आगरा: ताजनगरी की सड़कों पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहनों और उनसे होने वाले हादसों पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। शहर के बीचों-बीच एनएच-19 (पुराना एनएच-2) पर गैर-गंतव्य भारी वाहनों (Non-destined heavy vehicles) के प्रवेश को न रोक पाने पर आयोग ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) से स्पष्टीकरण मांगा है। आयोग ने एनएचएआई को सख्त चेतावनी देते हुए 17 मई 2026 को अगली सुनवाई मुकर्रर की है।
क्या है पूरा विवाद?
आगरा में भारी वाहनों के कारण बढ़ते जाम, प्रदूषण और जानलेवा दुर्घटनाओं के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता और सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर की थी। आयोग ने माना कि हाईवे प्रशासन अधिनियम 2002 की धारा 35 के तहत, यदि वैकल्पिक मार्ग (बाईपास) उपलब्ध है, तो शहर के भीतर भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
बता दें कि 14 किलोमीटर लंबा उत्तरी बाईपास 4 दिसंबर 2025 से शुरू हो चुका है, लेकिन एनएचएआई ने अभी तक भारी वाहनों को इस मार्ग पर डायवर्ट करने के लिए आवश्यक अधिसूचना (Notification) जारी नहीं की है।
₹400 करोड़ का बाईपास, फिर भी शहर ‘असुरक्षित’
हैरानी की बात यह है कि लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से बना उत्तरी बाईपास धूल फांक रहा है, जबकि मथुरा और फिरोजाबाद की ओर जाने वाले ट्रक आज भी सिकंदरा, भगवान टॉकीज, आईएसबीटी और रामबाग जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों से गुजर रहे हैं।
आंकड़ों का जाल: अधिवक्ता के.सी. जैन के अनुसार,
एनएच-19 पर रोजाना करीब 80 हजार से 1.20 लाख वाहन गुजरते हैं, जिनमें 40 हजार तक भारी वाहन होते हैं। इनमें से 70% वाहनों का आगरा शहर से कोई लेना-देना नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: 30 दिसंबर 1996 को ही सुप्रीम कोर्ट ने बाईपास निर्माण के निर्देश दिए थे, ताकि शहर की धरोहरों और नागरिकों को प्रदूषण व हादसों से बचाया जा सके।
क्यों कतरा रहे हैं वाहन चालक?
उत्तरी बाईपास 38 किलोमीटर लंबा और सुरक्षित मार्ग है, लेकिन जागरूकता की कमी और खंदौली टोल प्लाजा पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क के डर से चालक शहर के भीतर के छोटे (34 किमी) लेकिन जाम से भरे रास्ते को चुनते हैं। आयोग ने अब एनएचएआई को 6 मई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का अंतिम मौका दिया है।
अधिवक्ता के.सी. जैन का पक्ष: “जब सरकार ने समाधान (बाईपास) बना दिया है, तो नागरिकों को ‘मौत के हाईवे’ पर धकेलना उनके जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन है। एनएचएआई की लापरवाही अब बर्दाश्त से बाहर है।”
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