Mathura (Uttar Pradesh, India)। मथुरा। (सुनील शर्मा) स्वाधीनता के बाद देश में एक ऐसी घटना घटी जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका है, हांलाकि इस घटना के चश्मदीद गवाह अब गिने चुने ही बचे हैं फिर भी अधिकांश लोगों को उनके पूर्वजों व अपनों से, बड़ों से कहानी के रूप में सुनने को मिली घटना आज भी लोगों को सिरहन पैदा कर देती है। इतना बड़ा रेल हादसा वो भी यमुना के बीचों बीच रेलवे के पुल पर घटी थी वह भी मुडिया पूर्णिमा मेला के दिन आज से लगभग 58 साल पहले की घटना सन् 1962 की 17 जुलाई मंगलवार का दिन था और गुरूपूर्णिमा का पर्व था।
मथुरा में यमुना नदी को पार करने के लिए मात्र एक ही साधन था
देश में आवागमन की व्यवस्थाएं भी नहीं थी। मथुरा में यमुना नदी को पार करने के लिए मात्र एक ही साधन था रेलवे का पुल उस पर से पैदल चलने की व्यवस्था थी और ट्रेन का आवागमन भी होता था और सड़क भी थी। रेलवे के पुल के उपर रेलगाड़ी के निकलने भर को जगह थी। रेल के निकलने के समय में सड़क को बंद कर दिया जाता था। रेलगाड़ी के उपर यदि कोई चढ़ जाता तो उसका घायल होना निश्चित ही था।
भींड़ अधिक होने के कारण लोग रेल गाड़ी की छत्तों पर चढ़ कर यात्रा कर रहे थे
17 जुलाई मंगलवार 1962 का दिन मथुरा के इतिहास में और स्वतन्त्र भारत के इतिहास में रेलवे की यह पहली घटना थी। जब मुडिया पूनों यानी मुड़िया पूर्णिमा के दिन परिक्रमार्थी गिर्राज गोवर्धन की परिक्रमा करने को बड़ी संख्या में आते हैं उस दिन भी आये, भींड़ अधिक होने के कारण लोग रेल गाड़ी की छत्तों पर चढ़ कर यात्रा कर रहे थे। उस समय यह रेल मार्ग नोर्दन ईस्टन रेलवे का भाग था और इस मीटर गेज (छोटी लाइन) रेल मार्ग पर नोर्थ बंगाल न्यू जलपाईगुडी, असम तक की यात्राएं इस मार्ग से लोग किया करते थे।
स्थानीय स्तर पर बरेली, इज्जतनगर तक के यात्री भी यातायात किया करते थे। मुड़िया पूर्णिमा मेला में रेल यातायात से पूर्व भी लोग पैदल ही तीर्थयात्रा करने के लिए आते थे रेल मार्ग शुरू होने के वाद से लोग रेल का उपयोग करने लगे। आज यह रेल मार्ग ब्राडगेज (बड़ी लाइन) होने के वाद इसका इलैक्ट्रीफिकेशन भी हो चुका है।
किस प्रकार से हजारों लोग एक साथ काल के गाल में समा गए थे
रेल हादसे को लगभग 58 साल बीत चुके है। उस समय के आज भी मौजूद लोगों की जुबान आज भी यह बताते-बताते लडखड़ा जाती है, मुड़िया पूर्णिमा के दिन 17 जुलाई मंगलवार की सुबह करीब चार बजे का समय था। यमुना नदी पर बने रेल के पुल पर तेजी के साथ एक सवारी गाड़ी गुजरी और देखते ही देखते सैकड़ों लोग जो रेलगाड़ी की छत पर बैठे थे, दुर्घटना का शिकार हो गये, कोई कुछ समझ पाता कि किसी की गर्दन कट गयी, कोई धड़ से अलग हो गया, किसी का हाथ कटा, किसी की टांग कटी चारों ओर चीख पुकार और बदहवास होकर इधर-उधर दौड़ते लोग देखे जा सकते थे। जो लोग दुर्घटना का शिकार हुए और गर्दन कटने के वाद भी कुछ समय के लिए वह नदी और आस पास इधर-उधर चलते देखे गये। ऐसा भयानक हादसा का जिक्र करते हुए सुशील शर्मा जो वर्तमान में लन्दन में निवास करते है उन्होंने बताया कि उस समय उनकी उम्र करीब 12-13 वर्ष की थी। घटना की जानकारी मिलते ही यमुना किनारे जाकर देखा था कि किस प्रकार से हजारों लोग एक साथ काल के गाल में समा गए थे तथा सैकड़ों लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए थे।
रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था
इस घटना के सम्बन्ध में लम्बे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडे रहे मोहन स्वरूप भाटिया ने बताया कि गोवर्धन की परिक्रमा करने के लिए हजारों लोग रेलगाड़ी के डिब्बों की छतों पर बैठकर परिक्रमा के लिए आ रहे थे। पिछले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो रेलवे कर्मचारियों ने छतों पर यात्रा करने से मना भी किया था। लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। हर मुड़िया पूनों पर सभी रेलगाड़ियों की छतों पर बैठकर यात्री गोवर्धन परिक्रमा के लिए आते थे। हमेशा पुल से पहले ड्राइवर गाड़ी रोक देता था तथा यात्री उतर कर गोवर्धन जाने के लिए बस या अन्य साधनों से जाते थे।
ड्राइवर जो एक मुसलमान था, वह काफी गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया
एक अन्य पत्रकार ब्रजगरिमा के सम्पादक विनोद चूडामणि ने बताया कि मैं उस समय पढ़ाई कर रहा था मगर मुझे इस घटना की यादें आज भी मेरे मन मस्तिष्क में स्टष्ट छवि के साथ है कि यात्रियों के न उतरने से रेलगाड़ी का ड्राइवर जो एक मुसलमान था, वह काफी गुस्से में रेलगाड़ी को रेलवे पुल से तेजी से ले गया और राया स्टेशन पार करते ही उसने रेलगाड़ी की रफ्तार एकदम तेज कर दी तथा बहुत तेज गति से पुल के अंदर गाड़ी को घुसा दी जिससे इतना बड़ा हादसा हुआ था।
गाड़ी के डिब्बों की छतें यहां तक कि खिड़की-दरवाजे खून से लाल हो गये
सुबह के सन्नाटे में इस भयंकर दुर्घटना में चीख पुकार की आवाज दूर दूर तक सुनी गयी चारों ओर हा हाकार मच गया। सैकड़ों लोग इस दुर्घटना का शिकार हुए चारों ओर खून ही खून बिखर गया। पूरी गाड़ी के डिब्बों की छतें यहां तक कि खिड़की-दरवाजे खून से लाल हो गये। जो लोग खिड़की के सहारे बैठे थे या दरवाजे पर खड़े थे वह भी खून से सन गये थे। पुल की सड़क भी खून से लाल हो गई। चारों तरफ शरीरों के चिथड़ौं व खून से सड़क पट गई और यमुना का पानी भी कुछ समय के लिये लाल हो गया। उल्लेखनीय है कि पहले इस पुल पर सड़क भी थी रेल और सड़क एक साथ होने के चलते सड़क के ऊपर बस, कार, ट्रक, तांगा आदि सभी वाहन गुजरते थे। कोई अन्य पुल उस समय यमुना पर नहीं था। रेल के गुजरते बक्त सड़क को बंद कर दिया जाता था।
एक रेल हादसा जो अब एक कहानी बन कर रह गई है।
इस भयानक हादसे के बाद न सिर्फ मथुरा के इस पुल की कैंचियों को हटाया गया, बल्कि पूरे देश में जहां-जहां भी पुलों के उपर कैंचियां थी सभी को हटा दिया गया। इस दुखद घटना की याद करके आज भी 70 या 80 वर्षीय लोग जो यमुना किनारे रहते हैं एक कहानी की तरह से सुनाते हैं।
मथुरा से सुनील शर्मा
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