इस आलेख के साथ आप जो तस्वीर देख रहे हैं, वह हमारे समाज, धर्म के ठेकेदार और भारत पर राज करने वाले नेताओं के मुंह पर तमाचा है। अगर किसी को शर्म आई है तो मुझे जरूर फोन करना। इस तस्वीर के सामने आने के बाद मैं व्यथित हूँ। व्यग्र हूँ। इस समय मैं स्वयं जीविकोपार्जन की जुगाड़ में पूरा दिन खप रहा हूं। हमारे जो सांसद और विधायक लाखों रुपये वेतन सरकार से पा रहे हैं, वे क्या कर रहे हैं। केवल धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं। कितनी अजीब बात है कि धर्म की राजनीति में गरीबी मुद्दा नहीं है। राजीव गुप्ता जनस्नेही का ये आलेख पढ़िए और गरीबी की एबीसीडी समझिए। -संपादक
किसी ने कहा है- यहाँ गरीब को मरने की इसलिए भी जल्दी है साहब,
कहीं जिन्दगी की कशमकश में कफ़न महँगा ना हो जाए। दुनिया में विकासशील देश हो या विकसित देश, गरीबी की समस्या हर देश में होती है। कहीं कम कहीं ज्यादा। विकसित देशों को छोड़ दें तो हर देश में बढ़ती हुई आबादी और सीमित संसाधनों की वजह से गरीबी की समस्या से सभी देश रूबरू हो रहे हैं। वैसे तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा 22 दिसम्बर 1992 को हर साल 17 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस मनाये जाने की घोषणा की गयी है, लेकिन इसेस होता क्या है।
भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। आज वह भी गरीबी के दंश को ना केवल झेल रहा है बल्कि मकड़जाल में फंसा हुआ है। आजादी से पहले या बाद हमेशा सभी राजनीतिक पार्टियों ने गरीबी उन्मूलन का मुद्दा अपनी पार्टी के पत्र में तो लिखा परंतु धरातल पर उसे कभी भी सफल बनाने का समुचित प्रयास नहीं किया। अब तो दो दशकों से गरीबी हटाओ- देश का विकास कराओ जैसे नारे धर्म व जाति की राजनीति में कहां खो गए हैं, पता ही नहीं चलता है|
आपको जानकर ‘आश्चर्य होगा गरीबी उन्मूलन की दिशा में कार्य करने वाले भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित किया था लेकिन उसी के देश में आज अधिकतर जनता गरीबी का जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं। देश का बचपन सुबह उठने से लेकर रात सोने तक दो वक्त की रोटी के लिए कट रहा है और वह भी बड़ी मुश्किल से नसीब होती है| कपड़ों के नाम पर तन न ढका हो तो वह मकान की तो सोच ही नहीं सकता है|
आज हमारे देश में सरकार के अनुसार शहरी गरीब प्रतिदिन लगभग ₹२९ और ग्रामीण क्षेत्र के लिए ₹२३ से कम आय वाले को सम्मिलित किया है यह सरासर गरीबों के साथ अन्याय है। आज के जमाने में जब ₹30 में एक वक्त का खाना एक व्यक्ति के लिए भी बहुत मुश्किल है, तब यह कैसे मानक ह। गरीब को तेल, कंघा, साबुन, कपड़ा भी चाहिए। आपको जानकर आश्चर्य होगा भारत की आधी से ज्यादा आबादी बिना साबुन तेल के रहती है और इसी देश में हमारी राजनीतिक और सरकारी लोगों को अनेक प्रकार की सुविधाएं और तनख्वाह व पेंशन मिलती है।
कितनी हास्यास्पद बात है जिस एमपी को लाखों रुपए मिलते हैं, उसे ₹20 में संसद की कैंटीन से खाना मिल जाता है। यही कारण है कि आज कानून बनाने वाले सही कानून ना बनाकर गरीबों के साथ अत्याचार तो कर ही रहे हैं, अपितु देश के विकास में मैं भी बहुत बड़ा धोखा कर रहे हैं| अगर भारत को विकसित देश की श्रेणी में लाना है तो सरकार को समाजिक समरसता या साम्यवाद लाना होगा, साथ ही उसे धरातल पर आकर अपने आंकड़े और वस्तुस्थिति को आँकलन करना होगा, अन्यथा वह दिन दूर नहीं है जब कोई गरीब उस राजनीतिक की गाड़ी के आगे लेट कर आत्महत्या करने पर विवश हो जाए जिसने अपना राजनीतिक कैरियर एक गरीब नागरिक की हैसियत से शुरू किया था ।
किसी ने सच कहा है
कतार बहुत लम्बी थी, इसलिए सुबह से रात हो गई
ये दो वक्त की रोटी आज फिर मेरा अधूरा ख्वाब हो गई
राजीव गुप्ता ‘जनस्नेही’
लोक स्वर, आगरा
फोन नंबर 98370 97 850
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