भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) बृजलाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान को आगे बढ़ाते हुए एक नया और तीखा बयान दिया है। रविवार को दिए गए अपने बयान में बृजलाल ने कहा कि जंगलों में सक्रिय रहने वाले पारंपरिक नक्सलियों से कहीं अधिक खतरनाक ‘दिमागी नक्सली’ होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह लोग शहरी क्षेत्रों में रहकर हथियारों के इस्तेमाल के बजाय अपने बौद्धिक प्रभाव और विचारधारा के जरिए समाज में हिंसक सोच को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।
समाज के किन वर्गों पर साधा निशाना?
पूर्व डीजीपी बृजलाल ने स्पष्ट किया कि ये तथाकथित ‘दिमागी नक्सली’ जंगलों या किसी दूरदराज के इलाकों में नहीं रहते, बल्कि वे हमारे समाज के बीच सुरक्षित और प्रतिष्ठित दायित्वों में सक्रिय रहते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग अमूमन प्रोफेसर, शिक्षक, एनजीओ (NGO) के प्रमुख, बुद्धिजीवी, कवि और लेखक जैसे विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग विभिन्न माध्यमों जैसे कि लेख लिखने, बड़े-बड़े सम्मेलन और संगोष्ठियां (सेमिनार) आयोजित करने के जरिए युवाओं और आम नागरिकों के बीच अपनी खास वैचारिक सोच का प्रसार करते हैं।
”वैचारिक चुनौती बनी हुई है, सतर्क रहना जरूरी”
बृजलाल ने तुलना करते हुए कहा कि जहां एक ओर जंगलों में सक्रिय नक्सली प्रत्यक्ष रूप से हथियारों के जरिए चुनौती देते थे, वहीं दूसरी तरफ ये ‘दिमागी नक्सली’ वैचारिक स्तर पर समाज को अंदर से प्रभावित और भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि जंगलों में नक्सली गतिविधियां अब काफी हद तक समाप्त हो चुकी हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में इस तरह के वैचारिक प्रभाव की चुनौती अभी भी बनी हुई है।
उन्होंने चिंता जताई कि ये लोग युवाओं को अपने पाले में प्रभावित करके उन्हें हिंसक गतिविधियों की ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं। इसके प्रति पूरे समाज को बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है। अंत में उन्होंने देश के नागरिकों से अपील की कि वे ऐसे तत्वों की सही पहचान करें और उनके वैचारिक प्रभावों से पूरी तरह सावधान रहें।
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