Agra, Uttar Pradesh, India. क्या आपको पता है कि भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के सह संगठन मंत्री भवानी सिंह पीएचडी थे? क्या आपको पता है कि उन्होंने सरकारी वकीलों की सूची में वाल्मीकि समाज के अधिवक्ताओं का नाम शामिल कराया? क्या आपको पता है कि वे अच्छे गायक थे? क्या आपको पता है कि वे ध्यान लगाने में सिद्धहस्त थे? क्या आपको पता है कि अध्ययनशील थे और बड़ी संख्या में पुस्तकें साथ लेकर चलते थे। जब उनका मुख्यालय आगरा के स्थान पर वाराणसी बनाया गया तो पुस्तकें भाजपा के किस नेता को दे गए थे? यूपी के फर्रुखाबाद के मूल निवासी भवानी सिंह को पंचायत चुनाव में वाराणसी का प्रभारी भी बनाया गया था। बृज क्षेत्र (आगरा, अलीगढ़ और बरेली मंडल) में उनके नेतृत्व में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़े गए और भाजपा ने भारी सफलता पाई। भवानी सिंह का निधन बुधवार को दुष्ट कोरोना से हैदराबाद में हुआ। उन्हें लखनऊ से एयरलिफ्ट करके ले जाया गया था। वहीं उनकी अंत्येष्टि भी की गई। उनके चाहने वाले अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके। हमारे कहने पर सुरेन्द्र गुप्ता एडवोकेट ने भवानी सिंह के बारे में कुछ अनसुनी बातें लिखी हैं।
भावनाओं से भरा हुआ मन गमगीन है, अश्रुपूरित है, कलम भी उदासीन है, शब्द भी नहीं मिल पा रहे ,क्या कहूं ? क्या लिखूं? भावनाओं को आप तक कैसे पहुंचाऊ? पुष्प मुरझा जाता है, लेकिन उसकी सुगंध वातावरण को सुवासित करती रहती है। गीत गाया जा चुका होता है, लेकिन स्वर लहरी गूंजती रहती है। इसी प्रकार महामानव चला जाता है किसी अज्ञात अनंत की ओर, लेकिन रह जाते हैं उसके कृतित्व व व्यक्तित्व जो प्रेरक होकर घोर अंधकार में भी दीपक के प्रकाश की तरह राह दिखाते रहते हैं। डॉक्टर भवानी सिंह महासागर की भांति गंभीरता लिए हुए एक ऐसे महामानव थे जो अपने बारे में नजदीकी लोगों को भी नहीं बताते थे।
मात्र 5 वर्ष की आयु में मां के स्वर्गवास के बाद कठिन परिस्थितियों में उनका लालन-पालन हुआ। मात्र 21 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनकर मां भारती की आराधना के कठिन पथ पर चल पड़े। लगभग 22 वर्ष पूर्व पिता जी की मृत्यु के पश्चात कभी घर पर नहीं गए। एक ऐसी निराली शख्सियत जिसके बारे में नजदीकी लोगों को भी नहीं पता था कि उनको पीएचडी की डिग्री भी मिली थी। योग, ध्यान, ईश्वरीय आराधना उनकी दिनचर्या का अखंड हिस्सा थी। कार्यालय में ही एक कमरे को उन्होंने ध्यान कक्ष बना लिया था।
राष्ट्रीय समस्याओं से संबंधित पुस्तकों का गहन अध्ययन उनका स्वभाव था । विभिन्न विषयों पर वे मुझसे चर्चा करने का सौभाग्य देते थे। जब भी समय मिलता उनको किसी आश्रम या संत के पास चर्चा करते हुए देखा जा सकता था। संगठन शिल्पी के रूप में कार्यकर्ताओं की क्षमता को पहचानना, उसको निखारना तथा उसका मार्गदर्शन करने का तरीका अद्भुत था ।
वे राष्ट्भक्ति को जीवन का आधार मानते थे। वक्ता के रूप में अपने विचारों को श्रोताओं के हृदय की गहराइयों तक पहुंचाने की अद्भुत क्षमता रखते थे। जब आगरा से उनको वाराणसी केंद्र में भेजा गया तो उन्होंने पुस्तकों का विशाल संग्रह मुझको देते हुए कहा ये किताबें तुम्हारे लिए उपयोगी है । इनका अध्ययन करके जो भी उपयोगी हो, उसकी जानकारी मुझे देना ।
