हर बीती हुई साल देश की अवाम के सामने अपनी कुछ न कुछ विशेषता छोड़ जाती है- जिसको अवाम न भुलाने वाली घटना कह कर यादगार कहती दिखाई देती है। बीती साल के अनेक दिन और अनेक रातें ऐसी रहती हैं कि लोग उन्हें भुलाना भी चाहें तब भी उन्हें भूल नहीं पाते। शायद यह किसी भी बन्दे ने सोचा भी नहीं था कि 2020 में ऐसा भी समय आ सकता है कि इन्सान-इन्सान से दो गज की दूरी बना सकेगा- घर में आने से पूर्व उसे ‘बाथरूम’ में जाना पड़ेगा- पूरी दुनियाँ के बाजारों में ‘लॉक डाउन’ के द्वारा सन्नाटा दिखाई देगा। लोग अपने मुँह पर ‘मास्क’ लगाते हुये नजर आयेंगे। मरीजों के लिये डाक्टरों की खोज करने के बाद भी नदारद मिलेंगे। मरने वालों को कांधा देने के लिये परिवार के लोग भी नसीब नहीं होंगे।खैर 2020 साल इसी कशमकश में अब हम से विदाई ले रहा है। कोरोना वायरस की सर्द दहशत से शुरू हुआ 2020 वर्ष किसान भाइयों के आन्दोलन की तपिश के साथ खत्म होने जा रहा है।
इस 2020 वर्ष में यह भी साबित हो गया कि कौन अपना है और कौन पराया, कौन गरीबों का हमदर्द साबित हुआ और किसको अपनी नौकरी एवं व्यापार से हाथ धोना पड़ा, कौन हजारों मील पैदल चल कर भूखा- प्यासा अपने गाँव एवं अपने घर पहुँचा, इस कोरोना महामारी की त्रासदी से कौन किस तरह गुजरा या आज भी गुजर रहा है, खुद्दार इन्सान पूरी तरह खामोशी छाया हुआ दिखाई दे रहा है। इस कोरोना त्रासदी ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लाखों इन्सानों को निगल लिया। इस बारे में सोचते हुए दिल कांपने लगता है। हाँ अगर अपने देश भारत की आबादी का हिसाब लगाया जाये तो यह केवल एक प्रतिशत ही बैठता है। इसकी मुख्य वजह यह दिखाई देती है कि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम की दूरदृष्टि। इस टीम ने जैसे ही विश्व के देशों की स्थिति देखी, वैसे ही भारत की अवाम को इस त्रासदी की लपेट में न आने की विधि सोचते हुए कड़े कदम उठा कर विश्व पटल पर एक उदाहरण पेश कर दिखाया। विश्व की अजूबी इमारत ‘ताज महल’ सहित एक देश की अन्य ऐतिहासिक इमारतों के गेटों में ताले डाल कर विदेशियों को भारत आने से वंचित कर दिया, जो कि एक कड़ा और बेहतर कदम साबित हुआ। हालांकि इन विश्व प्रसिद्ध इमारतों से जुड़े लोग भुखमरी कगार पर आ गये थे परन्तु उन्हें फ्री अनाज देकर (थोड़ी बहुत ही सही) भूख मिटाने की भी कोशिश भी की थी। यही नहीं बल्कि जो इन्डियन विभिन्न देशों में फँसे थे- उन्हें भी स्वदेश लाने की जो कवायद मोदी सरकार ने की, उसे भी कभी भुलाया नहीं जा सकता है। अगर यह कहा जाये कि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष पहल ने पूरे विश्व को इस कोरोना महामारी जंग को जीतने के लिये एकजुट कर लिया तो गलत नहीं है।
पी.एम. मोदी की एक आवाज पर हमारे देश की 135 करोड़ जनता लॉकडाउन में रहने के लिये तैयार हुई, यह भी एक आश्चर्यजनक घटना कही जा सकती है। मोदी के कदम उठाने की तारीफ मोदी सरकार के विपक्षी दलों ने भी दबी जुबान से की थी। एक बुजुर्गवार का यह कहना कि लगभग 100 दिनों के लॉकडाउन से ठप पड़ी देश की आर्थिक रफ्तार अगर दोबारा पटरी पर लौट पाने में कामयाबी के पीछे भी मोदी की सोच और कार्यप्रणाली कहा जाये तो उचित ही है। इन सबके बावजूद चीन ने 2020 