आरएसएस के आगरा विभाग ने मनाई नारद जयंती, वर्चुअल सभा में 318 लोग जुड़े
Agra, Uttar Pradesh, India. वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व सांसद एवं पांचजन्य के पूर्व संपादक तरुण विजय का कहना है कि अगर पत्रकारिता का संबंध लोकमंगल से नहीं है तो वह इश्तिहारबाजी है। लोकमंगल के अलावा किसी अन्य कारण के लिए मीडिया का इस्तेमाल तो वे पम्पलेट (पत्रक) कहे जाएंगे। श्मशान पत्रकारिता और सेवा की पत्रकारिता में बहुत अंतर है। सेवा की पत्रकारिता का मतलब है कमियों को उजागर करते हुए लोकमंगलकारी भावना से अच्छे कार्य को प्रकाशित जाए। सकारात्मक बात न छापना, पत्रकारिता का मानक नहीं हो सकता है। सरकारी संरक्षण के बिना सरकार के विरुद्ध लिखने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें लोकमंगल है। ईसाई धर्मांतरण और कम्युनिस्ट भारत के सबसे बडे शत्रु हैं।
318 लोगों ने किया प्रतिभाग
तरुण विजय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आगरा विभाग द्वारा प्रथम पत्रकार नारद जी की जयंती एवं हिन्दी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष में आयोजित वर्चुअल सभा को संबोधित कर रहे थे। विषय था- लोकमंगल की कामना और देवर्षि नारद। अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं जनसंदेश टाइम्स के कार्यकारी संपादक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने की। उन्होंने नारद के चित्र पर माल्यार्पण कर सभा का शुभारंभ किया। सभा में 318 लोगों ने प्रतिभाग किया। संघ के पश्चिमी महानगर प्रचार प्रमुख विनीत शर्मा के कुशल संचालन में भरत ने गीत प्रस्तुत किया। फतेहपुर सीकरी के राहुल ने धन्यवाद दिया। केसर सिंह ने अतिथियों का परिचय कराया। संघ के विभाग प्रचार प्रमुख मनमोहन निरंकारी ने कार्यक्रम का संयोजन किया। संघ के वरिष्ठ प्रचारक पदम, डॉ. हरीश रौतेला, कीर्ति कुमार, केशव शर्मा ने कार्यक्रम के लिए मार्गदर्शन किया।

लोकमंगल का अर्थ
उन्होंने कहा- आपदा के समय या तो संघ के स्वयंसेवक या पत्रकार आगे होते हैं। लोकमंगल के कार्य में प्राण गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि देते हुए पूछा कि लोकमंगल का अर्थ क्या है? आग लगी है और व्यक्ति जल रहा है, पत्रकार कैमरे के साथ पहुंचकर शूटिंग करने लगता है। उससे पूछा जाए कि क्या शूटिंग पहला काम है या व्यक्ति को बचाना। कई पत्रकार कहेंगे कि मेरा कार्य बचाना नहीं है। मेरा काम रिपोर्टिंग करना है। बहुत से लोग इससे असहमत होंगे। वे कहेंगे- पत्रकारिता का धर्म मनुष्यता से बड़ा नहीं हो सकता है। पत्रकार का समाज के लिए क्या कोई दायित्व नहीं है। पत्रकार फोटो भी ले सकता है और बचाने का भी प्रयास कर सकता है।
नारद से सीखें पत्रकारिता का धर्म
तरुण विजय ने कहा- स्वतंत्रता संग्राम में प्राणों की आहुति देने वाले पत्रकार हुए हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद, सुभाष चन्द्र बोस, गणेश शंकर विद्यार्थी, पं. दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी प्रारंभ में पत्रकार ही थे। उन्होंने अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पत्रकारिता की। पत्रकारिता की भारतीय परंपरा अंग्रेजों की चाटुकारिता नहीं रही है। कलम का धर्म वह है, जिसमें समाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत करते हैं। कोरोना के इलाज में कदाचार हो रहा है, भ्रष्टाचार हो रहा है, उनको उजागर करना पत्रकारिता का धर्म है। नारद जहां भी जाते थे, वे सत्य, न्याय, धर्म की बात करते थे। समाज की मर्यादा हनन करने वालों के पक्ष में कोई बात नहीं रखी। यही पत्रकारिता का धर्म है।

अखबार के नाम पर अनेक छद्मवेशी पत्रकार
उन्होंने कहा कि अखबार के नाम पर अनेक छद्मवेशी पत्रकार हैं। कोरोना के नाम पर 2015 के श्मशान घाट के चित्र और 2018 में गंगा में बहाए गए शवों के चित्र छापे गए हैं। इससे किसका कल्याण हो रहा है। अमेरिका, यूरोप और जर्मनी में भारत से अधिक कोरोना से हानि हुई है। जापान में मेडिकल सुविधाएं अपर्याप्त हैं। लेकिन पूरे विश्व में एक ही बात कि भारत में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। इससे किसका लोकमंगल है?
