Mathura (Uttar Pradesh, India)। मथुरा। भाद्रमास कृष्णपक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि, ग्रह नक्षत्रों का अद्भुत संयोग, भक्तों को अजन्मे कान्हा के आगमन का अद्भुत और सुखद अहसास करा रहे थे। इस बार श्रीकृष्ण जन्मस्थान सहित ब्रज के मंदिरों का नजार बदला बदला सा है। मंदिर रोशनी में नहाये हुए थे। मंदिरों की रौनक मन मोह रही थी लेकिन श्रद्धालु नदारद थे, मानों कान्हा के जन्म से पहले सब कुछ थम गया हो। मंदिरों के बाहर सन्नाटा पसरा था और अंदर घंटा घडियाल बज रहे थे। शंख की ध्वनि कान्हा के आगमन का संकेत कर रही थीं।
घडी की सूई टिकटिक कर 12 के निशान की ओर बढती जा रही थी। इसी गति से भक्तों की अधीरता भी अपने चरम पर पहुंच रही थी। वह अद्भुत, चमत्कारिक और आलौकिक क्षण आ गया जिसकी प्रतिक्षा पूरा विश्व कर रहा था, धीरे धीरे भागवत भवन में भगवान के श्रीविग्रह और सेवायतों के बीच दीवार बनी खादी की झीनी चादर खिसकने लगी, अचानक शंखनदा शुरू हो गया। पांच मिनट तक पूरा मंदिर परिसर शंखनांद की ध्वनियों से गुजायमान रहा।
टीवी पर देख भगवान के अवतरण की साक्षी बन खुद को धन्य हो रहे थे
यह इस बात की घोषणा थी कि अजन्मे भगवान श्रीकृष्ण प्रथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं। इस बार श्रीकृष्ण जन्मस्थान सहित दूसरे प्रमुख मंदिर देवालयों में श्रद्धालुओं को भगवान के अवतरण का साक्षी बनने का मौका नहीं मिला, इस अद्भुत, आलौकिक दृष्य को लोग टीवी पर देख पा रहे थे, मोबाइल पर देख रहे थे तो कुछ प्रसार भारती के रेडियो पर सुन रहे थे। इन माध्यमों से मथुरा में भगवान के अवतरण की साक्षी बन खुद को धन्य हो रहे थे। जन्म महाभिषेक का मुख्य एवं आलौकिक कार्यक्रम रात्र 11 बजे से श्रीगणेश नवग्रह आदि पूजन से शरू हुआ। 12 बजे भगवान के प्राकट्य के साथ ही संपूर्ण मंदिर परिसर में शंख, ढोल, नगाडे, झांझ, मजीरे और मृदंग एवं हरिबोल की करतल ध्वनि पर असंख्य भक्तजन, संत नाच उठे। भगवान के जन्म की प्राकट्य आरती रात 12:10 मिनट तक चली। रजत जडित कामधेन के दूध से भगवान के विग्रह का अभिषेक हुआ।
दिव्य शहनाई एवं नगाडों के वादन के साथ भगवान की मंगला आरती के दर्शन हुए
श्रीकृष्ण जन्मभूमि के संपूर्ण परिसर को अद्भुत कलात्मकता से सजाया गया था। साजसज्जा ऐसी कि देवता भी अभिभूत हो उठे। भगवान की प्राकट्य भूमि एवं कारागार के रूप में प्रसिद्ध गर्भगृह की सज्जा भी चित्तआकर्षक थी। पत्र, पुष्प, रत्न प्रकृति, वस्त्र आदि के अद्भुत संयोजन से बनाये गये बंगले में विराजमान हो ठाकुर शोभा पा रहे थे। पत्र, पुष्प, काष्ठ आदि से निर्मित इस बंगले की छठा और कला अनूठी थी। बुधवार को प्रातः दिव्य शहनाई एवं नगाडों के वादन के साथ भगवान की मंगला आरती के दर्शन हुए। तदोपरांत भगवान का पंचामृत अभिषेक किया गया एवं ठाकुर जी के प्रिय स्त्रोतों का पाठ एवं पुष्पार्चन हुआ।
ब्रज के घर घर में अवतरित हुए कान्हा
दुनियां ने भले ही यह देखा हो कि भद्रपद शक्ल पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के कारागार में जन्म लिया, लेकिन कान्हा तो हर ब्रजवासी के आंगन में अवतरित हुए। विश्व भले ही भगवान श्रीकृष्ण को गीता के महान उपदेशों के लिए जानता हो, ब्रज में तो वह पांच हजार साल बाद भी कान्हा हैं, ब्रजवासियों के लाला हैं। इसी वात्सल्य भाव से ब्रजवासी अपने भगवान की पूजा अर्चना करते हैं और इसी वात्सल्य भाव से दुलारते हैं
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