नई दिल्ली: अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा समर्पित दान और चढ़ावे में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गया है। इस संवेदनशील विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिसमें मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय प्रबंधन की गहन और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
CBI जांच और न्यायिक निगरानी का आग्रह
एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अनूप प्रकाश अवस्थी द्वारा दायर इस याचिका में अदालत से निवेदन किया गया है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे सीबीआई (CBI) को सौंपी जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विश्व भर के करोड़ों सनातनियों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में दान राशि के प्रबंधन को लेकर उठे आरोपों की पारदर्शी जांच न केवल जरूरी है, बल्कि अनिवार्य भी है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी संस्था या व्यक्ति को लक्षित करना नहीं, बल्कि सच्चाई को सामने लाना है ताकि भक्तों का भरोसा बना रहे।
UP सरकार की SIT पर उठाए सवाल
याचिका में राज्य सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अब तक इस मामले में कोई औपचारिक एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की गई है, जो जांच की गंभीरता पर संशय पैदा करती है। याचिका के अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए धन से जुड़े मामले में सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का पालन न होना चिंता का विषय है।
आस्था और प्रबंधन की पारदर्शिता का प्रश्न
याचिका में अदालत से आग्रह किया गया है कि मंदिर में आने वाले दान के संग्रह, उसके लेखा-जोखा और उपयोग से जुड़ी पूरी प्रक्रिया की ऑडिट की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि भविष्य के लिए एक ऐसी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए जो दान राशि की सुरक्षा और पारदर्शिता को सुनिश्चित करे। याचिका के केंद्र में यह तथ्य है कि यह केवल एक वित्तीय विवाद नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं और प्रबंधन के प्रति उनके अटूट भरोसे का मामला है।
सियासी गलियारों से अदालत तक का सफर
बता दें कि यह मुद्दा सबसे पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा उठाए गए आरोपों के बाद सुर्खियों में आया था। अखिलेश यादव ने मंदिर के चढ़ावे में करोड़ों रुपये के गायब होने का दावा किया था, जिसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले का संज्ञान लेते हुए SIT का गठन किया था। SIT को एक निश्चित समय सीमा में अपनी रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए थे। अब जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुँच चुका है, तो सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शीर्ष अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या वास्तव में न्यायिक निगरानी में जांच के आदेश दिए जाते हैं।
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