क्या मंदिर बनाना धर्म है? नेपाल केसरी जैन मुनि डॉ. मणिभद्र महाराज ने दिया चौंकाने वाला उत्तर

क्या मंदिर बनाना धर्म है? नेपाल केसरी जैन मुनि डॉ. मणिभद्र महाराज ने दिया चौंकाने वाला उत्तर

साक्षात्कार

नेपाल केसरी जैन मुनि डॉ. मणिभद्र महाराज का डॉ. भानु प्रताप सिंह ने लिया साक्षात्कार

पर्यूषण पर्व, धर्म, धर्मात्मा, पापात्मा, लव जिहाद, मंदिर, अहिंसा जैसे मुद्दों पर सवाल जवाब

 

नेपाल केसरी जैन मुनि डॉ. मणिभद्र महाराज इस समय आगरा में चातुर्मास कर रहे हैं। जैन स्थानक राजामंडी में उनके नित्य प्रवचन चल रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु आ रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने केशलोच लिया। उनके दो शिष्यों पुनीत मुनि एवं विराग मुनि ने केशलोच लिया। डॉ. मणिभद्र महाराज तनिक भी विचलित नहीं हुए। इसके बाद live story time के संपादक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने जैन मुनि से साक्षात्कार लिया। पर्यूषण पर्व, धर्म, धर्मात्मा, पापात्मा, लव जिहाद, मंदिर, अहिंसा, श्रेष्ठ धर्म जैसे मुद्दों पर प्रश्न किए। डॉ. मणिभद्र महाराज ने प्रश्नों के विस्तार से उत्तर दिए। बहुत लम्बी बातचीत हुई। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार विवेक कुमार जैन उपस्थित रहे। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश-

