फायरमैन जितेंद्र राठौर की शिकायत पर
दयालबाग डीम्ड विश्वविद्यालय आगरा को
उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग का नोटिस,
30 दिन का अल्टीमेटम, जानिए क्या है मामला
आगरा। उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा विभाग में कार्यरत यूजीसी नेट जेआरएफ क्वालिफाइड (AIR 132) फायरमैन जितेंद्र राठौर की शिकायत पर
दयालबाग डीम्ड विश्वविद्यालय, आगरा के खिलाफ कार्रवाई की आहट तेज हो गई है।
उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है
और 30 दिन के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का अल्टीमेटम दिया है। यह मामला अब महज एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं,
बल्कि संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।
क्या है मामला
वर्तमान में
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता
(डायरी नंबर 34554/2024) रिसर्च स्कॉलर
श्री जितेन्द्र राठौर पुत्र
श्री दरवान सिंह राठौर
निवासी शंकरपुरी शिकोहाबाद, फिरोजाबाद का दयालबाग डीम्ड यूनिवर्सिटी आगरा के
पी०एच०डी० गणित प्रोग्राम में मार्च, 2020 में प्रवेश हुआ था तथा उक्त प्रोग्राम में उनका
रजिस्ट्रेशन दिनांक 28.3.2022 को हुआ था। संस्थान की बी०एस०सी० द्वित्तीय सेमेस्टर की छात्रा
कु० दिव्या ने दिनांक 11.5.2022 को
श्री जितेन्द्र राठौर के विरूद्ध मानसिक उत्पीड़न की शिकायत विज्ञान संकाय प्रमुख को प्रस्तुत की थी।
संस्थान ने अपनी अनुशासनात्मक जाँच समिति के माध्यम से जाँच की थी और समिति के निष्कर्षों और
सिफारिशों के आधार पर श्री जितेन्द्र राठौर को बिना कोई कारण बताओ नोटिस दिए दिनांक 19.10.2022 द्वारा
संस्थान से निष्कासित कर दिया था।
श्री जितेन्द्र राठौर ने कुलसचिव, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के आदेश दिनांक 19.10.2022 के विरूद्ध
यूनियन ऑफ इंडिया एवं कुलसचिव, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट सहित 2 अन्य के खिलाफ
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष
रिट याचिका संख्या 40021/2023 दायर की थी, जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 29.03.2024
के माध्यम से रिट याचिका को खारिज कर दिया था। श्री जितेन्द्र राठौर ने माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद
के उक्त आदेश के विरूद्ध पुनः स्पेशल अपील संख्या 451/2024 दायर की थी, लेकिन न्यायालय में राठौर खुद
सबूतों के आधार पर अपनी बात रखना चाहते थे, लेकिन राठौर के वकील ने उन्हें जज के सामने अपनी बात रखने
का मौका नहीं दिया। जिसकी वजह से स्पेशल अपील को दिनांक 06.05.2024 को खारिज कर दिया गया ।
अग्रिम फीस और निष्कासन की सूचना
शिकायतकर्ता के अनुसार 26 सितम्बर 2022 को उनसे छह माह की अग्रिम फीस ली गई। इसके मात्र कुछ ही दिनों
बाद, 19 अक्टूबर 2022 को ईमेल के माध्यम से निष्कासन की सूचना दे दी गई। फीस लेने और तत्पश्चात
निष्कासन की प्रक्रिया ने पूरे घटनाक्रम पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, क्योंकि संस्थान में एडमिशन लेते
समय फायरमैन का नाम जितेंद्र कुमार था और निष्कासन के समय जितेंद्र राठौर ?
उपस्थिति दर्ज और शोध कार्य जारी रखने का निर्देश
निष्कासन की सूचना के बावजूद विश्वविद्यालय के गणित शोध विभाग द्वारा उनकी उपस्थिति दर्ज की जाती रही।
इतना ही नहीं, उन्हें शोध कार्य जारी रखने के लिए भी कहा गया ।राठौर का PhD रजिस्ट्रेशन नंबर 203366 से
बदलकर 203858 करने के बाद, उनके PhD टॉपिक को ‘A Mathematical Modelling of Covid 19’ से बदलकर दूसरा
टॉपिक कर दिया गया और उनकी सुपरवाइज़र
सौम्या सिन्हा ने उन पर इस पर
PhD सिनॉप्सिस लिखने का दबाव डाला और उनकी सुपरवाइज़र ने राठौर से JRF स्कॉलरशिप को आगे जारी न रखने के
लिए कहा। यह स्थिति प्रशासनिक निर्णय और विभागीय आचरण के बीच स्पष्ट विरोधाभास को उजागर करती है।
ऑडियो रिकॉर्डिंग का दावा
जितेंद्र राठौर का कहना है कि उनके पास निदेशक
प्रेम कुमार कलरा और मुख्य प्रॉक्टर
जे.के. वर्मा की आवाज़ की रिकॉर्डिंग
और बार बार बदल बदल कर शिकायत करने वाली लड़की
दिव्या उपाध्याय की व्हाट्सएप ग्रुप
चैटिंग व कॉल रिकॉर्डिंग भी सुरक्षित है। उनका दावा है कि ये रिकॉर्डिंग पूरे प्रकरण में महत्वपूर्ण
साक्ष्य के रूप में काम कर सकती हैं।
एनरोलमेंट नंबर में परिवर्तन और गंभीर आरोप
राठौर के अनुसार उनका Enrollment Number 203366 से बदलकर 203858 कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया है
