मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे (Mother’s day) रूप में मनाया जाता है। इस बार मदर्स डे 9 मई को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं मदर्स डे की शुरुआत कैसे हुई-
अमेरिका में एना जार्विस नाम की एक महिला थी| वह अपनी मां की मृत्यु के पहले उसकी खुशियों को सेलिब्रेट करना चाहती थी| उन्होंने अपनी मां की मृत्यु के तीन साल बाद 1908 में एक स्मारक बनाया| वेस्ट वर्जीनिया के सेंट एंड्रयूज मेथोडिस्ट चर्च में यह स्मारक बनाया गया| तब से संयुक्त राज्य अमेरिका में मदर्स डे को छुट्टी के रूप में मान्यता देने के लिए एक अभियान शुरू किया गया| इसके बाद 9 मई, 1914 को अमेरिकी प्रेसिडेंट वुड्रो विल्सन ने एक कानून पारित किया था। इस कानून में लिखा था कि मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाएगा। इसी के बाद से भारत समेत कई देशों में ये खास दिन मई के दूसरे रविवार को मनाया जाने लगा। बाद में इस परंपरा को कई और देशों ने निभाया।
भारत में तो जन्म से लेकर निधन तक न तो माँ आँचल छूटता है न माँ के प्यार का सुखद अहसास। यह अलग बात है कुछ देशों को छोड़कर अन्य देशों जैसे अमेरिका और यूरोपीय देश की परम्परा व रहन-सहन में फ़र्क़ है| इसलिए एक खास दिन को मां के नाम निश्चित कर दिया गया है। वहां बच्चे हर खुशी का ध्यान रखने वाली मां के साथ इस खास दिन को बिताते व मानते हैं। मदर्स डे लोगों को अपनी भावनाओं को जाहिर करने का मौका देता है।
भारत में भी पश्चिम देशों का असर व काम के व्यवहार में बदलाव आ गया है। माँ का योगदान हर किसी के जीवन में होता है| उसे नकार नहीं सकते फिर चाहे माँ को ऑफिस और घर दोनों जगह में संतुलन क्यों न बैठना पड़ा हो, मां ने कभी भी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा है। वो बहुत अभागे होते हैं, जिन्हें माँ का आँचल नसीब नहीं होता है| माँ एक नहीं अनेक विधाओं से परिपूर्ण होती है| उसकी डांट में प्यार भी होता है और सबक भी। जाने-माने शायर मुनव्वर राना ने ठीक ही कहा है-
इस तरह वो मेरे गुनाहों को धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
भारत में अनादि काल से माँ की महिमा का उल्लेख है| कोरोना महामारी में माँ, बच्चे को छाती से लगाकर इलाज के लिए भाग रही है। ज़रूरत पर माँ ही अपना अंगदान करती हैं| भारतीय फ़िल्मों में माँ की अदभुत शक्ति का चित्रण किया है| मदर इंडिया फिल्म जितनी बार देखो कम है। यहाँ दीवार फ़िल्म के एक संवाद ‘मेरे पास माँ है’ ने साबित कर दिया माँ से बड़ी कोई पूँजी नहीं है| आज भी 90 प्रतिशत भारतीय ख़ुशनसीब हैं, जो माँ-बाप के साथ रहते हैं ।
हमारे देश में भी रोज़गार के लिए लोगों को अपना शहर और माँ को छोड़ कर दूर जाना पड़ता है। इस मदर्स डे के खास मौके पर अपनी मां के साथ समय बिताएं। वो सब करें जो व्यस्त होने के कारण आप नहीं कर पाते। मां को खास तोहफे देकर जरूर खुश करें। सम्भव हो माँ को अपने साथ रखें या साथ रहें । हमेशा भगवान से माँगे- ‘मुझे माँ का साया नसीब हो’। वास्तव में हर परेशानी की एक दवा मां है। माँ को परिभाषित करना असंभव है। माँ तुझे प्रणाम।
राजीव गुप्ता ‘जनस्नेही’, आगरा
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भानु प्रताप सिंह द्वारा लिखित उपन्यास ‘मेरे हसबैंड मुझको प्यार नहीं करते’ खरीदने के लिए यहां क्लिक करें –
- Foxygold Casino Biedt Echt Geld Spelen Op Zijn Best in Nederland - September 16, 2026
- Πώς το Mostbet Casino Υποστηρίζει το Ασφαλές Παιχνίδι στην Ελλάδα - September 15, 2026
- PinoCasino in Nederland: Licentie en Veiligheidsoverzicht voor Gokkers - September 15, 2026