राधास्वामी मत के गुरु दादाजी महाराज ने चोला छोड़ा, दया के एक युग का अंत

राधास्वामी मत के गुरु दादाजी महाराज ने चोला छोड़ा, दया के एक युग का अंत

RELIGION/ CULTURE

1959 से राधास्वामी सत्संग की कमान संभाल रहे थे

दीन-दुखियों की मदद के लिए हजूरी भवन खुला रखा

आगरा विश्वविद्यालय के दो बार कुलपति रहे

कई पुस्तकों के लेखक, इतिहासवेत्ता के रूप में भी पहचान

अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर हजूरी भवन में रखा

27 जनवरी को अंतिम यात्रा मोक्षधाम ताजगंज जाएगी

Dr Bhanu Pratap Singh

आगरा। कहते हैं संत चमत्कार नहीं दिखाते हैं लेकिन यदि कोई अनायास ही आपकी असाध्य बीमारियों को ओझल कर दे, दुर्घटनाओं में जीवन रक्षक बनकर प्रकट हो जाए और आप कितने ही विचलित हो और उससे मिलते ही आपको राह मिल जाए, मन शांत और स्थिर हो जाए तो ऐसा व्यक्तित्व निःसंदेह ही साधारण मानव की श्रेणी से विलग हो असाधारण महामानव के रूप में स्थापित होने लगता है। ऐसा महामानव हजारों लाखों लोगों को चमत्कारिक रूप से उनकी विपदा, आपदा, अभाव, शोक और विषाद के क्षणों में संजीवनी औषधि सा प्रतीत होने लगे, जब उसकी यशोगाथा, शौर्य गाथा की पताका लिए समाज के मलिन, दलित, शिक्षित, अशिक्षित, साधारण कुल और कुलीन विचरण करने लगे तो वह व्यक्ति महामानव और दिव्य मानव जैसे विशेषण और अलंकारों से भरी व्यक्तियों की आस्था का केन्द्र बिंदु बन जाता है। फिर उसे सद्गुण और सत्तगुणों से परिपूर्ण मान अपने सतगुरु और संत के रूप में आराधना लगते हैं। ऐसे ही थे राधास्वामी मत के गुरु प्रो. अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज)। वे राधास्वामी मत के आदि केन्द्र हजूरी भवन, पीपल मंडी, आगरा में विराजते रहे और 23 जनवरी, 2023 को चोला छोड़ राधास्वामी में विलीन हो गए। दादाजी महाराज के चले जाने से दया के एक युग का अंत हो गया। वे 92 वर्ष के थे।

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*अंतिम यात्रा 27 को*

राधास्वामी मत के आदि केन्द्र हजूरी भवन से जानकारी दी गई है कि दादाजी महाराज का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए हजूरी भवन में रखा हुआ है। देश-विदेश के सतसंगी अपने गुरु के अंतिम दर्शन के लिए आगरा आ रहे हैं। दादाजी महाराज की अंतिम यात्रा 27 जनवरी, 2023 को प्रातः 10 बजे ताजगंज मोक्षधाम के लिए प्रस्थान करेगी।

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*27 जुलाई 1930 को जन्म हुआ*

हजूरी भवन राधास्वामी मत का आदि केन्द्र है। यहीं पर हजूर महाराज और उनके बाद के समस्त गुरु रहे। हजूर महाराज के आग्रह पर ही स्वामी जी महाराज ने जन्माष्टमी के दिन 1818 में राधास्वामी मत को जनकल्याण के लिए प्रकट किया था। दादाजी महाराज का जन्म 27 जुलाई, 1930 को हुआ। वे 1959 से राधास्वामी सत्संग की कमान संभाल रहे थे।

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कई बार पूरे देश का आध्यात्मिक भ्रमण किया

दादाजी महाराज को देश के सभी प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं। दादाजी महाराज ने राधास्वामी सतसंग में सुधार आंदोलन भी चलाया। इसके लिए पूरे देश का कई बार भ्रमण किया। सतसंगियों ने तब अपने गुरु की आध्यात्मिक शक्ति देखी। अनेक चमत्कार भी हुए। सतसंग में मातृशक्ति का सशक्तिकरण किया। हजूरी भवन की कायापलट की। हजूर महाराज की समाध दर्शनीय है। इस पर स्वर्णमंडित चित्रकारी है। दादाजी महाराज पर शोध करने वाले शोधार्थी ने लिखा है कि हजूरी भवन की पच्चीकारी ताजमहल से भी सुंदर है।

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*5000 पृष्ठों का अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित हुआ*

प्रो. अगम प्रसाद माथुर (Agam Prasad mathur) सुविख्यात अध्यात्मवेत्ताओं, परम संतों, एवं सामाजिक-धार्मिक सुधारकों के वंशज हैं। उनके पूर्वजों ने महान राधास्वामी  मत की स्थापना की, जिसके वे वर्तमान में आचार्य एवं अधिष्ठाता हैं और जिनके भारत और विदेशों में करोड़ों सतसंगी और अनुगामी हैं। उनके सतसंगी (अनुयायी) उनके प्रति अगाध प्रेम, सम्मान, अपार श्रद्धा और कृतज्ञता रखते हैं, जिसके प्रतीक रूप में उन्होंने लगभग 5000 पृष्ठों एवं चार खण्डों तथा उपखण्डों में अभिनन्दन ग्रन्थ श्रृंखला प्रकाशित करवाई।

