विजयदशमी कहिए या दशहरा, इस वक्त अपने सनातन धर्म में और भारतवर्ष की संस्कृति में झांझी और टेसू की कहानी बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह कहनी हम सभी लोगों ने न केवल सुनी है बल्कि गाया भी है। उसके साथ खेले भी हैं। धीरे-धीरे अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई चीज पाश्चात्य की दौड़ में विलुप्त हो रही है। अगर हम जाग्रत न हुए तो टेसू और झांझी सिर्फ कहानी में रह जाएंगे।
आज मैं आपके समक्ष एक विचार रख रहा हूँ कि अगर आप अपने आसपास बच्चों को झांझी और टेसू ले जाते हुए या उसका गीत गाते हुए सुनें तो अपने को रोक कर उन्हें कुछ न कुछ दक्षिणा अवश्य दें। इससे विलुप्त होती परंपरा में दोबारा जान आ सकती है। अगर आप मेरे विचारों से सहमत हों तो अपने पास एक हफ्ता कुछ खुले रुपए जरूर रखें। झांझी और टेसू लेकर आने वालों का रुपये देकर उत्साह बढ़ाएं।
राजीव गुप्ता जनस्नेही
लोकस्वर, आगरा
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