दादा जी महाराज ने पढ़ाई जल्दी प्रारंभ की। वे अत्यंत मेधावी एवं कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। उनका हिन्दी व अंग्रेजी पर समान अधिकार था। वह अपने भाइयों और बहनों को अंग्रेजी पढ़ाते व उनका मार्ग निर्देशन करते। इसी समय बाबाजी का अनुकरण करते हुए उनमें समाचार पत्र पढ़ने की रुचि जाग्रत हुई क्योंकि बाबा जी अंग्रेजी के समाचार पत्र हिन्दुस्तान टाइम्स व इलेस्ट्रेट वीकली पढ़ते थे। बाबा जी का आदेश था कि पढ़ते समय जो शब्द समझ में ना आए, शब्दकोश में देखना चाहिए। इसलिए दादाजी महाराज ने शब्दकोश देखने की आदत बना ली और अंग्रेजी तथा विभिन्न विषयों में प्रवीण हो गए। छठी कक्षा से ही ‘प्रेम पत्र’ पढ़ने लगे और उसके सभी भाग पढ़ लिए। इस अध्ययन का, उस समय आगे आने वाले समय में उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
दादाजी महाराज की विद्यालयी शिक्षा सेंट जॉन्स इंटर कॉलेज में सन 1938 में चौथी कक्षा से प्रारंभ हुई। वह कॉलेज में इंटरमीडिएट तक रहे। पूज्य बाबा जी ने उन्हें कला विषय लेने के लिए कहा। अतः स्नातक स्तर पर उन्होंने कला विषय ही चुना। बीए व एमए सेंट जॉन्स कॉलेज से किया।
सन 1952 में दादाजी महाराज ने जब एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की तभी दुर्भाग्यवश उनके पिताजी बीमार पड़ गए। एमए पास करते ही उनके मन में विचार आया कि उन्हें नौकरी करनी चाहिए। उन्होंने कई स्थानों पर नौकरी के लिए आवेदनपत्र भेजे और जब उनकी नौकरी फिरोजाबाद के इस्लामिया कॉलेज में लगी तो बाबाजी ने कहा- बेटा तुम सभी कुछ इस आगरा में पाओगे। यह भविष्यवाणी फलीभूत हुई। उनकी दया और मेहर से दादाजी महाराज को आगरा में ही सब कुछ प्राप्त हुआ।
बाबा जी की असीम दया व मेहर, माता-पिता के प्यार, आशीर्वाद तथा शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति ने दादा जी महाराज को इस योग्य बना दिया कि वे अपने भाई-बहनों को निर्देशित कर सकते थे। सब भाई-बहन प्यार की अटूट डोर में बँधे थे। वह दादा जी महाराज से स्वतंत्र रूप से बहस कर सकते थे किन्तु उनका आदर करते हुए उनकी सलाह मान लेते थे। जब उनके छोटे भाई डॉक्टर शब्द प्रकाश ने एमए, एमकॉम करने के पश्चात नौकरी प्रारंभ की तो दादा जी महाराज ने कहा कि उन्हें लिपकीय सेवा में नहीं जाने देंगे और शिक्षक के पद से कम किसी पद की अपेक्षा घर पर ही रहने देना पसंद करेंगे। डॉ. प्रसाद ने दादा जी महाराज की आज्ञा शिरोधार्य की और शिक्षक हो गए। इसी दौरान जब डॉक्टर केपी भटनागर (तत्कालीन कुलपति आगरा विश्वविद्यालय) ने दादाजी महाराज को रुड़की के कॉलेज में प्राचार्य पद पर नियुक्त करना चाहा तो स्पष्ट मना करते हुए कहा कि उनके छोटे भाई को नियुक्त किया जाए। दूसरे भाई श्री स्वामी प्रसाद की, जो छोटे थे, बहुत देखभाल की। उंगली पकड़कर घुमाने ले जाते। उन्हीं की प्रेरणा और निर्देश के फलस्वरूप श्री स्वामी प्रसाद ने इंजीनियरिंग पढ़ी।
श्री सरन प्रसाद जी तो बहुत छोटे थे। दादा जी महाराज ने उन्हें मेडिकल में जाने का परामर्श दिया और वे मेडिकल प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। जब पहले दिन मेडिकल कॉलेज गए तो शव-विच्छेदन करना पड़ा। घर लौटकर वे बाबा जी के पलंग के पास सोफे पर निढाल लेट गये। दादाजी महाराज ने तुरंत भांप लिया। श्री सरन प्रसाद को मीठी घुड़की दी। फिर साइकिल पर बैठाकर घुमाने ले गए। फिर गुलाब वाले की चाट खिलाई और समझाया कि यदि तुम इस प्रकार बाबाजी व बाबूजी के सामने लेटोगे तो क्या तुम्हारी पढ़ाई छुड़वा दी जाए। अगले दिन दादा जी महाराज उनके साथ जाकर मेडिकल कॉलेज छोड़ आए और लैब के सामने खड़े रहे।
इस समय परिवार संघर्ष से गुजर रहा था। ऐसे में लिए गए निर्णयों के दूरगामी परिणाम हो सकते थे। दादा जी महाराज ने इस संघर्ष काल में जोखिमभरे निर्णय लिए। तुरंत निर्णय लेना उनके परिवार की विरासत है। उनके निर्णय को कोई प्रभावित नहीं कर सकता था। पूज्य बाजी के अंतर्ध्यान होने के पश्चात उन्होंने एकला चलो की नीति अपनाई। वह किसी से भयाक्रांत नहीं हुए, क्योंकि आंतरिक अनुभूति से लिया गया निर्णय कभी गलत नहीं होता। (दादाजी की दात पुस्तक से साभार)
कल पढ़िए दादाजी महाराज का विवाह एवं परिवार के बारे में
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