रामु जाइ बन राजु तुम्हारा…कैकेयी के वरदान और श्रीराम के वनवास प्रसंग से भावुक हुआ कथा पांडाल, आंखों से बही अश्रुधारा

RELIGION/ CULTURE

आगरा। श्री महाकालेश्वर मंदिर, बूढ़ी का नगला, दयालबाग में चल रहे नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ, महारुद्राभिषेक एवं श्रीराम कथा महोत्सव के अष्टम दिवस वातावरण अत्यंत भावुक हो उठा। कैकेयी के वरदान, श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास तथा संपूर्ण वनवास लीला का मार्मिक प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। कथा के दौरान कई श्रद्धालुओं की आंखों से अश्रुधारा बह निकली और पूरा कथा पांडाल करुणा, भक्ति एवं श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा से भर गया।

प्रतिदिन की भांति कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातःकाल भगवान महाकाल के महारुद्राभिषेक एवं श्री रुद्र महायज्ञ से हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य श्रद्धालुओं ने भगवान भोलेनाथ का विधि-विधान से पूजन एवं अभिषेक कर परिवार की सुख-शांति, समाज के कल्याण एवं विश्व मंगल की कामना की।

संध्या में चित्रकूट धाम से पधारे कथावाचक आचार्य पंडित विमलेश त्रिवेदी महाराज ने श्रीराम कथा के अष्टम दिवस कोप भवन लीला एवं वनवास प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब राजा दशरथ ने भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की तो संपूर्ण अयोध्या में उत्सव का वातावरण था, लेकिन मंथरा के बहकावे में आकर माता कैकेयी ने कोप भवन में जाकर राजा दशरथ से पूर्व में दिए गए दो वरदान मांग लिए।

कथा व्यास ने बताया कि कैकेयी ने पहला वरदान भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरा वरदान श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। राजा दशरथ यह सुनकर व्यथित हो गए, लेकिन रघुकुल की मर्यादा और दिए हुए वचन को निभाने के लिए विवश थे। जब श्रीराम को इस बात का पता चला तो उन्होंने बिना किसी विरोध या शिकायत के पिता के वचन की रक्षा के लिए वन जाने का निर्णय लिया।

उन्होंने कहा कि श्रीराम का वनवास भारतीय संस्कृति में त्याग, आज्ञापालन और मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण है। भगवान श्रीराम चाहते तो अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर सकते थे, लेकिन उन्होंने पिता के वचन को सर्वोपरि माना। यही कारण है कि श्रीराम केवल भगवान के रूप में ही नहीं, बल्कि आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजनीय हैं।

वनगमन के प्रसंग में जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या से विदा हुए तो कथा पांडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावुक हो उठे। अयोध्यावासियों का विलाप, माता सीता का पति के साथ वन जाने का संकल्प और लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम सुनकर भक्तों की आंखें नम हो गईं। पूरे वातावरण में करुणा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

आचार्य महेंद्र सुनील शास्त्री ने कहा कि श्रीराम की वनवास लीला मनुष्य को जीवन में त्याग, धैर्य, संयम और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि श्रीराम ने विपरीत परिस्थितियों में भी मर्यादा और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा का उद्देश्य केवल कथा श्रवण करना नहीं, बल्कि भगवान के चरित्र से प्रेरणा लेकर उसे अपने जीवन में उतारना है।

उन्होंने बताया कि रविवार को श्रीराम कथा में केवट संवाद एवं चित्रकूट दर्शन के लीला प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया जाएगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर भगवान श्रीराम की वनयात्रा के इन दिव्य प्रसंगों का श्रवण करने और धर्मलाभ अर्जित करने का आग्रह किया।

कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण भजनों एवं श्रीराम के जयघोष के साथ वातावरण को राममय कर दिया।

इस अवसर पर रामचरण शर्मा, प्रमोद गुप्ता, सुभाष गिरी, प्रदीप द्विवेदी, अरविंद पंडित जी, मोहित दिवाकर, दियांश सक्सेना, प्रियंका अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।

Dr. Bhanu Pratap Singh