Agra, Uttar Pradesh, India. नववर्ष का प्रारम्भ एक सार्थक परिचर्चा, सामाजिक सहभागिता और एक पुनीत कर्तव्य के निर्वहन से हुआ। अवसर था समाज हित के लिये आत्माहुति देने वाले वीर बलिदानी गोकुल सिंहजी जाट के बलिदान पर जाट वेलफेयर ऐसोसियेशन आगरा के तत्वावधान में सुनारी चौराहा, शास्त्रीपुरम में हवन एवं श्रध्दांजलि सभा हुई। आचार्य यादराम सिंह वर्मा कविकिंकर और वयोवृद्ध अतरसिंह मुखिया ने सभा की अध्यक्षता की।
कविकिंकर ने बताया कि औरंगजेब बादशाह ने अपनी अधार्मिक धर्मान्धता के चलते मथुरा के केशव देव मन्दिर को तोड़ने का उपक्रम किया। औरंगजेब के प्रतिनिधि कारिंदों के अत्याचार से अनैतिक आचरण से पहले ही समाज में रोष था। परिणामत: वीर गोकुल सिंह जाट के नेतृत्व में मथुरा और तत्पार्श्विक क्षेत्र की जनता ने विद्रोह कर दिया। औरंगजेब के दो सेनापति मारे गये तो जाटों के इस विद्रोह को दबाने के लिये औरंगजेब को खुद सेना का नेतृत्व करना पड़ा। तीन दिन तक यह युद्ध चला। शायद ही अन्यत्र कोई ऐसा उदाहरण मिले जब सामान्य जन के नेतृत्व में आम जन और बादशाह के नेतृत्व में फौज के मध्य इतना लम्बा युद्ध चला। वीर गोकुल सिंह अन्ततः पकड़े गये। आगरा की कोतवाली में उनको बादशाही हाकिमों ने कुल्हाड़ी से काटकर मृत्यदण्ड दिया। तात्कालिक तौर पर तो हार हुई किंतु राजाराम, चूड़ामणि और महाराज सूरजमल आदि वीर परम्परा ने इस विद्रोह का झण्डा बुलन्द रखा। इसी से भरतपुर स्टेट का उदय हुआ और १७६१ में आगरा को बादशाही से छीनकर महाराजा सूरजमल ने किले पर अपना कब्जा कर लिया।

उन्होंने कहा कि वीर गोकुल सिंह का यह बलिदान न्यायनीति के पक्ष में और अन्याय अधर्म के विरोध में मानव मूल्यों की रक्षा और सर्व समाज के हित के लिये था। सर्वसमाज को उनके इस बलिदान के लिये उनका ऋणी होना चाहिए और हृदय से आदर करना चाहिए। ऐसी सभाओं में सर्वसमाज के बुध्दिजीवियों को भी बुलाया जाना चाहिए ताकि उन्हें भी इस वीर आत्म बलिदानी के प्रति अपना आदर अभिव्यक्त करने का अवसर मिल सके।
अशोक राना, कप्तान सिंह चाहर, ओपी वर्मा आदि ने ओजस्वी विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम के आयोजकों प्रेमसिंह सोलंकी, भूपेन्द्र सिंह राणा और उनके सहयोगी ऐसोसिएशन के सदस्यों का प्रयास सराहनीय रहा।
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