किताबों के नाम पर ‘कमीशन का खेल’ — अभिभावकों का फूटा गुस्सा, पापा संस्था का बड़ा धमाका
निजी स्कूल और किताब माफिया का गठजोड़ उजागर
आगरा। निजी विद्यालयों की मनमानी और महंगी किताबों की अनिवार्यता के खिलाफ प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स अवेयरनेस (पापा संस्था) ने संजय प्लेस स्थित माहेश्वरी बुक डिपो पर जोरदार प्रदर्शन किया। संस्था ने आरोप लगाया कि स्कूल निजी प्रकाशकों के साथ मिलकर महंगी पुस्तकों को अनिवार्य कर अभिभावकों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं।

दीपक सरीन का बड़ा आरोप—शासनादेश की खुलेआम धज्जियां
संस्था के राष्ट्रीय संयोजक दीपक सिंह सरीन ने बताया कि सेंट पैट्रिक जूनियर कॉलेज, वजीरपुरा द्वारा शासनादेशों के विपरीत निजी प्रकाशकों की पुस्तक सूची जारी कर अभिभावकों को एक तय दुकान से खरीद के लिए बाध्य किया जा रहा है। इस वर्ष प्री-प्राइमरी से कक्षा 10 तक सभी पुस्तकों में बदलाव कर अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला गया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में स्टाफ द्वारा पुस्तक विक्रेता का प्रचार किया गया और स्कूल परिसर से ही यूनिफॉर्म खरीदने के लिए निर्धारित समय के साथ 3400 रुपये लाने का संदेश प्रसारित किया गया। सूचना पर मौके पर पहुंचे पूर्व डीआईओएस डॉ. मानवेंद्र सिंह, खंड शिक्षा अधिकारी महेश पटेल और गोपाल कृष्ण पटल सहायक ने निजी पुस्तकों की बिक्री तत्काल रोकने के निर्देश दिए। हालांकि अधिकारियों के जाते ही दोबारा बिक्री शुरू कर दी गई, जिसे संस्था ने प्रशासनिक आदेशों की खुली अवहेलना बताया।
गरीब बच्चों के अधिकार पर सीधा हमला
संस्था पदाधिकारी राघवेंद्र उपाध्याय ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत पढ़ने वाले गरीब बच्चों के लिए इतनी महंगी किताबें खरीदना संभव नहीं है। यदि शिक्षा को व्यापार बनाया गया तो समान अवसर का सिद्धांत खत्म हो जाएगा।

अभिभावक अंकुर गौतम ने कहा कि निर्धारित दुकानों से खरीद का दबाव अनुचित व्यापारिक व्यवहार है और इससे शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। पापा संस्था ने मामले की शिकायत जिलाधिकारी, संयुक्त शिक्षा निदेशक, बेसिक शिक्षा अधिकारी और महानिदेशक स्कूल शिक्षा से की है। संस्था ने पूरे प्रकरण की मजिस्ट्रियल जांच, दोषी विद्यालयों पर सख्त कार्रवाई और निजी पुस्तक बिक्री के इस तंत्र पर रोक लगाने की मांग की है।
संपादकीय: शिक्षा के मंदिर में ‘कमीशन का कुहासा’ — कब रुकेगा यह खेल?
आज शिक्षा, जो कभी संस्कार और ज्ञान का पवित्र संगम मानी जाती थी, अब कई निजी और खासतौर पर ईसाई मिशनरी स्कूलों में एक “प्रॉफिट सेंटर” बनती जा रही है। कॉपी, किताब और ड्रेस के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह सीधा-सीधा अभिभावकों की जेब पर डाका है।
सिस्टम कुछ यूं सेट है—स्कूल, प्रकाशक और दुकान… तीनों की ‘त्रिमूर्ति’ बनती है, और बीच में पिसता है आम अभिभावक। किताब वही मिलेगी जो स्कूल कहेगा, दुकान वही होगी जो तय होगी, और कीमत? वह बाजार नहीं, ‘कमीशन’ तय करता है।
सबसे दुखद यह है कि यह खेल खुलेआम होता है—व्हाट्सएप ग्रुप पर प्रचार, स्कूल परिसर से बिक्री, और प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य के साथ विश्वासघात है।
लेकिन हर अंधेरे में एक चिंगारी होती है। दीपक सिंह सरीन जैसे लोग वही चिंगारी हैं, जिन्होंने इस जड़ जमाए सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने का साहस किया है। यह लड़ाई आसान नहीं है—क्योंकि सामने सिर्फ स्कूल नहीं, बल्कि एक पूरा ‘इकोसिस्टम’ खड़ा है। फिर भी, सरीन की यह जंग उम्मीद जगाती है कि बदलाव संभव है।
सरकार और प्रशासन को अब ‘नोटिस’ से आगे बढ़कर ‘एक्शन’ लेना होगा। मजिस्ट्रियल जांच केवल औपचारिकता न बन जाए, बल्कि दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो कि भविष्य में कोई भी स्कूल अभिभावकों को मजबूर करने की हिम्मत न करे।
शिक्षा अगर व्यापार बन गई, तो समाज में समानता का सपना सिर्फ किताबों में ही रह जाएगा। अब समय है—इस ‘कमीशन कल्चर’ को जड़ से उखाड़ फेंकने का।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
- Meldingen en Accountbescherming op de Wild Robin Casino App in Nederland - August 17, 2026
- Hajper Casino – Hvor lang tid tager transaktioner? Behandlingstider forklaret - August 17, 2026
- Making a deposit From the Wonaco Casino Mobile App in Poland - August 16, 2026