पत्रकारिता पर राजनीति छाई
उन्होंने चिन्ता प्रकट की कि हमारी संपूर्ण पत्रकारिता पर राजनीति बहुत अधिक छा गई है। साहित्यकार की अच्छी कृति प्रथम पृष्ठ पर नहीं छपती। किसान की फसल नष्ट तो उसकी भरपाई कैसे होगी, इससे किसान के जीवन पर क्या असर पड़ेगा, यह पहले पेज पर नहीं आता। किसी किसान ने छोटे से क्षेत्रफल में अधिक फसल पैदा की तो यह उदाहरण कभी सामने नहीं आता है। भारत 75 प्रतिशत किसानों का देश है, फिर भी उनका समाचार नहीं। एक करोड़ की गाड़ी में आने वाले छद्म किसान हैं। जेनेरिक मेडिसन के बारे में कितने समाचारपत्र सामान्यजन को बताते हैं?
ये कैसे राष्ट्रीय अखबार
तरुण विजय ने आवेशित होकर कहा- स्वयं को राष्ट्रीय समाचार पत्र कहने वाले दिल्ली से नोएडा तक की खबरें ही छापते हैं, अन्य राज्यों के समाचार महत्व के साथ नहीं छपते हैं। समाज का दुख-दर्द कौन सा मीडिया दिखाता है? राष्ट्रीय समाचार पत्रों में मिजोरम, मणिपुर के समाचार नहीं आते हैं । होली पर बरसाने की लठामार होली की बात सभी समाचार पत्र लिखते हैं लेकिन मेरा मानना है कि मणिपुर से अच्छी होली कहीं नहीं होती है। वहां पांच दिन होली चलती है। सबकुछ बंद रहता है। फूलों के रंग से होली होती है। पूजा के बाद मिष्ठान्न वितरण और रंग खेलते हैं। प्रत्येक गांव में पांच दिन क्रीड़ा महोत्सव होता है। सुबह से लेकर रात तक स्वदेशी खेल होते हैं।
चीन और पाकिस्तान के बारे में
उन्होंने कहा- चीन और पाकिस्तान भारत की शांति को भंग करते हैं। जिहाद का आक्रमण हो रहा है, कितने समाचार पत्र इस तरह के इस्लामिक संगठनों के बारे में सत्य उद्घाटित करने वाले हैं। नक्सलवाद और माओवाद आतंकवाद है। 86 हजार भारतीयों की हत्या हुई है। 14 साल के बच्चों को जबरन उठाकर आतंकवादी बनाते हैं। नक्सलियों के पक्ष में रिपोर्टिंग करना कलुष है। धर्मनिरपेक्ष का अर्थ जैसे हिन्दू धर्म का विरोध मान लिया गया है, वैसे ही खेल का मतलब क्रिकेट है। पूरा पेज आता है अखबारों में। केरल, मणिपुर, अरुणाचल में धनुष विद्या के खेल के बारे में कोई लेख नहीं आता है, क्यों?
अमेरिका और भारत की पत्रकारिता
तरुण विजय ने जानकारी दी कि अमेरिका में 9/11 के हमले में एक भी शव का चित्र कहीं नहीं छपा न टीवी पर दिखाया गया। अमेरिका में मीडिया का आत्मस्वीकृत नियम है कि समाज की दारुणता को नहीं दिखाना। यह क्या भारत में लागू हो सकता है? गणेश शंकर विद्यार्थी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजेन्द्र माथुर, विद्यानिवास मिश्र की पत्रकारिता में लोकमंगल था। वर्तमान में यह विलुप्त हो चुका है। लोकरंजन देखें तो बॉलीवुड में हिन्दू रीति-रिवाजों और आध्यात्मिक पुरुषों को पतित के रूप में दिखाया जा रहा है। नकारात्मकता की रक्षा की जा रही है। भारतीय के विरुद्ध लिखना धर्मनिरपेक्षता हो गई है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए।
युवा पत्रकारों को संदेश
उन्होंने युवा पत्रकारों को संदेश दिया- भाषा पर पकड़ होनी चाहिए। जिसके हाथ में मोबाइल है, वह अपने क्षेत्र में बड़ी जागृति कर सकते हैं। ईसाई धर्मांतरण और कम्युनिस्ट भारत के सबसे बडे शत्रु हैं। इनके बारे में पढ़ें। पत्रकारिता की पहली आवश्यकता पुस्तकें पढ़ना है। इससे भाषा पर पकड़ होगी, अच्छे शब्द मिलते हैं और ज्ञान बढ़ता है। आपके आसपास राष्ट्रविरोधी गतिविधियां हो रही हैं तो तथ्यों के साथ लिखें।
लोकमंगल की भावना केवल हिन्दू ग्रंथों में
अध्यक्षता करते हुए डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा कि केवल हिन्दू समाज ही लोकमंगल की कामना करता है। वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात केवल हिन्दू ग्रंथों में है और कहीं नहीं। उन्होंने सवाल किया कि क्या लोकमंगल केवल मीडिया की जिम्मेदारी है? क्या सत्तासीन लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? कोरोना के कारण तमाम मीडिया संस्थान बंद हो रहे हैं, आर्थिक संकट है, संपादीकय विभाग को विज्ञापन विभाग नियंत्रित करने लगा है, फिर भी पत्रकार यथासंभव लोकमंगल करते रहते हैं। सुझाव दिया कि राष्ट्रवादी पत्रकारों का संगठन बनना चाहिए।
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