कृपया वे दर्शक दूर रहे, जिन्होंने पुष्पा को पाँच मिनट देखकर बंद कर दिया था और ऐसे कंटेंट पसंद नहीं आते है और ओवर रेटेड लगते है। सच कहूँ, उन्हें कतई अच्छी नहीं लगेगी। साथ ही टेलीग्राम पर देखने वालों को भी बढ़िया न लगनी है। खैर
लेखक-निर्देशक सुकुमार, एसएस राजमौली और प्रशांत नील की कतार में खड़े हो चले है। जिन्होंने बैक टू बैक अपने दर्शकों को मास एंटरटेनिंग सिनेमैटिक एक्सपीरियंस देकर ट्रेड को भी हैरान किया है। दरअसल, चार-पाँच साल किसी एक कंटेंट पर ध्यान केंद्रित करना बड़ा रिस्क है।
इन तीनों फ़िल्म मेकर्स में कॉमन सोच है कि इनके राइटिंग और स्क्रीन प्ले में कई ऐसे भव्य सीक्वेंस रहते है जो दर्शकों को अच्छा अनुभव देते है। दर्शक सीटियाँ और तालियाँ फेंकेंगे, इन लोगों को पूर्ण विश्वास होता है। इसी को फ़िल्म मेकिंग अनुभव कहते है, जो अपने दर्शक की डिमांड पहचान लें। पुष्पा-द रूल के स्क्रीन प्ले को दर्शकों की अपेक्षाओं के अनुरूप लिखा गया है। ये फ़िल्म मेकर्स उन दृश्यों को शामिल करने में जरा भी संकोच नहीं करते है, जो सनातनी परिवेश से आते है। बल्कि विशालकाय बनाते है। स्क्रीन प्ले बैलेंस बनाये रखता है।
म्यूजिक डायरेक्टर देवीश्री प्रसाद के बीजीएम में फ़िल्म के एक्शन सीक्वेंस और क्लाइमैक्स को देखिए, आम दर्शक की नब्ज को पकड़ते प्रतीत होंगे। तिस पर सिनेमेटोग्राफी फ़िल्म के स्केल को दर्शाती है। नो डाउट लेखक-निर्देशक सुकुमार ने तीसरी उम्मीदों को ज़िंदा रखा है।
हिंदी गीत के लिरिक्स बकवास है।
थप्पड़ मारूँगी, फ़िल्म के मूड में फिट है लेकिन हिंदी शब्द कन्वर्सिंग नहीं है।
पुष्पा का रूल अर्थात् पैन भारत में डार्लिंग प्रभास, यश गौड़ा के साथ अल्लू अर्जुन का नाम जुड़ गया है। अगर अभिनय के स्तर पर देखें न, अल्लू अर्जुन अव्वल स्थान पर खड़े है। महिषासुर मर्दिनी तांडव में अर्जुन के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज अद्भुत है। इस किरदार में स्वयं को भूला दिए है, नृत्य हो या संहार बेहतरीन था। सांकेतिक सीक्वेंस भी सॉलिड रहा है।
हिंदी डबिंग में पर्दे के पीछे श्रेयस तलपड़े पुष्पा का स्टारडम लेंगे। वाकई अच्छी डबिंग की है।
अल्लू अर्जुन के शासन में फहाद फासिल यानी एसपी शेखावत ने ज़ोरदार टक्कर दी है और अपने अभिनय से सीक्वेंस में जान डाल दी है। लगता है सुकुमार ने पुष्पा को रोकने के लिए धाँसू कलाकार का चयन किया है। सॉरी और शर्त वाले सीक्वेंस को इतना इफेक्टिव बना दिया है मजा आ जाता है।
बाकी अन्य कलाकार ठीक है।
इतना तय है कि फ़िल्म का वर्ड ऑफ़ माउथ पॉजिटिव वेव में है और बॉक्स ऑफिस पर बवाल कटेगा।
मेरा मत है, साउथ ब्लॉक से तेलुगू और कन्नड़ फ़िल्म मेकर्स अपनी संस्कृति से जुड़े है और इनकी सफलता रहस्य यही है। इसलिए इन्हें कॉर्पोरेट बुकिंग का सहारा नहीं लेना पड़ता है। इनकी फ़िल्मों में सनातनी परिवेश वाले दृश्य बिग स्केल पर रखे जाते है। सलार में काली, पुष्पा में काली महिषासुर मर्दिनी, देवरा में फोक देवता, यानी अपनी जड़ों के कनेक्शन को दिखाने में पीछे नहीं रहते है।
पुष्पा सरीखे के मास कंटेंट मुझे अच्छे लगते है। जिसमें सिनेमा के सिनेमैटिक को दिखलाया जाता है।
-ओम लवानिया जी के फेसबुक पेज से साभार
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