कि विश्वविद्यालय ने अपनी त्रुटि छिपाने के लिए एक अन्य छात्रा को आगे कर पूरे विवाद को अलग दिशा देने
का प्रयास किया और कोरोना वायरस पर उनका रिसर्च वर्क दूसरे PhD रिसर्च स्टूडेंट को दे दिया गया। यह
आरोप मामले को और जटिल बना देता है।
प्रवेश तिथि और आधिकारिक सूची में विरोधाभास
कुलसचिव के पत्र में प्रवेश तिथि मार्च 2020 दर्शाई गई, जबकि उस समय की आधिकारिक प्रवेश सूची में उनका
नाम नहीं था। दूसरी ओर अन्य छात्रों के नाम सूची में स्पष्ट रूप से दर्ज थे। 2020 में मैथेमेटिक्स
डिपार्टमेंट में एनरोल सात PhD रिसर्च स्कॉलर में राठौर का नाम लिस्टेड नहीं था। राठौर का दावा है कि
डिपार्टमेंट में एनरोल सात PhD स्कॉलर में से सिर्फ़ एक ही अभी रिसर्च कर रहा है। दूसरों को भी झूठे
आरोपों में निकाल दिया गया, और कुछ ने खुद ही इस्तीफ़ा दे दिया।प्रशासनिक रिकॉर्ड और आधिकारिक पत्र के
बीच यह सीधा विरोधाभास पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
सुपरवाइज़र अलॉटमेंट पर सवाल
31 अगस्त 2020 को विभागाध्यक्ष द्वारा ईमेल के माध्यम से सुपरवाइज़र अलॉटमेंट सूची जारी की गई, जिसमें
उनके नाम के आगे डॉ. सौम्या सिन्हा का नाम दर्शाया गया था। यदि प्रवेश मान्य नहीं था, तो सुपरवाइज़र
आवंटन में नाम शामिल होना कैसे संभव हुआ? यह प्रश्न विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रक्रिया पर सीधा वार
करता है।
मानसिक उत्पीड़न के आरोप और कानूनी प्रक्रिया
विश्वविद्यालय द्वारा 11.05.2022 को एक छात्रा के मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए 19.10.2022 को
निष्कासन का हवाला दिया गया। किंतु यदि आरोप गंभीर था, तो तत्काल पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई? यह
बिंदु प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
परीक्षा ड्यूटी और निष्कासन के बाद की गतिविधियाँ
10 जुलाई 2022 को उन्हें प्रवेश परीक्षा में ड्यूटी दी गई। निष्कासन के बाद भी 13 फरवरी 2023 तक उन्हें
शैक्षणिक कार्यक्रमों में भाग लेने का निमंत्रण मिला और 11 मार्च 2023 को एक शोध प्रमाणपत्र भी प्रदान
किया गया। यदि निष्कासन प्रभावी था, तो ये गतिविधियाँ किस आधार पर जारी रहीं? यह प्रशासनिक असंगति को
उजागर करता है।
प्रकरण से उभरते मुख्य प्रश्न
उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय के पत्राचार और वास्तविक रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियाँ
हैं। प्रवेश, निष्कासन, सुपरवाइज़र आवंटन और बाद की गतिविधियों के बीच विरोधाभास प्रशासनिक पारदर्शिता
पर प्रश्न उठाते हैं। पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा जारी नोटिस अब इस पूरे घटनाक्रम की विधिक जांच की दिशा
तय करेगा।
एक गंभीर आरोप यह भी
दयालबाग विश्वविद्यालय की मुख्य प्रवेश सूची में मेरा नाम नहीं था और प्रारंभ में मुझे प्रवेश परीक्षा
में असफल घोषित कर दिया गया। मैंने विश्वविद्यालय के परीक्षा संयोजक प्रोफेसर
एल. एन. कोहली से कहा कि मैं यूजीसी
नेट जेआरएफ हूँ और जेआरएफ स्कॉलर्स का सीधा प्रवेश होता है। अतः मुझे असफल घोषित नहीं किया जा सकता।
मैंने यह भी कहा कि यदि मुझे प्रवेश नहीं दिया गया तो मैं विश्वविद्यालय की शिकायत यूजीसी से करूँगा।
इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मेरी बात को दबाने के लिए मुझे गुप्त रूप से एक ऑनलाइन परीक्षा
दिलवाई और मुझे कृत्रिम तरीके से प्रवेश दे दिया। किंतु दो वर्ष बाद, मेरा शोध कार्य पूरा होने पर,
विश्वविद्यालय ने मेरे विरुद्ध उत्पीड़न का झूठा आरोप लगाकर मुझे मेरी शिक्षा के अधिकार से वंचित कर
दिया।
संपादकीय
सिस्टम से टकराना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब सामने एक बड़ा संस्थान हो और आप एक साधारण सरकारी
कर्मचारी। जितेंद्र राठौर ने जिस साहस से अपनी बात रखी, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक अधिकारों
की ताकत को रेखांकित करता है। व्यवस्था में खामियां हों तो उन्हें उजागर करना विद्रोह नहीं, सुधार की
पहल है। यदि आरोपों में सच्चाई है तो पारदर्शिता की जीत होगी, और यदि नहीं, तो सत्य स्वयं सामने आ
जाएगा।
लेकिन एक बात निर्विवाद है—व्यवस्था के सामने प्रश्न खड़ा करना भी साहस मांगता है। ऐसे साहस को समाज
में सम्मान मिलना चाहिए, क्योंकि जवाबदेही से ही संस्थाएं मजबूत बनती हैं।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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