‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत सेंट जॉन्स कॉलेज और राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने काराया कार्यक्रम
Agra, Uttar Pradesh, India. आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत सेंट जॉन्स कॉलेज और राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने रोचक संगोष्ठी कराई। इसका विषय था- स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य का योगदान। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू के जानकारों ने अपनी बात रखी। सभी ने माना कि साहित्यकारों ने राष्ट्रीय चेतना का जागरण किया है। हिन्दी साहित्य के विकास के साथ ही राष्ट्रवाद का जन्म हुआ है। संगोष्ठी में आजादी का अलख जगाने वाले साहित्यकारों को नमन किया गया। इस मौके पर प्रबंधन विषय में हन्दी माध्यम से शोध करने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. भानु प्रताप सिंह का सम्मान किया गया।

सेन्ट जॉन्स कॉलेज के सभागार में हुई संगोष्ठी के मुख्य अतिथि मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक आरपी शर्मा थे। उन्होंने कहा कि देश सर्वोपरि है। वक्ताओं से आग्रह किया कि रोचक ढंग से अपनी बात रखें। ऑडियो-विजुअल की भी सलाह दी। अध्यक्षता करते हुए सेन्ट जॉन्स डिग्री कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर एसपी सिंह ने विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने कहा कि यह ठीक है कि आजादी की लड़ाई राजनीतिक थी लेकिन सामाजिक जागरण भी हुआ। इस दौरान साहित्यकारों ने राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत साहित्य रचा। यही साहित्य की संवेदनशीलता है। साहित्य ने स्वतंत्रता के लिए राष्ट्र का पुनर्जागरण किया। उन्होंने प्रेमचंद की कहानी गबन का उल्लेख करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में पुलिस झूठे केस दर्ज करके झूठी गवाही दिलाती थी। गबन में नारी समस्या का व्यापक चित्र भी चित्रित है और इसे पहली बार देश की स्वाधीनता की समस्या से जोड़ा गया। गबन के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन में मध्यम वर्ग, निम्न वर्ग और नौकरशाहों की भूमिका को भी समझा जा सकता है। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. देवी सिंह नरवार ने कार्यक्रम के लिए प्रो. एसपी सिंह को सराहा। कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. विनी जैन ने किया। अतिथियों का स्वागत पौधा देकर किया गया।

हिन्दी का विदेशों में परचम फहरा रहे और जाने-माने विद्वान डॉ. श्रीभगवान शर्मा ने कहा- शब्दों में तलवार और तोप से भी अधिक शक्ति होती है। इसी से साहित्य का महत्व समझा जा सकता है। 1857 के बाद भारत में राष्ट्र की भावना आई। संस्कृति साहित्य में भी जन्मभूमि की बात कही गई है, न कि राष्ट्र की। 1857 में हिन्दी-उर्दू में नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी भाषा में साहित्य रचा गया। अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति अपनाकर भारत पर शासन किया। उन्होंने सत्यनारायण कविरत्न, सियाराम शरण गुप्त, रामनारायण त्रिपाठी के साहित्य को भी सराहा।

राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्याक डॉ. संजय मिश्रा ने अपना उद्बोधन अंग्रेजी में दिया। उन्होंने कहा- महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि अंग्रेजी बोलते थे। भारतीय अंग्रेजी साहित्यकारों ने स्वतंत्रता के बारे में लिखना शुरू किया। इस सबके बाद भी आजादी के पूरे आंदोलन में कई नारा अंग्रेजी में नहीं दिया गया। उन्होंने अंग्रेजी के कई विद्वानों के उद्धृत करते हुए अपनी बात रखी।
बैकुंठी देवी महिला महाविद्यालय में हिन्दी की आचार्य डॉ. गुंजन बंसल ने कहा कि आजादी के आंदोलन को समझने के लिए हिन्दी साहित्यकारों की यात्रा को समझना आवश्यक है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के साथ हिन्दी ने अपना वर्तमान रूप ग्रहण किया। डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन हिन्दी का जातीय संग्राम है। हिन्दी साहित्यकारों से अन्य भाषाओं के लेखक प्रेरित हुए। आनंद मठ जब हिन्दी में आया तो क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई। साहित्यकारों ने अंग्रेजी शासन की आर्थिक नीतियों का भी विरोध किया।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा कि आजादी के आंदोलन में एक दर्जन साहित्यकारों को जेल जाना पड़ा। पुष्प की अभिलाषा जैसी कालजयी रचना करने वाले माखन लाल चतुर्वेदी तो 12 बार जेल गए और 69 बार उनके घर की तलाशी हुई। भगत सिंह को भगत सिंह बनाने वाले बालकृष्ण शर्मा नवीन थे। उन्होंने भगत सिंह को हिन्दी-उर्दू की शिक्षा दी, तब वे अपनी बात सब तक पहुंचा पाए। सुभद्रा कुमार चौहान 17 वर्ष की उम्र में गिरफ्तार हुई थीं। आजादी की लड़ाई में 400 से अधिक पुस्तकें जब्त कर ली गईं। इन सब बातों का जिक्र इतिहास में नहीं मिलता है। आजादी के आंदोलन में पत्रकारों ने बड़ी भूमिका निभाई। पत्रकार समसामयिक साहित्य की रचना रोज करते हैं। उन्होंने क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां का शेर सुनाया-
सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,
चलवाओ गन मशीनें हम सीना अड़ा देंगे।
छात्र मोहम्मद नावेद ने अपनी बात उर्दू में रखी। उन्होंने कहा कि आजादी की जंग में उर्दू साहित्य का विशेष योगदान है। इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा मौलाना हसरत मोहानी ने दिया था, जिसे सरदार भगत सिंह ने अपनाया। उर्दू नॉवल में शुरुआत से ही वतनपरस्ती है। आजादी के आंदोलन में शहीद होने वाला पहला पत्रकार उर्दू का था। अंग्रेजों के खिलाफ लिखने पर उर्दू अखबार मालिकों को जेल जाना पड़ा।
- Why Vulkan Vegas Casino Became My Preferred Gambling Destination UK Player Story - October 2, 2026
- Spela i Din Egen Rytm och Ta Hem Vinster med Tillit på Smash Casino för Sverige - September 29, 2026
- Jackpot Casino – Registrierungsanleitung für neue Spieler in Deutschland - September 29, 2026