उत्तर प्रदेश का आने वाला चुनाव मील का पत्थर साबित होने वाला है। बंगाल ने लम्बे समय बाद एक चुनौती को स्वीकार भी किया और चुनौती दिया भी और इबारत लिख दिया। राजनीति के पन्ने पर की इरादा हो, संकल्प हो और आत्मबल हो तो कितनी भी बड़ी ताकतें सामने हों, उन्हें परास्त किया जा सकता है। अब बारी उत्तर प्रदेश की है तय करने की कि देश की राजनीति की दशा और दिशा क्या होगी। जो विभिन्न कोनो सें आवाज उठती है कि लोकतंत्र खत्म हो जायेगा और संविधान संघविधान में बदल जायेगा तथा एक संगठन को छोड़ बाकी सब कैद में जीवन काटेंगे, क्या सचमुच वैसा कुछ होगा या ये सब एक भ्रम मात्र है। तय तो ये भी होना है कि जो चल रहा है वही चलेगाया बदलाव आयेगा और खुली बयार फिर से बहेगी। तय होना है कि उत्तर प्रदेश सिर्फ ठोको, मुकदमेलगाओ और जेले भरो पर ही चलेगा या रोटी, रोजगार, विकास होगा, जिसका लोग सपना देखते हैं। तय ये भी होना है कि 1989 से हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन की बयार इस बार भी बहेगी या कांग्रेस युग की वापसी होगी?
इस युद्ध के मुख्य रूप से चार योद्धा हैं जिसमे भाजपा तथा आरएसएस और समाजवादी पार्टी फिलहाल आमने सामने दिखलाई पड़ रहे हैं। भाजपा के ऊपर जहां सरकार असफलताओं का बोझ है वही अपने ही विधायकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का जोखिम भी, जहां सभी चीजों की महंगाई का विराट प्रश्न सामने मुंहबाये खड़ा है तो किसान आन्दोलन की आंच भी जलाने को तत्पर है, बेरोजगार नौजवान हुंकार भर रहा है तो कुछ को छोड़कर कर पूरे प्रशासन तंत्र में एक कसमसाहट है , या यूँ कहें कि चुनावी जमीन भाजपा को निगलने को आतुर दिख रही है। नागपुर से लेकर दिल्ली और लखनऊ तक भगवा खेमे में जबर्दस्त बेचैनी दिखलाई पड़ रही है और साम दाम दंड भेद सब कुछ इस्तेमाल कर किला बचाने की जद्दो-जहद भी साफ नज़र आ रही है। हिन्दू मुसलमान मुद्दा बना देने को कमर कसते नज़र आ रहे हैं भगवा खेमे के योद्धा चाहे उसकी आंच में प्रदेश बर्बाद क्यों न हो जाये पर चुनाव बड़ी चीज है।
दूसरी तरफ समाजवादी खेमा लम्बी नींद से उठ कर अपनी अंगडाई लेता हुआ दिख रहा है पर अभी भी जमीनी हकीकत और अपनी कमजोरियों से आंखे मूंदे हुये लगता है। जहां भाजपा सैकड़ों चेहरे और संगठनों के साथ उछल कूद कर रही है वहीं समाजवादी पार्टी वन मैन शो के साथ वन मैन आर्मी ही नजर आ रही है। अखिलेश यादव द्वारा मुलायम सिंह यादव को बेइज्जत कर अध्यक्ष पद से हटाने के बाद पार्टी सभी चुनावों में खेत रही है। पार्टी का दो मुख्य मजबूत वोट था जिसमें से पिछले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में इसमें से यादव लोगों का भाजपा खेमे को काफी समर्थन मिला हिन्दू और मंदिर के नाम पर। अभी भी ये दावा नहीं किया जा सकता कि 100% यादव वोट पुरानी वाली ताकत तथा जज्बे से सपा के लिये लड़ेगा और वोट देगा। दूसरा अडिग वोट मुसलमान का रहा जो 1989 और फिर 1993 से पूरी ताकत के साथ सपा के साथ खड़ा रहा पर इस बार वो विचलित दिखलाई पड़ रहा है। आज़म खान के मामले में अखिलेश यादव की बेरुखी, ओवैसी, आज़म से मिलने की इच्छा व्यक्त नहीं की। कांग्रेस की तरफ से भी उनके प्रति सहानुभूति नहीं दर्शाई गई। इससे पूरे मुस्लिम समाज को विचलित कर दिया है। साथ में कभी विष्णु के मंदिर तथा कभी परशुराम के मंदिर की बात कर अखिलेश यादव ने पाया कुछ नहीं बल्कि भाजपा की नीतियों का पिछलग्गू बनने का काम किया है। ऐसे में यदि मुसलमान को कोई और विकल्प नहीं मिला तो उसका वोट तो मिल सकता है पर 1991 की तरह ही जोश रहित और कम संख्या में होगा।