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चार भाइयों में सबसे बड़े

राधास्वामी मत के चतुर्थ आचार्य कुंवर जी महाराज के पुत्र आनंद प्रसाद के चार पुत्र और चार पुत्रियां हुईं। ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज) का जन्म 27 जुलाई, 1930 को रात्रि 8.45 बजे हुआ। उनका जन्म हजूरी भवन के उसी कक्ष में हुआ, जहां उनके बाबा कुवंर जी महाराज और पिता आनंद प्रसाद का जन्म हुआ था। नाम रखा गया अगम। दूसरे पुत्र शब्द प्रसाद माथुर का जन्म 1932 में, तीसरे पुत्र स्वामी प्रसाद माथुर का जन्म 1935 में और चौथे पुत्र सरन प्रसाद का जन्म 1938 में हुआ।

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*हजूरी भवन को क्रांतिकारियों का शरण स्थल बनाया*

15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ तो अगम के आग्रह पर हजूरी भवन में तिरंगा फहराया गया और मिष्ठान्न वितरण हुआ। बालक के रूप में प्रो. माथुर ने हुजूरी भवन को क्रांतिकारियों के छिपने का स्थल बना दिया था। 1952 से 1982 तक आगरा कॉलेज में सेवाएं दीं। आगरा विश्वविद्यालय के लगातार दो बार कुलपति रहे- 1982 से 1985 तक तथा 1988 ई. से 1991 तक। इससे पहले 1976 से 1979 तक बीपी जौहरी कुलपति रहे, लेकिन इस दौरान अप्रत्यक्ष रूप से प्रो. अगम प्रसाद माथुर ही कुलपति थे। इस बात को स्वयं बीपी जौहरी ने स्वीकारा है। 1959 से प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर राधास्वामी सत्संग की कमान संभाल रहे थे।

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1980 में कराया ‘यादगार-ए-सुलह-ए-कुल’

प्रो. माथुर ने अपना शैक्षिक जीवन आगरा कालेज (आगरा विश्वविद्यालय) में इतिहास प्रवक्ता के रूप में सन् 1952 ई. में प्रारम्भ किया और वे सन् 1964 ई. में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हो गये। अपने शिक्षण कार्य में गुरुतर विशिष्टता और आकर्षण समेटे प्रो. माथुर शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा जगत के सुधी विद्वानों के मध्य प्रतिष्ठापित हो गये। इसी मध्य वर्ष सन् 1980 ई. में उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये अनूठा योगदान देते हुए आगरा किला और फतेहपुर सीकरी स्मारकों में ‘यादगार-ए-सुलह-ए-कुल’ नामक कार्यक्रम का आयोजन कराया और पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। उनकी इन्हीं शैक्षिक एवं प्रशासनिक विशिष्टताओं के कारण उ.प्र. सरकार ने उन्हें शैक्षिक जीवन के शीर्ष स्थान पर आगरा विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में दो पूर्ण कार्यकालों (सन् 1982 ई. से सन् 1985 ई. तक तथा सन् 1988 ई. से सन् 1991 ई. तक) के लिये नियुक्त किया। कुलपति के रूप में उन्होंने विश्वविद्यालय के शैक्षिक और अनुशासनात्मक रूप को अभूतपूर्व उत्कृष्टता पर पहुँचा दिया और चौबीस व्यवसायपरक पाठ्यक्रम प्रारम्भ करके विश्वविद्यालय को आवासीय विश्वविद्यालय में परिवर्तित कर दिया। इस अवधि में प्रो. माथुर ने अपनी मौलिक योजनाओं, विचारों और परिवर्तनों से शिक्षा जगत में अविस्मरणीय योगदान दिया।

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इतिहासकार, लेखक, कवि, भक्ति योग का अभूतपूर्व ज्ञान

प्रो. माथुर सर्वमान्य एवं सुविख्यात विद्वान एवं इतिहासकार थे। वे मध्यकालीन और आधुनिककालीन भारतीय इतिहास तथा यूरोपीय और ब्रिटिश इतिहास के विशेषज्ञ के सम्मानित अध्याय के रूप में उभरे। वे गम्भीर शोधार्थी एवं सजग लेखक थे। वे साहित्य सृजन की विविधोन्मुखी प्रतिभा के धनी हैं, जिन्होंने सार्वजनिक सभाओं, शैक्षिक अधिवेशनों, संगोष्ठियों तथा गोष्ठियों में अगणित भाषण दिये हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना तथा उनका सम्पादन किया। प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने विभिन्न ज्वलन्त एवं सामयिक विषयों पर उनके मौलिक एवं सारगर्भित विचारों को समय-समय पर प्रमुखता से प्रकाशित एवं प्रसारित किए हैं। उन्होंने 300 से भी अधिक आलेख, इतिहास और संस्कृति, अर्थशास्त्र, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी, जन कल्याण, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति, साहित्य, कला, संगीत, समाज के निर्बल वर्गों के उत्थान, नवीन शिक्षा नीति, राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय एकता और सुदृढ़ता, अन्तर्राष्ट्रीयता, स्थापत्य कला, सामाजिक अन्याय, महिला स्थिति, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या विस्फोट, आतंकवाद, खादी एवं स्वदेशी का महत्व, न्यायिक सक्रियता, धर्म और अध्यात्म, धर्मनिरपेक्षता, प्रेम, शान्ति, भ्रातृत्व, नैतिकता, आदि अनेक विषयों पर लिखे हैं जो मौलिक शोध पर आधारित हैं और स्तरीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

राधास्वामी मत के गुरु

प्रथम आचार्यः परम पुरुष पूरन धनी स्वामी जी महाराज (सेठ शिवदयाल सिंह)

द्वितीय आचार्यः परम पुरुष पूरन धनी हजूर महाराज (राय सालिगराम बहादुर)

तृतीय आचार्यः लालाजी महाराज (अजुध्या प्रसाद)

चतुर्थ आचार्यः कुंवर जी महाराज (गुरु प्रसाद)

पंचम आचार्यः दादाजी महाराज (प्रो. अगम प्रसाद माथुर)

 

Dr. Bhanu Pratap Singh