लोकसभा के मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के दोबारा पेश होने की चर्चाओं के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव की राजनीति बदली हुई नजर आ रही है। मंगलवार को महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी से जुड़े प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद, अखिलेश यादव ने तीन शर्तों के साथ महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के समर्थन के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच सपा प्रमुख ने महिला आरक्षण को जल्द लागू करने और परिसीमन बिल के जरिए उच्च सदन में सीटें बढ़ाने की वकालत की है। अखिलेश यादव ने अपनी शर्तों में स्पष्ट कहा है कि महिला आरक्षण को 2027 के विधानसभा चुनाव में ही लागू किया जाए। इसके अलावा, उन्होंने परिसीमन बिल के माध्यम से उच्च सदन (राज्यसभा और विधान परिषद) में सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग की है।
सपा प्रमुख की तीसरी और महत्वपूर्ण शर्त यह है कि महिला आरक्षण बिल के दायरे में पीडीए (PDA) में शामिल पिछड़े समाज और अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो सपा इस बिल का समर्थन कर सकती है।
अप्रैल 2026 की यादें और प्रधानमंत्री का बयान
16 अप्रैल 2026 का वह दिन संसद में चर्चा और हंगामे के नाम रहा, जब महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के मुद्दे पर माहौल बेहद गर्म था। उस दिन लोकसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टिप्पणी की थी, “अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं।” हालांकि, उस समय सपा प्रमुख अखिलेश यादव पीएम मोदी की मदद नहीं कर सके थे, जिसके चलते सरकार बिल पास कराने में विफल रही थी। अब तीन महीने बाद, अखिलेश यादव ने पूरी तरह यू-टर्न लेते हुए मोदी सरकार को मदद देने के लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं।
महिला संगठनों का दबाव और सपा का रुख
महिला संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने सपा प्रमुख से मुलाकात के दौरान यह मांग रखी कि महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की है कि संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम में जरूरी बदलाव किए जाएं ताकि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया से अलग कर तत्काल लागू कराया जा सके।
महिला संगठनों ने अखिलेश यादव से यह आग्रह किया कि सपा संसद के भीतर और बाहर इस मांग का समर्थन करे और केंद्र सरकार पर महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने के लिए दबाव बनाए।
इसके बाद ही अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से इन मांगों का समर्थन करते हुए सरकार के सामने अपनी तीन शर्तें रखीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिला आरक्षण केवल लोकसभा तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे विधान परिषद और राज्यसभा में भी लागू किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने दलित, पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण के भीतर प्रतिनिधित्व देने की मांग को दोहराया।
रणनीतिक बदलाव या मजबूरी?
तीन महीने पहले तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने विपक्ष के साथ मजबूती से खड़े होकर मोदी सरकार के महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का पुरजोर विरोध किया था। उस समय सपा सांसदों ने बिल के खिलाफ वोटिंग की थी, जिससे सरकार को पीछे हटना पड़ा था। लेकिन अब जुलाई 2026 में हालात बदल चुके हैं।
भाजपा अब दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के काफी करीब नजर आ रही है, जिसे देखते हुए अखिलेश यादव ने विरोध के बजाय शर्तों के साथ समर्थन का नया पासा फेंका है। इसे एक रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अप्रैल से जुलाई के बीच की बदली हुई सियासी परिस्थितियों में सपा ने अब विरोध की पुरानी राह छोड़कर शर्तों के साथ सहभागिता का रास्ता चुना है।
बदली हुई सियासी पिच
अप्रैल में सैद्धांतिक विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी अब सीधे विरोध के बजाय ‘शर्तों के साथ समर्थन’ की राजनीति खेल रही है। यूपी विधानसभा चुनाव की बढ़ती तपिश के बीच अखिलेश यादव का यह कदम भाजपा के सामने एक नई चुनौती या फिर एक नए गठबंधन की संभावना के रूप में देखा जा रहा है। यदि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो संसद में इन बिलों का भविष्य पूरी तरह से बदल सकता है।
- भाजपा में कुछ ‘पहिये’ खुद को समझने लगे हैं स्टीयरिंग…सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए सहयोगी दलों पर कसा तंज - September 29, 2026
- महाराजा अग्रसेन जयंती: आगरा के बल्केश्वर में सजेगा विशाल एकता महायज्ञ, 1100 अग्रवंशी परिवार होंगे एक सूत्र में एकजुट - September 29, 2026
- यूपी में पूरी तरह प्रतिबंधित हुए हुक्का बार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुख्य सचिव और DGP को भेजा आदेश - September 29, 2026