पता नहीं क्यों अखिलेश यादव पर अति जातिवादी होने का ठप्पा भी लग गया है और बड़ी जातियों के प्रति बेरुखी वाला भाव भी। ये गलती तो सपा ने प्रारंभ से ही की कि वो अन्य पिछडी जातियों और अति पिछड़ी जातियों को ये एहसास नहीं करा पायी कि पार्टी तथा सत्ता उनकी भी है। मुलायम सिंह के उलट अखिलेश का सुलभ न होना तथा पुराने लोगो के प्रति उपेक्षा भाव और अनुभवी व वरिष्ठ लोगों से दूरी भी उनको भारी पड़ती दिख रही है। वे अपना ही राजनीतिक कुनबा पूरी तरह समेट नहीं पा रहे है । जहां सिर्फ 30 या 35 सीट की लडाई में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव को बाहर का रस्ता दिखा दिया वहीं कांग्रेस को 125 सीटें दे दीं। यद्यपि भाजपा के सामने आज तक सपा ही है पर अभी तक सपा और उनके सहयोगी 125/130 सीट से ज्यादा पर बढ़ते हुए नजर नहीं आ रहे हैं पर थोड़ा व्यवहार और रणनीति बदल कर उछाल लेने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है पर कितना, ये उनके व्यवहार और रणनीति परिवर्तन पर निर्भर है।
तीसरी पार्टी बसपा है जिसकी नेता मायावती यदि पैसे की भूखी नहीं होती और धन, वैभव तथा अहंकार से दूर रही होती और अपने मिशन के साथियों को दूर नहीं किया होता तथा कांशीराम के रास्ते पर चलती रही होती तो आज देश की सबसे बडी ताकतवर नेता होतीं या सबसे बड़े 3/4 में होती। उनकी कमजोरियों और कर्मों ने उनकी लम्बे अर्से से भाजपा की सत्ता के सामने शरणागत कर दिया और लम्बे समय से दिल्ली मे बैठी वो केवल राजनीति की औपचारिकता निभाती हुई दिख रही हैं। उनके कर्मों से उनका वोट ठगा हुआ महसूस कर रहा है, फिर भी उनका वोट है। इस चुनाव में भी वो पुराने हथकंडों के साथ मिश्रा जी के कन्धे पर चढ़कर चुनाव को बस जीवित रहने लायक लड़ना चाहती हैं या भाजपा की बैसाखी बन अपनी सुरक्षा और अपने भतीजे की राजनीति में स्थापना तक के ही इरादे से उतरना चाहती हैं, ये वक्त बतायेगा। फिर भी मायावती यदि इस चुनाव में पैसे का लालच छोडकर और क्षेत्रों के सम्मानित लोगों को ढूंढकर टिकेट देती हैं और अपने खजाने का कुछ अंश लोगों के चुनाव लड़ने पर खर्च करती है तो वो 40 से ज्यादा सीट जीत सकती हैं और यदि ढर्रा पुराना ही रहता है तो 19 से भी नीचे ही जायेंगी और कितना नीचे इसकी समीक्षा कुछ समय बाद हो सकेगी ।
चौथी पार्टी कांग्रेस है जिसके लिये इस बार सबसे अच्छा अवसर था क्योंकि वो 1989 से ही उत्तर प्रदेश सरकार से बाहर है और प्रियंका के रूप में नया चेहरा उनके पास था पर या तो कांग्रेस का नेतृत्व किसी दबाव में है या फिर मन से हार चुका है और इतना कुण्ठित हो गया है कि नये विचार और कार्यक्रम सोच ही नहीं पा रहा है। लोगों को जोड़ने मे कांग्रेस का विश्वास नहीं है बल्कि स्थापित कांग्रेसी इस चक्कर में रहते हैं कि जो है उनको भी कैसे निकाला जाये ताकि उनका एकछत्र राज रहे चाहे बंजर जमीन पर ही सही। खुद राहुल