आगरा में यमुना आरती स्थल पर जागी आध्यात्मिक चेतना, कवियों के शब्द बने भक्ति की आरती

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🌊 कालिंदी के तट गूंजा काव्य-संगीत: यमुना मैया की महिमा में डूबा ताज नगरी का आध्यात्मिक समागम

यमुना आरती स्थल पर भक्ति और साहित्य का संगम

Live Story Time, Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat. आगरा की पावन धरती पर ताज महोत्सव के अंतर्गत यमुना आरती स्थल, हाथी घाट रोड पर माँ यमुना को समर्पित भव्य आध्यात्मिक कवि सम्मेलन का दिव्य आयोजन संपन्न हुआ। तारक सेवा संस्था एवं नगर निगम आगरा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और चेतना का अद्भुत संगम बन गया। यमुना की लहरों के बीच शब्दों की आरती उतारी गई—और वातावरण सचमुच आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।

विद्वत्‌जनों की गरिमामयी उपस्थिति से सुसज्जित मंच

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. उमापति दीक्षित जी ने की। मंच पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवयित्री डॉ. रुचि चतुर्वेदी जी, डीजीसी कवि श्री अशोक चौबे जी, ओजस्वी कवि श्री सचिन सारंग जी तथा मथुरा से पधारे कवि श्री रंजन मिश्र ‘बिरागी’ जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। यह संगति अपने आप में एक सांस्कृतिक पर्व का संकेत थी—जहाँ शब्द साधना बनते हैं और कविता आराधना।

ओजस्वी संचालन से आलोकित हुआ समूचा वातावरण

राष्ट्रीय कवि श्री पदम गौतम जी ने अपने प्रभावी एवं ओजस्वी संचालन से कार्यक्रम को ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी वाणी में वह तेज था जो श्रोताओं को केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा से अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है। संयोजन कौशल और आध्यात्मिक भावधारा का ऐसा संतुलन विरले ही देखने को मिलता है।

काव्य के माध्यम से माँ यमुना की महिमा का गान

कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से माँ यमुना की महिमा का स्तवन किया और साथ ही सनातन संस्कृति की रक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण का स्पष्ट संदेश दिया। उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर होकर काव्य-रस में डूबते रहे। प्रत्येक पंक्ति मानो एक मंत्र बनकर वातावरण में गूंजती रही—

डॉ. रुचि चतुर्वेदी जी की भावपूर्ण प्रस्तुति:

यमुना जल सौ यदि नैन धुलें तौ नैन अमर धुन गामेंगे।
वृषभानु सुता की छवि यमुना के तट मन के पट पामेंगे,
कालिंदी के कूल दुकूलन पै हिय फूलन नेह चढ़ामेंगे ।
यमुना मैया की जय जय कहि भव सागर से तर जामेंगे।।

श्री अशोक चौबे जी की चिंतनशील पंक्तियाँ:

जीने के लिए रोज खुद को मारते है लोग
ये किस तरह से जिंदगी गुजारते है लोग
दुनिया को जितने का इरादा किये हुए
क्या शौक से जमीन तलक हारते है लोग

श्री पदम गौतम जी का भावपूर्ण उद्गार:

श्याम-सुधा सी बह रही माँ यमुना की धार,
जिसके पावन स्पर्श से कटते कष्ट अपार॥

श्री सचिन सारंग जी की समर्पण भावना:

कृष्ण प्रिया लीला सरिता को हम सब शीश झुकाते हैं,
शब्दों की समिधा अर्पित कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं

श्री रंजन मिश्र ‘बिरागी’ जी की भक्तिमयी अभिव्यक्ति:

राधा रानी की धरती जो मीरा माँ की परिपाटी है
प्रेम – भक्ति की ख़ुशबू जिसके तीरे -तीरे आती है
भानुजा अर्कज़ा रवितनुजा का सत अभिनंदन करते हैं
हम दोनों हाथ उठा कर के कालिंदी वंदन करते हैं ।।

सांस्कृतिक चेतना और पर्यावरण संदेश का समन्वय

यह आयोजन केवल काव्य पाठ तक सीमित नहीं रहा। माँ यमुना की स्वच्छता, संरक्षण और सनातन संस्कृति की रक्षा का संदेश भी पूरे प्रभाव के साथ दिया गया। भक्ति और जिम्मेदारी का यह संतुलन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब तक नदी को केवल जलधारा समझा जाएगा, संकट रहेगा; जब उसे माँ मानेंगे, समाधान स्वयं जन्म लेगा।

✍️ संपादकीय: यमुना के तट से उठती चेतना की पुकार

ताज नगरी में आयोजित यह कवि सम्मेलन हमें एक गहरी बात याद दिलाता है—सभ्यता नदियों के किनारे जन्म लेती है, और संस्कृति उन्हीं के संरक्षण से जीवित रहती है। यमुना केवल एक नदी नहीं, वह भारतीय मानस की आध्यात्मिक धारा है। श्रीकृष्ण की लीलाओं से लेकर संत परंपरा तक, कालिंदी ने सदियों से भक्ति का सेतु बनाया है।

आज विडंबना यह है कि हम विकास की दौड़ में नदियों को प्रदूषण का पात्र बना बैठे हैं। श्रद्धा शब्दों में है, लेकिन व्यवहार में कमी है। ऐसे आयोजनों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब कविता से निकली चेतना व्यवहार में उतरे। केवल “जय-जय” कहने से नहीं, बल्कि यमुना तट को स्वच्छ रखने के संकल्प से आध्यात्मिकता साकार होगी।

साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, दिशा-सूचक भी है। जब कवि मंच से पर्यावरण और संस्कृति की बात करता है, तो वह केवल भाव नहीं जगा रहा होता—वह भविष्य गढ़ रहा होता है। आगरा का यह आयोजन इसी दिशा में एक सशक्त कदम है।

समय आ गया है कि हम यमुना को उत्सवों की पृष्ठभूमि नहीं, जीवन की आधारशिला मानें। आध्यात्मिकता का अर्थ पलायन नहीं, संरक्षण है। संस्कृति का अर्थ केवल परंपरा नहीं, जिम्मेदारी है।

कालिंदी पुकार रही है—क्या हम सुन रहे हैं?

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डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक