण कर रहे हैं, भटके हुए जीवों को राह दिखा रहे हैं, जीवों का उद्धार कर रहे हैं। दादाजी महाराज के सतसंग में सैकड़ों श्रद्धालु उमड़ पड़े। दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए आए। राधास्वामी नाम की गूंज से ख्वाजा की नगरी यानी अजमेर शरीफ झंकृत हो गई। यहां पढ़िए दादाजी महाराज ने सतसंग में क्या कहा-
अजमेर के निवासियों से मुझे यह कहना है कि…
अजमेर के निवासियों से मुझे यह कहना है कि वह यह समझें कि इस समय संसार में तनाव की स्थिति हो रही है। इससे धनी, निर्धन, पद-प्रतिष्ठा वाला या इनसे रहित कोई भी नहीं बचा है, जिसका नतीजा यह है कि परेशानी और तकलीफ बहुत बढ़ गई है। सारे समाज, देश और विश्व में मूल्यों का संकट आया हुआ है। मैं सब लोगों का ध्यान उन मूल्यों की ओर दिलाना चाहता हूं जो भारतवर्ष में ऋषि, मुनि, जोगी, तपी, साध और संतों ने बड़ी साधना के बाद निर्धारित किए हैं। आज उन्हीं के पालन करने से तनाव से राहत मिल सकती है।
हमारी पीढ़ी वाला बचपन ऐसा था
कितनी ही बात आप भौतिकवाद की बढ़ोतरी, सुख-सुविधा, वैज्ञानिक चमत्कारों और मेडिकल साइंस में हुई प्रगति की करें लेकिन कोई भी चीज यहां की स्थाई नहीं है। सारा का सारा सामान यहीं छोड़ना पड़ता है। अंत में कुछ हाथ नहीं आता है। जितना सुख-सुविधा भोगी यह जीव होता चला जाता है, उतनी ही बर्दाश्त की कमी होती जाती है। अगर हमारी पीढ़ी वाले बचपन को देखें को गर्मी, सर्दी और लू की बर्दाश्त सबको थी। थोड़े में थे लेकिन बहुत सुखी थे। आज सब सुख साधन मौजूद हैं, लेकिन एक होड़ लगी हुई है कि जो दूसरे के पास है वह मेरे पास भी होना चाहिए।
ये मूल्यों का गहरा संकट
पहले टीवी था तो गनीमत थी, अब कंप्यूटर और ई-मेल आ गया है और जाने कितने तरह के मेल आएंगे लेकिन ये मेल फेल होंगे, यह कोई नहीं जानता। अब एक बात ये समझ में आती है कि इस समय संतोष के साथ कोई जीव न रहता है और न ही रहना चाहता है और न दूसरों को रहने देना चाहता है, ये मूल्यों का गहरा संकट आ गया है।
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