हूजरी भवन, पीपल मंडी, आगरा राधास्वामी (Hazuri Bhawan, Peepal mandi, Agra) का आदि केन्द्र है। यहीं पर राधास्वामी मत (Radha Soami Faith) के सभी गुरु विराजे हैं। राधास्वामी मत के वर्तमान आचार्य (Radhasoami guru Dadaji maharaj) और अधिष्ठाता दादाजी महाराज (प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर) हैं जो आगरा विश्वविद्यालय (Agra university) के दो बार कुलपति (Vice chancellor of Agra university) रहे हैं। हजूरी भवन (Hazuri Bhawan, Peepal Mandi, Agra) में हर वक्त राधास्वामी (Radha Soami) नाम की गूंज होती रहती है। दिन में जो बार अखंड सत्संग होता है। दादाजी महाराज ने राधास्वामी मत (RadhaSomai faith) के अनुयायियों का मार्गदर्शन करने के लिए पूरे देश में भ्रमण किया। इसी क्रम में 31 मार्च, 2000 को अग्रसेन भवन, हिसार (हरियाणा, भारत) में सतसंग के दौरान दादाजी महाराज (Dadaji maharaj Prof Agam Prasad Mathur) ने कहा- आपकी सुरत चैतन्य शक्ति रोज इंद्रियों द्वारा जाया होती है और आप कर्म करते हैं। जैसे-जैसे आप रोज कर्म करते जाते हैं वह आपके मनाकाश पर अंकित होते चले जाते हैं और जब मृत्यु का समय आता है तो वह मनाकाश रूपी पर्दे पर निकल आते हैं।
परमार्थ की तरफ से अधिक गाफिल न हों
माया और माया के उन तत्वों पर अंकुश लगाने का जो सहज साधन हमारे मत अर्थात राधास्वामी मत यानी संतमत में बताया जाता है वह बताने आया हूं। जो लोग अब तक गाफिल रहे हैं उनको मैं यह चेतावनी देना चाहता हूं कि परमार्थ की तरफ से अधिक गाफिल रहने से आपको बड़ी हानि उठानी पड़ेगी। इसलिए पहले मैं आपके हृदय में क्रांति पैदा करना चाहता हूं और मालिक की मौजूदगी के बीच उन शंकाओं और भ्रमों को दूर करना चाहता हूं जो आपके हृदय में विरोधी शक्तियों के रूप में हिलोरें लेती हैं। आप निश्चित मानिए कि मालिक मौजूद है बिना उनकी मौत और मर्जी के पत्ता भी नहीं हिल सकता, आप तो कोई चीज नहीं है
जितने अनुसंधान उतने रोग
जितना अनुसंधान औषधि विज्ञान में होता जा रहा है उतने ही रोग बढ़ते जा रहे हैं। टीबी पर कब्जा किया तो कैंसर आ गया। कैंसर पर कब्जा किया तो एड्स आ गया। इसका मतलब यह है कि मृत्यु निश्चित है, चाहे किसी तरह से हो। उस समय कौन सहायता दे सकता है। जान लीजिए न तो वैज्ञानिक उसमें आपकी सहायता कर सकते हैं और ना कोई डॉक्टर। तब फिर कौन कर सकता है। यह बात सही मान लीजिए कि आप काल और माया के चक्कर में फंसकर इस देश में जो पिंड देश है जहां पर माया सबल है, निर्मल चैतन्य मोटी-मोटी माया की परतों से ढका हुआ है। उससे अपने आप निकासी नहीं कर सकते।
काल ने आपके पीछे मन की आफत लगाई
अंत समय में आपको उन कर्मों का जवाब देना पड़ेगा जो कि आप इस मलीन देश में करते हैं या आपको करने पड़ते हैं। क्योंकि आपका रूप तो सुरत का रूप है जो मालिक के भंडार की एक बूंद रूप है, लेकिन काल ने आपके पीछे मन की आफत लगा दी है। दूसरी आफत माया ने इच्छा की लगा दी। मन इच्छा उठाता है और तब आप लोगों में पदार्थों को ढूंढने की चाह पैदा होती है। लिहाजा उसने दस इंद्रियां औजार के रूप में आपको दी हुई हैं। आपकी सुरत चैतन्य शक्ति रोज इंद्रियों द्वारा जाया होती है और आप कर्म करते हैं। जैसे-जैसे आप रोज कर्म करते जाते हैं वह आपके मनाकाश पर अंकित होते चले जाते हैं और जब मृत्यु का समय आता है तो वह मनाकाश रूपी पर्दे पर निकल आते हैं। (क्रमशः)
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