में जो हरकतें की उससे भी देश की जनता पूरी तरह वाकिफ है, लेकिन चाइना को कोरोना महामारी रूपी जंग को जीतने का संकल्प लेते हुए जिस तरह की चीन सरकार को आंखें दिखाई और भारतीय सेना की हौसला अफजाई की वह भी कभी भुलाई नहीं जा सकती। कश्मीर से धारा 370 का खात्मा, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से छुटकारा दिलाने का तोहफा और अयोध्या में राम मन्दिर प्रकरण की समाप्ति, यह सब भी सन् 2020 की देन कही जासकती है।
अब 2020 के समाप्त होने वाले आखिरी माह पर रोशनी डालें तो दिखाई देगा कि ”सबका साथ-सबका विकास और सब का विश्वास“ की नीति पर काम करने वाली मोदी सरकार के सामने साल समाप्ति के आखिरी दिनों में किसान आन्दोलन रूपी जाल में फंस गई। इस जाल को सुलझाने का यह सरकार पूरा-पूरा प्रयास तो कर रही है परन्तु कामयाब हो पाती है या नहीं अभी उस वक्त का इन्तजार करना पड़ रहा है। हालांकि किसानों और सरकार के बीच कई दौर की बातचीत भी सम्पन्न हो चुकी है लेकिन अभी कोई हल नहीं निकला है। सरकार इसके पीछे विपक्षी पार्टियों का हाथ मान रही है जबकि विपक्षी पार्टियां किसानों की हां में हां मिलाते हुए केन्द्र सरकार की हठधर्मी मान कर किसानों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इसी संदर्भ में जब मैंने गैर किसान बिरादरी के लोगों के विचार जाने तो उनका स्पष्ट कहना था कि किसान अन्नदाता हैं, अपना हक मांगते हुए इस भीषण सर्दी में एवं अपना परिवार घरबार छोड़ते हुए खुले मैदान में बैठा हुआ है। सरकार को अपनी हठधर्मी को त्याग कर अन्नदाताओं की मांगों को मान लेना ही चाहिये। इस संदर्भ पर अनेक आम लोगों ने वर्तमान राजनीति पर कमेन्ट्स करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस 2020 वर्ष के अन्तिम माह में किसान आन्दोलन में सियासत के घुस जाने से ही किसान अपना सीना चौड़ा किये हुये दिखाई दे रहे हैं। इस किसान आन्दोलन में सियासत के प्रवेश करने की बात प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम भी चिल्ला-चिल्ला कर कह भी रही है जबकि देश की आम जनता किसान और गैर किसान वर्ष 2021 प्रारम्भ होने से पहले इसका हल चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी शायद देश की 130 करोड़ जनता सोच भी समझ गये हैं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि वह ‘तेल देखो- तेल की धार देखो’ जैसे पुरानी कहावत तो नहीं अपना रहे हैं।
बहरहाल सन् 2020 कोरोना महामारी – बेरोजगारी – लॉकडाउन और किसान आन्दोलन जैसी दुश्वारियों से गुजरा है। यह ऐसी दुश्वारियां हैं जिन्हें भूल पाना बहुत मुश्किल है। आखिर में पुनः किसान आन्दोलन की बात करते हुए यही कहना चाहूंगा कि नरेन्द्र मोदी हर समस्या को गहराई से लेते हुये उसका हल खोज लेते हैं, इसलिये उम्मीद है कि इस किसान आन्दोलन की समाप्ति का हल भी उन्होंने सोच ही लिया होगा। वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लोहा पूरा विश्व मान रहा है। ‘खुदा’ से दुआ है कि आने वाला साल सन् 2021 देश के लिये देश की 130 करोड़ अवाम के लिये खुशियों से भरा साबित हो।
–डॉ. सिराज कुरैशी
भारत सरकार द्वारा कबीर पुरस्कार से सम्मानित
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