नई दिल्ली/सहारनपुर: ‘सब चंगा’ का दावा करने वाला दिल्ली-देहरादून ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, जिसका उद्घाटन 14 अप्रैल को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, अपनी पहली ही परीक्षा में बुरी तरह नाकाम साबित होता दिख रहा है। 12,000 करोड़ रुपये की विशाल लागत से तैयार इस 210 किलोमीटर लंबे ‘वर्ल्ड-क्लास’ कॉरिडोर पर मानसून की पहली बारिश ने ही निर्माण कार्यों की पोल खोलकर रख दी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों ने इस प्रोजेक्ट की गुणवत्ता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
पहली बारिश में ही ‘खस्ताहाल’ एक्सप्रेसवे
कभी 5-6 घंटे का थकाऊ सफर महज ढाई घंटे में पूरा करने का सपना दिखाने वाला यह एक्सप्रेसवे अब यात्रियों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। मानसून के दस्तक देते ही सड़क की ऊपरी परत उखड़ने लगी है और बड़े-बड़े गहरे गड्ढे उभर आए हैं। शास्त्री पार्क से खजूरी खास की ओर जाने वाले हिस्से की हालत तो और भी बदतर है। सोशल मीडिया यूजर सचिन गुप्ता द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे ये गड्ढे सड़क पर चलने वाले वाहनों के लिए मौत का जाल बन गए हैं।
सिर्फ 3 महीने में ही ड्रेनेज सिस्टम फेल?
महज तीन महीने पुराने इस एक्सप्रेसवे के ड्रेनेज सिस्टम की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वायरल वीडियो में एक यात्री ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि सड़क की स्थिति इतनी दयनीय है कि उसके सामने ही 4-5 गाड़ियां अपना संतुलन खो चुकी हैं और दो गाड़ियों के अलॉय व्हील तक टेढ़े हो गए हैं। सिर्फ सड़क ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर स्लैब से पानी रिसने की खबरें भी सामने आई हैं, जो प्रोजेक्ट की इंजीनियरिंग पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त हैं।
‘तीसरी आंख’ का पहरा, पर गड्ढों पर नजरें क्यूं बंद?
इस एक्सप्रेसवे पर हाई-टेक ANPR कैमरे और रडार-बेस्ड VSDS सिस्टम का कड़ा पहरा है। तय गति सीमा से थोड़ा भी तेज चलने पर चालान भेजने वाली यह ‘तीसरी आंख’ अब लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गई है। जनता तीखे लहजे में पूछ रही है कि क्या कैमरे केवल चालान काटने के लिए ही हैं? क्या ये कैमरे सड़क पर बने उन खतरनाक गड्ढों को नहीं देख पा रहे हैं, जिनकी वजह से लोग दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं?
टोल वसूलने की जल्दी, निर्माण की परवाह नहीं?
भारी-भरकम टोल टैक्स वसूलने के बावजूद सड़क का यह हाल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोग आक्रोशित हैं कि आखिर इतने बड़े बजट के प्रोजेक्ट में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे बरती गई? फिलहाल यह मामला चर्चाओं के केंद्र में है और अब देखना यह होगा कि क्या निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग इस बदहाली के लिए कोई जवाबदेही तय करते हैं या इसे महज बारिश का कुदरती असर मानकर टाल दिया जाएगा।
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