लखनऊ/नोएडा: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। मुख्यमंत्री रहते हुए कभी नोएडा की दहलीज न लांघने वाले अखिलेश अब 2027 के विधानसभा चुनाव की नींव इसी इलाके से रखने जा रहे हैं। मार्च के पहले हफ्ते में दादरी में होने वाला विशाल गुर्जर सम्मेलन इसकी शुरुआत माना जा रहा है।
पश्चिमी यूपी में नई ‘सोशल इंजीनियरिंग’
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव मतदाताओं की सीमित संख्या को देखते हुए सपा ने इस बार अपनी रणनीति बदली है। पार्टी का फोकस अब पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक के साथ-साथ गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जोड़ने पर है। दादरी के मकोड़ा गांव में कार्यकर्ताओं से मुलाकात के बाद यह स्पष्ट है कि सपा गुर्जर समाज के भीतर उपजे ‘राजनीतिक प्रतिनिधित्व’ के असंतोष को भुनाना चाहती है।
प्रतिनिधित्व का मुद्दा और ‘गुर्जर कार्ड’
सपा सूत्रों के अनुसार, गुर्जर समाज में यह धारणा प्रबल हो रही है कि उन्हें वर्तमान सत्ता में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। सपा इस नाराजगी को भुनाने के लिए गुर्जर बहुल इलाकों में लगातार कार्यक्रम कर रही है। दादरी सम्मेलन के जरिए सपा यह संदेश देना चाहती है कि वह गुर्जरों को सत्ता में उनकी खोई हुई हिस्सेदारी वापस दिलाएगी।
अंधविश्वास का मिथक और 2027 की चुनौती
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह ‘मिथक’ वर्षों से प्रचलित रहा है कि जो मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है। अखिलेश यादव का नोएडा को लेकर रुख पहले अलग रहा है। मुख्यमंत्री रहते हुए वह अपने पूरे कार्यकाल में नोएडा और ग्रेटर नोएडा नहीं गए। इसके पीछे वह धारणा अक्सर चर्चा में रही कि जो भी मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी खतरे में पड़ जाती है। हालांकि 2012 में चुनाव से पहले उन्होंने साइकिल यात्रा की शुरुआत इसी इलाके से की थी और तब पार्टी को सत्ता मिली थी।
2017 और 2022 के चुनाव में उन्होंने अभियान दूसरे जिलों से शुरू किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब माना जा रहा है कि 2027 को देखते हुए वह पुराने मिथक से बाहर निकलकर राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं कि चुनाव रणनीति अंधविश्वास नहीं, सामाजिक समीकरण और संगठन के दम पर तय होगी।
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