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः पर्यूषण पर्व क्या है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः दो प्रकार के पर्व होते हैं- लौकिक पर्व और लोकेत्तर पर्व। लौकिक पर्व में हम अच्छा खाना, अच्छा पहनना, आमोद प्रमोद के साथ मनाते हैं। लोकेत्तर पर्व का संबंध आत्मा से होता है। लोकेत्तर पर्व में सर्वश्रेष्ठ पर्व पर्यूषण पर्व माना गया है। आठ दिन में आत्मा की उपासना और साधना की जाती है। बाह्य आकर्षणों से स्वयं को मुक्त रखा जाता है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः केशलोच क्या है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः जैन साधु जब दीक्षा लेता है तो सबसे पहले सुंदर आकर्षण केश से मुक्ति चाहता है, जिनके प्रति लगाव होता है। पंचमुष्टि लोच करते हैं अर्थात पांच बार में ही केशों को समाप्त करता है। पुराने जमाने में जैन साधुओं के पास किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं होता था। इसलिए केश लोच द्वारा ही शरीर से बाहर करते थे। आज भी जैन साधु और साध्वी केश लोचन करते हैं, साल में दो बार तो कोई चार बार करता है। एक बार तो करना ही होता है। ऋषि पंचमी जिसे हम संवतसरी महापर्व के रूप में मनाते हैं, इससे पूर्व जैन साधु व साध्वी को केश लोचन करना होता है। केश लोचन करके शरीर की सहनशक्ति की परीक्षा करता है। आज हम छोटी-छोटी समस्याओं में भी डगमगा जाते हैं। जैन साधु स्वाभिमानी होकर किसी के सामने सिर नहीं झुकाता है। केश भी बढ़ते हैं तो अपने हाथों से निकालकर फेंक देता है। इस तरह हम लोग जितना हो सके अपनी सहन शक्ति बढ़ाने की कोशिश करें। मान-अपमान में एक समान रहें। समभाव में रहते हैं और समभावी को ही साधक कहा है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः धर्म क्या है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः बहुत सुंदर प्रश्न आपने पूछा है। हम धर्म का बहुत उच्चारण करते हैं। हम या तो धर्म पर आस्था करने वाले आस्तिक हैं या धर्म का विरोध करने वाले नास्तिक हैं। धर्म शब्द का उच्चारण इतना किया है, जिसका कोई हिसाब नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तक धर्म-धर्म। इसके बाद भी वास्तविक धर्म क्या है, इसकी जानकारी हमको नहीं मिल पाई है। हमने संप्रदाय को धर्म मान लिया है। अनेक तरह की धर्म की व्याख्या कर रखी है, जबकि वह धर्म नहीं है, अपितु गंतव्य तक पहुंचने का मार्ग है, इसे संप्रदाय कहते हैं चाहे वह जैन हो, बौद्ध हो, मुस्लिम हो, ईसाई हो। हमारी सबसे बड़ी गलती हो गई है कि हमने धर्म के मार्ग को ही मंजिल मान लिया है। संप्रदाय कोई बुरी बात नहीं है। पूर्व जन्मों के संस्कार के अनुसार किसी न किसी संप्रदाय में हम सब लोगों को जन्म हुआ है और उसी धर्म-संप्रदाय से हमको संस्कार मिलते हैं। यह पूर्व जन्मों के संस्कार से होता है। सर्वधर्म संप्रदाय कोई बुरी बात नहीं है लेकिन जब हमारे अंदर सांप्रदायिकता आती है, जो समाज के लिए अभिशाप है, तो समस्या है। हम धर्म के बारे में जानें। धर्म एक होता है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः भगवान महावीर ने धर्म के बारे में क्या कहा है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः भगवान महावीर ने कहा- अहिंसा परमोधर्म। अहिंसा से बढ़कर संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है। अहिंसा, सत्य, आचौर्य ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह को स्वीकार कर लिया तो धार्मिक होता है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः कौन धार्मिक नहीं है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः धार्मिक होने के लिए व्यक्ति को किसी धर्म-संप्रदाय में बंधना आवश्यक नहीं है। इंसान के अपने आंतरिक गुण को धर्म कहा है। आंतरिक गुण में क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष किसी भी धर्म-संप्रदाय के व्यक्ति में है तो वह अधर्म है। क्रोधी व्यक्ति धार्मिक हो नहीं सकता है। अभिमानी व्यक्ति किसी भी धर्म को धारण कर ले, धार्मिक हो नहीं सकता। जिसके अंदर कपट, छल, दोहरा चरित्र वाला व्यक्ति भी संसार में धार्मिक नहीं हो सकता। लोभ, अत्यधिक इच्छाएं ढोकर चलने वाला व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता। क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए क्षमा आवश्यक है, इस तरह क्षमा धर्म है। अहंकार पर विजय प्राप्त करने के लिए विनम्रता आवश्यक है, विनम्रता धर्म है। मायाचारी पर विजय प्राप्त करने के लिए जीवन में सरलता आनी चाहिए, सरलता धर्म है। कथनी-करनी में एकरूपता होता है तो सरलता आती है। निर्लोभी धार्मिक है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः धर्मात्मा और पापात्मा कौन होता है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः दया, करुणा, क्षमा, सहनशीलता, विनम्रता, सरलता, संतोष धर्म के पक्ष हैं। जिसमें ये गुण पाए जाते हैं, वह व्यक्ति धर्मात्मा है। जिसमें क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष है, वह व्यक्ति पापी होता है।

