हूजरी भवन, पीपल मंडी, आगरा राधास्वामी (Hazuri Bhawan, Peepal mandi, Agra) का आदि केन्द्र है। यहीं पर राधास्वामी मत (Radha Soami Faith) के सभी गुरु विराजे हैं। राधास्वामी मत के वर्तमान आचार्य और अधिष्ठाता दादाजी महाराज (प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर) हैं जो आगरा विश्वविद्यालय (Agra university) के दो बार कुलपति (Vice chancellor of Agra university) रहे हैं। हजूरी भवन (Hazuri Bhawan, Peepal Mandi, Agra) में हर वक्त राधास्वामी (Radha Soami) नाम की गूंज होती रहती है। दिन में जो बार अखंड सत्संग होता है। दादाजी महाराज ने राधास्वामी मत (RadhaSomai faith) के अनुयायियों का मार्गदर्शन करने के लिए पूरे देश में भ्रमण किया। इसी क्रम में 26 अक्टूबर, 1999 को दादाजी महाराज कोटरा, पुष्कर रोड, अजमेर (राजस्थान) में सतसंग के दौरान दादाजी महाराज (Dadaji maharaj Prof Agam Prasad Mathur) ने कहा- अंतर्मुख साधना करो क्योंकि स्वाभाविक रूप से जो सारे शब्द हैं, वह धुन हैं यानी आवाज देते हैं। उससे ही सारे संसार का कारखाना चल रहा है।
गोश्त व अंडा मत खाओ और शराब मत पियो
हम जीवात्मा को सुरत कहते हैं, उस अनाहदी धुन को शब्द कहते हैं और इस अभ्यास को सुरत-शब्द-योग कहते हैं। इसमें न गृहस्थी छुड़वाते हैं न काम-काज, न तुम्हारा समाज और न तुम्हारी दिनचर्या। एक ही चीज वो कहते हैं कि गोश्त व अंडा मत खाओ और शराब मत पियो। यह ‘करो और देखो’ का मत है। इसमें राधास्वामी नाम को कुलमालिक का नाम कहते हैं।
राधास्वामी नाम का सुमिरन करके देख लो
तुम बहुत कुछ जाप और सुमिरन करते हो, जरा यह भी सुमिरन करके देखो। अगर ठीक बैठे तो चले आइए। जिस तरह से मैं कहता हूं राधास्वामी नाम का सुमिरन करके देख लो, अगर आंतरिक शांति आती है तो करते रहो और फिर आपकी अपनी क्षमता पर भी निर्भर करता है किन्तु इतना जरूर है कि हर एक को किसी न किसी चीज की आदत होती है। इसी तरह से ऐसी आदत भी हो सकती कि उस धुन को सुनने की आदत हो जाए। मैं चाहता हूं कि यह आदत भी बदली जाए और इरादा भी बदला जाए।
फिर काम तुरंत बन जाएगा
जो बाहर से फँसाव का इरादा रहा है, उसमें तो कुछ मिला नहीं बल्कि तनाव और अशांति मिली, तो क्यों न अंतर की तरफ मुड़कर देखा दाए। यदि इरादा करोगे तो धीरे-धीरे आप से आप नाम के सुमिरन की आदत हो जाएगी और शब्द को सुनने की भी और काम तुरंत बन जाएगा। मेरी इस बात को हृदय पटल पर जाकर सोचिएगा।
राधास्वामी नाम सदा सुखदाई,
जिन सुमिरा तिन ही गति पाई।
लीला अगम अपार,
मन और सुरत अधर चढ़ाकर।
शब्दारस तू गहरा पाकर,
तब सुनो राधास्वामी नाम झनकार।
(क्रमशः)
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