Agra, Uttar Pradesh, India. देश भर के 65,400 निजी स्कूलों के सबसे बड़े गठबंधन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलायंस (NISA) ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से माँग की है कि दसवीं कक्षा के सभी छात्रों को उनके पसंदीदा विषयों के चयन की अनुमति देते हुए ग्यारहवीं कक्षा में प्रोन्नत किया जाए। सीबीएसई की 2021 की दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं की अंक सारणीकरण प्रणाली को चुनौती देते हुए नीसा ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और देश भर में सीबीएसई छात्रों के न्याय को सुनिश्चित करने के लिए इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए गुहार लगाई है ।
देश भर में COVID-19 मामलों में वृद्धि के मद्देनजर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने 14 अप्रैल को सीबीएसई की दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा 2021 को रद्द करने की घोषणा की थी । उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि सभी सीबीएसई छात्रों को बोर्ड द्वारा विकसित एक वस्तुनिष्ठ मानदंड, के आधार पर ग्यारहवीं कक्षा में प्रोन्नत किया जाएगा।
एक मई को सीबीएसई ने एक 17-पृष्ठ की अधिसूचना जारी की, जिसमें न केवल दसवीं कक्षा की परिणाम सारणीकरण नीति को विस्तार से समझाया गया है, बल्कि उन स्कूलों की संबद्धता समाप्त करने के लिए भी कहा गया है जो बोर्ड द्वारा निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया का पालन नहीं करेंगे। अधिसूचना में स्कूलों को सात शिक्षकों की एक परिणाम समिति का गठन करने के लिए कहा है जिनमें से दो बाह्य शिक्षक होंगे, ताकि छात्रों को आवंटित किए जा रहे अंकों को तर्कसंगत रूप से तैयार किया जा सके। विद्यालयों से विस्तृत मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी करने और जून के पहले सप्ताह में परिणाम अपलोड करने के लिए कहा गया है , अब वे मूल्यांकन प्रक्रिया के बारे में शिकायत कर रहे हैं कि यह प्रक्रिया स्कूलों के साथ-साथ छात्रों के लिए भी अनुचित है।
इस संदर्भ में NISA के क्षेत्रीय समन्वयक उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड तथा राष्ट्रीट संयोजक नीसा एजुकेशन फण्ड नेशनल इंडिपेंडेंस स्कूल एलायन्स डॉ. सुशील गुप्ता, का कहना है कि “स्कूलों द्वारा अंकों की अनाधिकृत वृद्धि से बचने के लिए बोर्ड ने प्रत्येक स्कूल को उसके अनिवार्य औसत प्रतिशत के करीब अंक रखने के लिए कहा है। हालांकि, ग्रामीण और शहरी वातावरण में स्कूलों के प्रदर्शन में असमानता पर विचार किए बिना सामान्य औसत स्कोर तक पहुँचने के बाद, अधिकांश स्कूलों का अंतिम स्कोर स्कूल के अपेक्षित स्कोर से काफी नीचे जा रहा है । यह प्रतीत होता है कि बोर्ड को स्कूलों पर विश्वास नहीं है, बोर्ड संभावित मुद्दों से अनभिज्ञ है, क्योंकि स्कूल पहले से ही अधिकांश आंतरिक अंकों को माता-पिता के साथ साझा कर चुके हैं। इस प्रक्रिया से छात्रों में निराशा तो आएगी ही साथ ही स्कूल भी अभिभावकों को ये समझाने मे असमर्थ रहेंगे कि अब उनके बच्चों के अंक कम कैसे हो गए? जिससे अभिभावक न्याय प्रक्रिया की ओर जाने के लिए बाध्य होंगे।”