वे दलित समाज, गरीबों तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के सच्चे अर्थों में हितेषी थे। आगरा में सरकारी वकीलों की नियुक्ति के संबंध में अधिवक्ताओं की सूची राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों के साथ चर्चा करके तैयार हुई थी। जब मैं उस सूची को लेकर उनके पास लेकर गया और उनसे सूची देखने का आग्रह किया तो उनका कहना था कि जब आप लोगों ने सूची तैयार की है तो ठीक ही होगी, उसे देख कर मुझे क्या करना है। जब मैंने विशेष जोर दिया तो बोले कf सूची तो बाद में देखूगां, पहले यह बताओ कि इसमें अनुसूचित जाति के कितने अधिवक्ताओं के नाम हैं? इस दृष्टिकोण से हम लोगों ने विचार ही नहीं किया था। जब मैंने अनुसूचित जाति के अधिवक्ता का नाम बताने में असमर्थता जाहिर की तो स्नेह भरे अंदाज में काफी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि आप लोग जैसा चाहे वैसा करो लेकिन यदि मेरी सहमति मांगोगे तो बिना अनुसूचित जाति के अधिवक्ताओं का नाम शामिल किए मैं सहमति नहीं दे सकता। मेरे यह कहने पर कि बिना आपकी सहमति के इस सूची को मैं आगे नहीं बढ़ाऊंगा, तब कुछ देर बाद बोले कि अच्छा ऐसा करो, इसमें वाल्मिक समाज के दो अधिवक्ताओं के नाम शामिल करो। उनका मानना था कि वाल्मीकि समाज स्वाधीनता सेनानियों का समाज है। इसका सम्मान करना चाहिए। तब हमने बाल्मिक समाज के अजय गिजॆ एडवोकेट तथा आदर्श चौधरी एडवोकेट का नाम शामिल किया। आजादी के बाद आगरा तथा आसपास के जिलों में वाल्मीकि समाज का कोई भी अधिवक्ता सरकारी वकील नहीं बना था। जब वाल्मीकि समाज के दो लोगों को सरकारी वकील बनाया गया तो संपूर्ण वाल्मीकि समाज में हर्षपूर्वक चर्चा का विषय रहा।
कभी देश के राजनेताओं में महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर आंबेडकर, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महापुरुष हुआ करते थे। आज के गंभीर गिरावट के दौर में डॉक्टर भवानी सिंह जी उसी प्रकार के महापुरुष थे।
वे राजनीति में नैतिक मूल्यों के प्रबल पैरोकार थे। अच्छे लोगों को राजनीति में लाना राष्ट्रीय आवश्यकता मानते थे। वे राजनीति के रास्ते से भी ईश्वरीय परमतत्व की खोज में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि राजनीति के माध्यम से भी मानवीय मूल्यों के साथ चलते हुए ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है। इसी आध्यात्मिक भाव रखने के कारण जो भी उनके संपर्क में आता था, उनका बन कर रह जाता था। वास्तव में राजनीति में वे आध्यात्मिक यात्रा करते हुए ऋषि आत्मा थे। उनके संपर्क में मेरे यादों की लंबी श्रंखला है, जो एक ग्रंथ में भी नहीं समा सकती है।
हे ऋषि आत्मन! हे महामानव ! तुम हम सबको मात्र 54 वर्ष की आयु में छोड़ कर चले गए, लेकिन आपके द्वारा जलाए गए दीपक का प्रकाश सदैव भी हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। मां भारती की आराधना को हम सभी सच्चे अर्थों में आगे बढ़ाएंगे, यही संकल्प उनके प्रति श्रद्धांजलि होगी। अब आगे नहीं लिखा जा रहा है, आंखों में आंसू है, कलम भी साथ छोड़ रही है। फिर कभी लिखने का प्रयास करूंगा।

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