आज जन्माष्टमी है। राधास्वामी मत के प्रवर्तक स्वामी जी महाराज का जन्मदिन है। आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं राधास्वामी मत के अधिष्ठाता और गुरु दादाजी महाराज (प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर, पूर्व कुलपति आगरा विश्वविद्यालय) का आलेख, जिसमें बताया गया है कि मत ने इस समाज और संसार को क्या दिया है। याद रहे कि राधास्वामी मत का आदि केन्द्र हजूरी भवन, पीपल मंडी, आगरा में है। यहां हर वक्त अध्यात्म की प्राणवायु प्रभावित होती है।
राधास्वामी मत की उपलब्धियां अनंत और असीम हैं। उन्हें इस आलेख की सीमाओं में बांधना न संभव है न उचित। हम यहां उनकी एक झलक भर ही देख सकते हैं। सर्वप्रथम यह निश्चित रूप से मान लेना चाहिए कि इस मत ने प्रेम और भक्ति का चरम आदर्श समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। मध्यकालीन भक्ति परंपरा के सूत्रों को पुनर्स्थापित कर राधास्वामी मत के प्रवर्तकों ने धर्म के भक्ति प्रधान स्वरूप पर बल दिया। इसके साथ ही कुलमालिक सभी जीवों को प्यार करते हैं और उनकी संभाल करते हैं, अतः प्रेम और भक्ति राधास्वामी मत के प्रमुख स्वर हैं। इसके साथ ही गुरु भक्ति की परंपरा को राधास्वामी मत के प्रवर्तकों ने पुनः प्रचलित किया। इसके अनुसार गुरु अवतरित कुलमालिक हैं। अतः गुरु-भक्ति ही वह साधन है जिसे जन्म, मरण एवं पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाई जा सकती है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रवर्तक गुरुओं ने इस मत को पूर्णतः व्यवहार एवं आचार का मत बनाया था। यह मत भक्ति एवं योग का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। सुरत- शब्द -योग की कुंजी सामयिक गुरु के पास है। अतः एक अभ्यासी के लिए योगाभ्यास में सफलता प्राप्ति के लिए गुरु भक्ति को सर्वोपरि माना गया है। प्रेम जो सत्य एवं निस्वार्थ हो, स्वयं में योग है। इसीलिए सुरत -शब्द -योग को वह मोक्ष प्राप्ति का भक्तिमय साधन मानते हैं। राधास्वामी मत में आध्यात्मिक शब्द के सिद्धांत की वैज्ञानिक व्याख्या भी प्रस्तुत की गई है। साथ ही कुलमालिक तथा उनके धाम की संकल्पना भी अनूठे रूप में मिलती है जो मन एवं माया से सर्वथा रहित है साथ ही प्रे,म शांति, ज्ञान, आनंद, दया, प्रकाश एवं आत्म तत्व का भंडार है।
वस्तुतः राधास्वामी मत एक समन्वयवादी और मध्यममार्गी साधना का पथ है। कुछ शिक्षाएं प्रशिक्षण हिन्दू धर्म से प्रभावित हैं। कुछ शिक्षाओं पर मध्यकालीन भक्त, साधकों, संतों एवं सूफियों की स्पष्ट छाप है। जे एन फर्रकुहर ने इस मत के रचना और दर्शन पर बौद्ध मत का प्रभाव पाया है। प्रेम पर अत्यंत बल, वैष्णव परंपराओं का अनुशीलन प्रतीत होता है। सामूहिक प्रार्थना की अवधारणा संभवतः सिख संप्रदाय से अनुप्राणित है। राधास्वामी मत भारतीयता से अनुप्राणित भारतीय धर्म है। इस मत की शिक्षाएं मध्यम मार्ग पर बल देती हैं। किसी व्यक्ति को न संसार त्याग करना है और न संसार में अति लय होना चाहिए। वास्तव में यह मत सांसारिक क्रियाकलापों में भाग लेने की शिक्षा देता है।
राधास्वामी मत ने सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। मत के संस्थापकों ने जाति-विभेद, पर्दा प्रथा तथा नारी की दयनीय स्थिति के विरुद्ध स्वर उठाए हैं। राधास्वामी में शनैः-शनैः एवं सुचारु रुप से क्रियान्वित सुधारों की संस्कृति की और उनका दृष्टिकोण विकासवादी था। इस मत में अंतर्जातीय विवाह एवं विधवा विवाह को मान्यता प्रदान की गई है। इस मत में बिना किसी आडंबर एवं प्रदर्शन के विवाह होते हैं।