गांधी पूरे परिवार की पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपनी पारम्परिक सीट अमेठी हार चुके हैं और जब सोनिया जी या राहुल जीतते भी हैं तो अपने जिले की विधान सभा नहीं जीता पाते पर अभी ये परिवार स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि राजनीति कहां जा चुकी और आप करिश्मा करने वाले नहीं रहे । वैसे भी इधर कांग्रेस सिर्फ उन प्रदेशों में चुनाव जीती जहां किसी दल से सीधी टक्कर हो और उस प्रदेश में कांग्रेस का मजबूत नेता हो, जिसने अपने प्रदेश में अपनी साख कायम रखी हो। बंगाल में शून्य पर आकर और तमिलनाडु केरल तथा असम मे पूरी ताकत और समय लगाकर भी कुछ हासिल नहीं कर सके पर अभी भी अपनी कमजोरियों को दूर करने और जमीनी हकीकत समझने का कोई इरादा नहीं दिखता है। शायद भाजपा और आरएसएस पर ही निगाह रखते तो कुछ तो कमजोरियां दूर कर सकते थे। इसका क्या जवाब है कि अच्छे खासे पंजाब के नेतृत्व को कमजोर करने की क्या जरूरत थी? सिंधिया छोड़ सकते हैं, ये महीनों से पता था पर क्यों नहीं रोक पाये, सचिन पाइलट ने 5 साल मेहनत की पर उनकी उपेक्षा क्यों और क्यों कुछ फैसला नहीं । मध्य प्रदेश में 28 सीटो का चुनाव था और सत्ता का फैसला होना था पर भाई बहन सहित पूरी पार्टी ने कमलनाथ को अकेला छोड़ दिया। इतिहास ही याद कर लेते कि 1978 में सिर्फ एक सीट पर इन्दिरा जी ने कैसे गांव-गांव पैदल नापा था और जिस गांव में जहां जगह मिली रुक गई। सांकेतिक राजनीति का तजुर्बा तो हो चुका भट्ठा और परसौल में। जरा पन्ना पलट कर देख लेना चाहिए कि वो सब कर के कितना वोट मिला दोनों जगह । उत्तर प्रदेश में में भी कांग्रेस इसी तरह चलती रही तो कहीं बंगाल ही न दोहरा दे। कांग्रेस अब भी अपने रंगीन चश्मे उतार दे, राजनीतिक पर्यटन को छोड़कर कर डट जाए, पूर्णकालिक तौर पर और व्यावहारिक राजनीति करे तो शायद कुछ साख बच जाये। सत्ता की तरफ जाने वाला रास्ता और समय तो पीछे छूट गया पर सम्मान बचा सकती है और 2024 के लिये बुनियाद रख सकती है ।
कुल मिलाकर पूरा माहौल भाजपा और योगी विरोधी होने के बावजूद आज की तारीख तक विरोध की अकर्मण्यता, सिद्धांतों से विचलन और धारदार राजनीति का अभाव तथा सुविचारित रणनीति का अभाव भाजपा को फिर मुकुट पहना सकता है। ऊपर लोगों की जिन आशंकाओ का जिक्र किया गया है उनका जवाब देने और फैसलाकुन युद्ध छेड़ने की जिम्मेदारी तो विपक्ष के नेताओं की है। देखते हैं की 1989 का सिलसिला जारी रहता है और सत्ता बदलती है या 80 के दशक का कांग्रेस का इतिहास भाजपा दोहरा देती है। यदि विपक्ष रणनीतिक साझेदारी के साथ आरएसएस और भाजपा के धार्मिक और जातीय ट्रैप से बच कर फैसलाकुन लड़ाई लड़ने उतर सका तो भाजपा को 100 सीट भी नहीं मिलेंगी और सत्ता परिवर्तन होगा और यदि यही ढर्रा रहा तो भाजपा 160 से 210 तक सीट जीतने में कामयाब हो जाएगी सारी विपरीत स्थितियों के बावजूद भी। सवालों के जवाबों की प्रतीक्षा जनता को भी है और भविष्य के इतिहास को भी ।
-डॉ. सीपी राय
(लेखक राजनीतिक चिंतक हैं)
संपादक डॉ. भानु प्रताप सिंह के उपन्यास ‘मेरे हसबैंड मुझको प्यार नहीं करते’ का संशोधित द्वितीय संस्करण खरीदने के लिए यहां क्लिक करें-
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