भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने शुक्रवार को अपने अंतिम कार्यदिवस पर भावुक विदाई दी। लगभग 40 साल के कानूनी और न्यायिक सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वह इस संस्था को एक “न्याय के विद्यार्थी” के रूप में छोड़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में आयोजित विदाई समारोह के दौरान वे जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विनोद चंद्रन के साथ विशेष पीठ पर बैठे।
सीजेआई गवई ने कहा कि सहयोगियों, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की भावनाओं और कविताओं ने उन्हें भावुक कर दिया। उन्होंने कहा, “जब मैं इस अदालत कक्ष से आखिरी बार बाहर जाऊंगा, तो इस संतोष के साथ जाऊंगा कि मैंने देश के लिए अपनी पूरी क्षमता से काम किया।”
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति गवई जस्टिस केजी बालकृष्णन के बाद देश के दूसरे दलित और पहले बौद्ध सीजेआई हैं। 14 मई 2025 को उन्होंने मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला था और शुक्रवार को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ।
उन्होंने कहा कि 1985 में अपने करियर की शुरुआत उन्होंने कानून के विद्यार्थी के रूप में की थी और अब जाते समय भी वे स्वयं को “न्याय का विद्यार्थी” ही मानते हैं। वकील, हाईकोर्ट जज, सुप्रीम कोर्ट जज और अंत में मुख्य न्यायाधीश तक की अपनी यात्रा को उन्होंने पूर्णत: संतोषजनक बताया।
डॉ. भीमराव आंबेडकर के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए गवई ने कहा कि उनकी न्यायिक सोच हमेशा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की अवधारणा से प्रभावित रही। उन्होंने अपने कार्यकाल में मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन बनाने की कोशिशों को महत्वपूर्ण बताया। पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वे हमेशा नागरिक अधिकारों और पर्यावरणीय हितों के बीच संतुलन को प्राथमिकता देते रहे।
सीजेआई गवई ने सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक फैसलों पर कहा कि उन्होंने हमेशा संस्था के रूप में सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा को आगे बढ़ाया।
सहकर्मियों ने किया सम्मान
जस्टिस सूर्यकांत ने गवई को “भाई और विश्वासपात्र” बताते हुए कहा कि वे धैर्य, सादगी और गरिमा के साथ मामलों का निपटारा करते थे तथा युवा वकीलों को प्रोत्साहित करते थे।
अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने उनके नाम ‘भूषण’ के मराठी अर्थ आभूषण का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने न्यायपालिका को “सुशोभित” किया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने उनकी सादगी और सरलता को उनकी सबसे बड़ी पहचान बताया।
कपिल सिब्बल ने कहा कि गवई का सफर सामाजिक परिवर्तन की मिसाल है और यह साबित करता है कि सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद भी साधारण बने रहना संभव है।
गवई का करियर सफर
- 16 मार्च 1985 को वकालत में प्रवेश
- नागपुर और अमरावती नगर निगम सहित कई संस्थाओं के स्थायी वकील
- 14 नवंबर 2003 को बॉम्बे हाईकोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त
- 12 नवंबर 2005 को स्थायी जज बने
- 24 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने
गवई ने अपने पूरे करियर को सेवा और कर्तव्य के रूप में समर्पित बताते हुए न्यायपालिका और संविधान के मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
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