डॉ. गुप्ता का यह भी मानना है कि बोर्ड की नीति सीबीएसई स्कूल के शिक्षकों को जोखिम में डालती है। 4 मई को सीबीएसई के अध्यक्ष को पत्र लिखते हुए, नीसा ने बोर्ड को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था, साथ ही उस पत्र में यह भी कहा गया था कि बोर्ड का ये निर्णय “स्वास्थ्य संकट काल के दौरान तर्कसंगत तो है परंतु मानवीय नहीं है ।” नीसा का मानना है कि मूल्यांकन के लिए स्कूलों में शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों को बुलाए जाने का निर्णय जोखिम भरा है क्योंकि अधिकांश राज्यों ने पहले ही आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत लॉकडाउन लगाया हुआ है और राज्य के शिक्षा विभागों द्वारा भी स्कूलों को बंद करने के आदेश जारी किए गए हैं।
डॉ. गुप्ता का कहना है कि “यह हास्यास्पद ही है कि सीबीएसई बोर्ड को इस बारे में स्मरण कराने की आवश्यकता पड़ रही है कि वर्तमान महामारी की स्थिति कितनी भयंकर है, इसके बावजूद कि हजारों शिक्षक पहले ही कोविड -19 पॉजिटिव हो चुके हैं और कई ने पिछले कुछ दिनों में अपना जीवन खो दिया है। जहाँ एक ओर राज्यों की सरकारें लोगों को घर के अंदर रहने के लिए कह रही हैं वहीं बोर्ड, शिक्षण समुदाय को स्कूल आने के लिए बाध्य करके उनके लिए जोखिम बढ़ा रहा है। इस कार्य के लिए शिक्षकों के साथ साथ सहायक कर्मचारियों एवं तकनीकी कर्मचारियों की भी आवश्यकता होगी परंतु परिवहन की उपलब्धता ना होने के कारण विद्यालयों को इसमें भी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
नीसा ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल और स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन को सीबीएसई को दसवीं कक्षा, 2021 की बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम सारणीकरण की अपनी नीति पर पुनर्विचार करने का निर्देश देने के लिए भी पत्र लिखा है।
इसी बीच अभिभावक संघ चाहते हैं कि बोर्ड इस वर्ष नियमित परीक्षा के अभाव में छात्रों से लिया गया परीक्षा शुल्क वापस करे । सीबीएसई बोर्ड ने इस वर्ष परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए नामांकित 17 लाख से अधिक छात्रों से लगभग 282.78 करोड़ रुपये परीक्षा शुल्क के रूप में एकत्र किया है । अभिभावकों का कहना है कि “हमें विश्वास नहीं है कि सीबीएसई बोर्ड द्वारा शुरू की जा रही नई मूल्यांकन प्रक्रिया निष्पक्ष होगी क्योंकि छात्रों के इस प्रक्रिया में सम्मिलित न होने के कारण यह प्रक्रिया पूरी तरह एकपक्षीय हो जाएगी। परीक्षा परिणाम महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन परिणामों का हमारे बच्चों के करियर व भविष्य पर प्रभाव पड़ेगा। अगर विद्यालय ही ये काम करने में पूर्णतः समर्थ थे, तो हमें परीक्षा आयोजित करने के लिए बोर्ड की आवश्यकता क्यों थी ? इसलिए या तो बोर्ड यह सुनिश्चित करे कि छात्र नियमित परीक्षा दें या बोर्ड परीक्षा शुल्क वापस करे, अन्यथा देश भर के अभिभावक संघ न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने के लिए तैयार हैं l
डॉक्टर गुप्ता ने इस संदर्भ में बताते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय में दिनांक 13 मई को शुरू हो चुकी है। जिसकी अंतिम तारीख न्यायालय द्वारा 25 मई, 2021 को सुनिश्चित की गई है । डॉ. गुप्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय की सराहना करते हुए कहा कि ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान जहाँ एक और न्यायालय नए मामलों को नहीं लेते हैं वही इस मामले की गंभीरता और अति आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए न्यायालय द्वारा प्राथमिकता देते हुए इस मामले पर कार्यवाही शुरू की गई। हमें आशा है कि न्यायालय द्वारा अवश्य ही छात्र एवं शिक्षक हित में कोई निर्णय सुनाया जाएगा।
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