साहित्य एवं कला के क्षेत्र में भी राधास्वामी मत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें गद्य एवं पद्य दोनों में ही धर्मग्रंथ लिखे गए हैं। गद्य रचनाओं में हिन्दी भाषा के प्रारंभिक विकास एवं परिवर्तन के युग में मूल्यवान योगदान दिया है। उनकी भाषा में अरबी, फारसी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, अवधी एवं बृज भाषा के शब्द समन्वित प्रभाव डालने में समर्थ हुए हैं। पद्य में प्रायः कबीर साहब की शैली की झलक प्राप्त होती है। लय, छंद, मात्रा, अलंकार सभी उत्तम रूप में निहित हैं। कुछ पुस्तकें अंग्रेजी में भी लिखी गई हैं जिनमें रचयिताओं का महान व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता है। शैली अत्यंत आकर्षक तथा भाषा प्रवाहमय है।
कला के क्षेत्र में भी राधास्वामी मत का योगदान प्रशंसनीय है। प्रथम गुरु स्वामीजी महाराज एवं द्वितीय गुरु हजूर महाराज की समाध भव्यता एवं सौम्यता का प्रतीक है। संगमरमर में अत्यंत सूक्ष्म उत्कीर्ण कला तथा विभिन्न रंगों के मूल्यवान पत्थरों को सुंदरता से जड़ना वास्तव में कला के अद्वितीय आदर्श हैं। उत्तम नमूनों में पच्चीकारी तथा चमत्कारी रंगों का प्रयोग समाध की विशेषता है। सूक्ष्म जाली की कला भी अत्यंत प्रशंसनीय है। कहने का तात्पर्य है कि साहित्य एवं स्थापत्य कला की दृष्टि से राधास्वामी मत की उपलब्धियां अत्यंत महत्वपूर्ण और अमूल्य हैं।
वस्तुतः राधास्वामी मत अध्यात्म एवं भौतिकवाद, अनुराग एवं वैराग्य तथा मालिक एवं संसार के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए सामूहिक जीवन की शिक्षा देता है। कल्याणमय भौतिक जीवन की संकल्पना प्रस्तुत करता है और यही इस मत की संपूर्ण उपलब्धियों का केंद्र बिंदु है।
अतीत के मनीषियों की भांति राधास्वामी मत ने भी रहस्यवादी अनुभूतियों की आधारशिला पर ऐसा उद्घोष किया जैसे कोई परम सामर्थ्य महान मानव करता है। परम सत्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने व्यावहारिक विधि की उपयोगिता प्रदर्शित की तथा शास्वत एवं अलौकिक सत्य की प्रेरणादायक गवेषणा का सूत्रपात किया।
संशयवाद के इस युग में राधास्वामी मत के संस्थापकों ने असंख्य नर-नारियों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने के लिए एक तेजयुक्त जीवंत मत का उपहार दिया है, क्योंकि इसमें धर्म विषयक बौद्धिक शंकाओं और प्रश्नों का व्यावहारिक एवं तर्कसंगत समाधान प्रस्तुत किया गया है। प्रेम तथा आस्था के अलौकिक प्रकाश को पूर्ण ढंग से दूर-दूर तक बिखेरा गया है।
प्रत्येक व्यक्ति आजकल अपनी आत्मा को कष्ट दे रहा है। आत्मा कहती है कि यह मत कह- वह मत कर, पर उसकी सुनता कौन है? वह वह करते हैं जो मन कहता है। मन और आत्मा अलग-अलग है, वह एक नहीं है। मन काल का प्रतिनिधि है और उसके रूप में वह जीवों को फँसाता है, अशुभ कर्मों को करवाता है। आत्मा, मालिक से मिलना चाहती है। एक कसाई के अंदर भी आत्मा है, वह आध्यात्मिक व्यक्ति बन सकता है, बशर्ते वह ऐसे व्यक्ति की संगति कर ले जो पहुंचा हुआ था उसकी संगति से वह अपनी आत्मिक शक्ति में सुधार करे ले और अपने पापों तथा कर्मों की सफाई करवा ले।
अतः जो परमसत्ता है उसको पाने का प्रयास कीजिए। परम सत्ता को पाने के लिए आपसे कोई यह नहीं पूछता कि आप किस जाति, धर्म या संप्रदाय के हैं। आप मानव मात्र हैं, यह पर्याप्त है। (मेरे विचार से साभार)
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