डॉ. भानु प्रताप सिंहः संसार का सबसे प्राचीन धर्म कौन सा है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः प्राचीन धर्म तो अहिंसा धर्म है। आप संप्रदाय के बारे में पूछ सकते हैं। धर्म तो शाश्वत है। पहले था, अब है और भविष्य में भी रहेगा। जब से मानव सभ्यता शुरू हुई है, तब से अहिंसा शुरू हुई है। कोई धर्म-संप्रदाय पुराना नहीं होता है। आप ये झगड़ा कराने वाला प्रश्न पूछ रहे हैं। पुराना धर्म होने से हम जीवन में श्रेष्ठ नहीं हो सकते। हमारे विचारों में अगर दया, करुण, क्षमा, विनम्रता, सहिष्णुता, प्रेम है तो वह धार्मिक होता है। संप्रदाय पुराना हो सकता है। नया संप्रदाय भी निकला तो पुराने में से है, इसलिए इसका इतिहास तब से है जब से पुराना था। एक मटका फूटता है तो उसके दोनों टुकड़ों में पहला टुकड़ा कौन सा है, यह कैसे बता सकते हैं। धर्म-संप्रदाय सारे ही पुराने हैं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः आपने अहिंसा की बात की, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी जायज है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः हिंसा धर्म है ही नहीं। मत जुल्म करो, मत जुल्म सहो। अगर तुमने जुल्म सहा तो वह अधर्म हो सकता है परन्तु धर्म तो वह चीज है, जिसमें आपको शांति और आनंद मिलता है। धर्म के नाम पर युद्ध करने वाले धर्म को समझते नहीं हैं। वे धर्म के नाम पर युद्ध करके अपने अंदर की वासनाओं, अहंकार, क्रोध को पूरा करते हैं। इसलिए कई भी व्यक्ति हिंसा करके धार्मिक नहीं हो सकता।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः महाराज जी, आपने जो धर्म के लक्षण बताए हैं, अगर उन्हें अपना लें तो सब जैन मुनि हो जाएंगे?
डॉ. मणिभद्र महाराजः जैन मुनि होने के लिए बहुत त्याग और तपस्या की आवश्यकता है। संसार में इंसान के रूप में हमने जन्म लिया है, हम सब अगर इंसान बन जाते हैं यही बहुत है। इंसानियत और मानवता से बड़ा संसार में कोई धर्म नहीं है। दया, करुणा, क्षमा, अहिंसा ये सब मनुष्य के गुण हैं। हम सब मनुष्य बन जाएं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः क्या मंदिर बनाना धर्म नहीं है?
डॉ. मणिभद्र महाराजः मंदिर बनाने के पीछे आपका लक्ष्य क्या है। पूजा के लिए आपके पास वक्त नहीं है लेकिन व्यक्ति के पास अर्थ है और वह सोचता है कि करोड़ों-अरबों का मंदिर बना दूँ। मंदिर के बाजू में अगर भिखारी बैठते हैं तो मंदिर किस काम का है। भिखारी के पेट में अगर अन्न डालते हैं तो उस मंदिर में जाकर पूजा करने से ज्यादा फल मिलेगा। आदमी समझता ही नहीं है, इसलिए मंदिर बनाए जा रहा है। मंदिर शांति प्राप्त करने का स्थान है। मंदिर में भरपूर पूजा-सेवा होनी चाहिए।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः महाराज जी, ऐसा कहा जा रहा है कि भारत में हिन्दू खतरे में हैं, आपका क्या कहना है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः जो हिन्दू को खतरे में बताते हैं, उनमें पूरी तरह से धर्म आया नहीं है। ऐसा कहने वालों को खतरा उसके अंदर की बुराइयों, अंदर की कमजोरियों से खतरा होता है। महात्मा गांधी अकेले चले थे और उन्होंने हिन्दुस्तान को आजादी दिला दी। अगर व्यक्ति औरों को सुधारने की अपेक्षा स्वयं को सुधार ले तो कहीं कोई खतरा नहीं हो सकता।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः लव जिहाद बड़े जोरों पर चल रहा है, आप क्या कहते हैं?

डॉ. मणिभद्र महाराजः ये तो सब चीजें चलती रहेंगी। इस विषय पर हम ज्यादा चर्चा न करें तो अच्छा है, देश और राष्ट्र की बातों में अपने धर्म और अध्यात्म पर ज्यादा विश्वास है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः जैन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण का नर्क में वास बताया गया है, क्यों?

