ललित शाह ने अहमदाबाद से आगरा आकर पुस्तक लेखक डॉ. भानु प्रताप सिंह से की भेंट
ई-लाइब्रेरी में जैनिज्म पर पुस्तकों के 37 मिलियन पेज, 140 देश जुड़े, 500 करोड़ से काम
Agra, Uttar Pradesh, India. वर्ष 2013 में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भानु प्रताप सिंह की एक पुस्तक प्रकाशित हुई। शीर्षक था- जैन धर्म का प्रमुख केन्द्र थी फतेहपुर सीकरी। इसी पुस्तक को संशोधित रूप में निखिल पब्लिशर्स, आगरा ने प्रकाशित किया। शीर्षक रखा- क्या है फतेहपुर सीकरी का रहस्य। अब इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया जाएगा। साथ ही यह पुस्तक अमेरिका भेजी गई है, जहां जैनिज्म पर लिखी गई पुस्तकों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। इसके लिए जैन समाज ने 500 करोड़ रुपये दान में दिए हैं।
यह जानकारी कनाडा से लौटकर गुजरात के अहमदाबाद में निवासरत श्री ललित शाह ने दी। वे इन दिनों जैन मंदिरों का अवलोकन कर जानकारी जुटा रहे हैं। जैन साहित्य के बारे में जानकारी कर रहे हैं। भारत के हर जैन तीर्थस्थल पर जा रहे हैं। जयपुर निवासी डॉ. अनिल जैन ने उन्हें जैन धर्म और फतेहपुर सीकरी से संबंधित पुस्तक के बारे में जानकरी दी। फिर उन्होंने आगरा आकर पुस्तक लेखक डॉ. भानु प्रताप सिंह से होटल मुगल शेरेटन में भेंट की। उन्होंने पुस्तक को निःशुल्क लेने से इनकार कर दिया। पुस्तक का मूल्य चुकाया।
श्री ललित शाह ने बताया- यह पुस्तक ई लाइब्रेरी में जाएगी। इसका अंग्रेजी में अनुवाद होगा ताकि पूरी दूनिया जान सके कि जैन धर्म कितना प्राचीन है। पूरी दुनिया के 140 देश इस ई-लाइब्रेरी से जुड़े हुए हैं। यह ई-लाइब्रेरी अमेरिका में है और सभी पुस्तकें जैन धर्म के बारे में हैं। 37 मिलियन पेजेज उपलब्ध हैं। हमारे तीन बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
क्या है पुस्तक का सार
डॉ. भानु प्रताप सिंह ने ‘अमर उजाला’ आगरा में रिपोर्टर के बतौर 1999-2000 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) के साथ विश्वदाय स्मारक फतेहपुर सीकरी पर काम शुरू किया। उस समय अधीक्षण पुरातत्वविद थे डॉ. डीवी शर्मा, जो खोजी प्रवृत्ति के हैं। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि फतेहपुर सीकरी अकबर से पूर्व की है। उत्खनन में जैन मूर्तियां मिली तो पूरी कहानी ही बदल गई। 1000 साल पहले फतेहपुर सीकरी में जैन धर्म का प्रभुत्व था। मूर्तियों के साथ शिलालेख मिल गए। सभी मूर्तियां खंडित हैं। किसी आततायी ने जैन मूर्तियों को तोड़कर गड्ढे में दबा दिया। मूर्तियां हैं तो मंदिर भी रहे होंगे। इनका कुछ अता-पता नहीं है। यह भी प्रमाण मिले हैं कि फतेहपुर सीकरी का निर्माण अकबर ने नहीं बल्कि सिकरवारों ने कराया था। 1527 में राणा सांगा और बाबर के बीच खानवा युद्ध हुआ था। उस समय फतेहपुर सीकरी पर राजा धामदेव का शासन था। पराजय के बाद वे गहमर चले गए। गहमर में आज भी हर साल इस पर चर्चा होती है। तब फतेहपुर सीकरी का नाम विजयपुर सीकरी था। इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख है कि फतेहपुर सीकरी को अकबर ने बसाया लेकिन तथ्य कुछ और ही कहते हैं। इस दिशा में अधिक खोजबीन की जरूरत है।
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