जनतंत्र में शिक्षा शास्त्र: लोकतंत्र के प्रहरी तैयार करने का ऐतिहासिक संकल्प, महादेव नारायण टंडन को श्रद्धांजलि

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Agra, Uttar Pradesh, India, Bharat.

आगरा के माथुर वैश्य सभागार, पचकुइयां में आज़ादी के सिपाही, मार्क्सवादी विचारक और शोषितों के मसीहा महादेव नारायण टंडन की 23वीं पुण्यतिथि पर भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित हुआ। डॉ. जी. यू. कुरैशी (पूर्व प्राचार्य एस.एन. मेडिकल कॉलेज), प्रो. अपूर्वानंद, कामरेड पूरन सिंह और भावना जितेंद्र रघुवंशी ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

परम्परागत व्याख्यानमाला का उद्घाटन

इस वर्ष का विषय रहा ‘जनतंत्र में शिक्षा शास्त्र’ जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए शिक्षा की भूमिका पर केंद्रित था। परम्परागत रूप से आयोजित इस व्याख्यान क्रम में उपस्थित जनों का स्वागत करते हुए डॉ. जे. एन. टंडन ने विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने कहा, “जनतंत्र में शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं, विवेक का विकास भी है“।

मंचासीन अतिथि।

डॉ. टंडन का मौलिक दृष्टिकोण

डॉ. जे. एन. टंडन ने स्पष्ट किया कि शिक्षा असहमति सहने की क्षमता, विविधता अपनाने की संस्कृति और संविधान के मूल्यों की समझ प्रदान करती है। उनके शब्दों में, “जब शिक्षा स्वतंत्र, समावेशी और नैतिक होगी तभी जनतंत्र सशक्त, सजग और स्थायी होगा“। यह कथन पूरे कार्यक्रम का मूल मंत्र बन गया।

प्रो.अपूर्वानंद का प्रखर व्याख्यान

मुख्य अतिथि वक्ता प्रो. अपूर्वानंद ने अपने प्रेरक वक्तव्य में कहा कि शिक्षा केवल पढ़ाई की तकनीक नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक-राजनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण है। इसका उद्देश्य केवल रोजगार दिलाना नहीं, अपितु जागरूक नागरिक तैयार करना है जो समाज को समझकर सवाल उठाएं और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करें।

विषय प्रवर्तन करते हुए डॉक्टर जेएन टंडन

रटंतवाद पर कड़ा प्रहार

प्रो. अपूर्वानंद ने रटने वाली शिक्षा की कटु आलोचना करते हुए कहा कि इससे शिक्षा का पतन ही होता है। उन्होंने भाषा के महत्व पर बल देते हुए कहा कि छात्रों को अपनी भाषा में सोचने और अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। “वहीं ज्ञान को सच में आत्मसात कर सकेंगे“, यह उनका दृढ़ मत था।

शिक्षा तटस्थ नहीं होती

विद्वान वक्ता ने चेतावनी दी कि शिक्षा तटस्थ नहीं होती। पाठ्यक्रम, किताबें और पढ़ाने का तरीका सब किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित रहते हैं। इसलिए जरूरी है देखना कि “क्या पढ़ाया जा रहा है और क्यों पढ़ाया जा रहा है“। शिक्षा सामाजिक न्याय का सशक्त साधन है।

संबोधित कर रहे हैं हरीश सक्सेना चिमटी
शिक्षक की नई भूमिका

प्रो. अपूर्वानंद के अनुसार शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं, मार्गदर्शक, मेंटर और संवादकर्ता होना चाहिए। छात्रों के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत करनी चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो जाति, धर्म, लिंग भेदभाव को कम करे

सम्मान समारोह

महादेव नारायण टंडन के अनुज पुत्र, आईएएस ब्रिजेंद्र नारायण टंडन ने प्रो. अपूर्वानंद को स्मृति भेंट प्रदान की। कामरेड पूरन सिंह ने आभार प्रदर्शन किया। कुशल संचालन हरीश चिमटी ने किया।

समझ में उपस्थित श्रोतागण।
दुर्लभ दस्तावेज का प्रदर्शन

दिल्ली से पधारे बलराम शर्मा की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उनके पास कामरेड टंडन द्वारा लिए गए महात्मा गांधी के दुर्लभ इंटरव्यू की हिंदी-अंग्रेजी प्रति आज भी सुरक्षित है।

प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित

रामनाथ गौतम, दिलीप रघुवंशी, डॉ. वी आर सेंगर, डॉ. राकेश भाटिया, डॉ. अजय कालरा, डॉ. अशोक शर्मा, डॉ. नसरीन बेगम, डॉ. अनुपमा शर्मा, डॉ. संजय चतुर्वेदी सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

समझ में उपस्थित श्रोतागण
संपादकीय: शिक्षा से सशक्त बनेगा असली लोकतंत्र

आज शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य वही रहना चाहिए—जिम्मेदार नागरिक तैयार करनामहादेव नारायण टंडन जैसे महान विचारकों की पुण्यतिथि पर आयोजित यह व्याख्यानमाला एक बार फिर याद दिलाती है कि लोकतंत्र की असली जड़ें शिक्षा में ही निहित हैं।

प्रो. अपूर्वानंद और डॉ. जे. एन. टंडन जैसे समर्थ विद्वानों के विचार केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहारिक आवश्यकता हैं। जब वे कहते हैं कि शिक्षा विवेक का विकास करे, असहमति सिखाए, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करे—यह लोकतंत्र बचाने का सबसे बड़ा हथियार है।

रटंतवाद ने शिक्षा को व्यापार बना दिया है। विचारधारा प्रधान पाठ्यक्रम ने इसका और विनाश किया। अब समय है शिक्षा शास्त्र को पुनर्जनन देना। मातृभाषा में सोचने, सवाल उठाने, संवाद करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

शिक्षक को फिर से मेंटर बनना होगा, जो जाति-धर्म भेदभाव मिटाए। अन्यथा लोकतंत्र नाम का ढांचा खोखला हो जाएगा। आगरा का यह आयोजन पूरे देश के लिए प्रेरणा है। आइए महादेव नारायण टंडन के स्वप्न को साकार करें।

लोकतंत्र की सच्ची शक्ति शिक्षित नागरिकों में है। इस संकल्प को अपनाएं, इसे जीवन में उतारें।

डॉ. भानु प्रताप सिंह
संपादक

 

Dr. Bhanu Pratap Singh