डॉ. मणिभद्र महाराजः भगवान श्रीकृष्ण का तो हमारे जैन धर्म में 12वें तीर्थंकर होने का सौभाग्य मिलने वाला है। आठ दिन तक भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र पर बात करते हैं। नर्क और स्वर्ग का यहां कोई मूल्य नहीं होता है, यहां तो मोक्ष का मूल्य होता है। स्वर्ग में जाने वाला व्यक्ति यहां श्रेष्ठ नहीं माना जाता है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः क्या जैन धर्म सर्वेश्रष्ठ है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः धर्म सारे ही श्रेष्ठ हैं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः अगर धर्म सारे ही श्रेष्ठ हैं तो एक धर्म के अनुयायी मांस भक्षण करते हैं, क्या वे भी श्रेष्ठ हैं?

डॉ. मणिभद्र महाराजः मांस भक्षण तो पाप है। भगवान ने कहा है कि मांस भक्षण नर्क में जाने का मुख्य कारण है। हम मांसाहारी की निंदा नहीं करना चाहते हैं लेकिन समाज में शाकाहारी व्यक्ति को सम्मान मिलता है। शाकाहरी में दया और करुणा का जो भाव होता है, वह मांसाहारी में नहीं होता है। जितना अधिकार हमको जीने का है, उतना ही संसार के प्रत्येक प्राणी को अधिकार है। हम किसी भी प्राणी में प्राण नहीं डाल सकते हैं तो प्राण लेने का अधिकार कैसे है?

 

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः आपने नेपाल में बहुत काम किया है, वहां क्या स्थिति है धर्म की?

डॉ. मणिभद्र महाराजः हमारा जन्म ब्राह्मण कुल में नेपाल में हुआ। जन्म के समय हमने जैन धर्म का नाम भी नहीं सुना था। 14 वर्ष की आयु में हम उत्तर प्रदेश के मेरठ में आए। गुरुदेव का सानिध्य मिला और जैन धर्म स्वीकार किया। पूरे भारत में भ्रमण किया। फिर हमारी जन्मभूमि नेपाल में जाने की इच्छा हुई। मातृभाषा नेपाली होने के कारण वहां की जनता से मिलने की इच्छा हुई। नेपाली जनता से आत्मीयता मिली। जनता में हमने श्रद्धा देखी। वहां हम धर्म और अच्छे लोगों के निर्माण का काम कर रहे हैं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः वर्तमान समय में क्या जैन संतों को दिगम्बर रहना चाहिए?

डॉ. मणिभद्र महाराजः जिसकी शक्ति होगी, वह करेगा। साधना करना आसान नहीं होता है। जो व्यक्ति जैसा कार्य कर सकता है, उस कार्य को कर ले, तो उसका आदर करना चाहिए। हम इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः ऐसा कहा जाता है कि युवा धर्म से विमुख हो रहे हैं?
डॉ. मणिभद्र महाराजः ऐसा नहीं है। युवा वर्ग धर्म में आस्था रखे हुआ है। बड़े-बड़े सेवा के कार्य कर रहा है।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः आपने मानव मिलन संस्था बनाई है, इसका क्या उद्देश्य है?

डॉ. मणिभद्र महाराजः मानव मिलन, सभी धर्म-संप्रदायों के अच्छे व्यक्तियों का समूह है। एक छत के नीचे सामाजिक सेवा का कार्य करते हैं।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः महाराज जी, कोई आप पर हमला कर रहा है तो हमें क्या करना चाहिए?

डॉ. मणिभद्र महाराजः अपने आप को बचाने की कोशिश करें तो बचा सकते हैं। बचा नहीं सकते हैं तो आपको समर्पण करना पड़ेगा। मत जुल्म करो, मत जुल्म सहो। मन से सामने वाले व्यक्ति को क्षमा कर सकते हैं तो क्षमा करें।

 

डॉ. भानु प्रताप सिंहः कोई मारने आ रहा है तो क्या हमें भी नहीं मारना चाहिए?
डॉ. मणिभद्र महाराजः फिर आप में और उसमें कोई अंतर नहीं है। अगर आप भी मारते हैं तो ये मत सोचना कि सामने वाला व्यक्ति गलत है, जैसा वो है वैसे ही आप हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh

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