गोमती का अस्तित्व खतरे में! सीवेज, गाद और कंक्रीट के तटबंधों ने नदी की सांसें थामीं, पर्यावरणविदों ने दी चेतावनी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की ‘जीवनरेखा’ कही जाने वाली गोमती नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत का पर्याय रही यह नदी आज प्रदूषण, सिकुड़ती धारा और अवैध अतिक्रमण की त्रिमूर्ति के सामने दम तोड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, तो यह पारिस्थितिक तंत्र के लिए अपूरणीय क्षति होगी।

नदी की बदहाली को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने ‘गुम होती गोमती’ की व्यथा-कथा बताते हुए सरकार की भ्रष्ट नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। अखिलेश यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि नदी संरक्षण के नाम पर केवल दावे किए जा रहे हैं, जबकि धरातल पर स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है।

अखिलेश यादव ने एक्स पोस्ट पर एक न्यूज पोर्टल का वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि भाजपा की भ्रष्ट नीतियों की वजह से ‘गुम होती गोमती’ की व्यथा-कथा। इसी वीडियो कहा जा रहा है कि राजधानी की करीब 20 लाख जनता सहित नदी में रहने वाले जीवों के अस्तित्व पर बड़ा संकट मड़रा रहा है।

पर्यावरणविदों की चिंता: सीवेज और कंक्रीट का जाल

विशेषज्ञों का कहना है कि गोमती नदी के प्राकृतिक जलस्रोतों और सहायक नालों के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। कई स्थानों पर नदी का जलस्तर चिंताजनक रूप से घटा है, जिससे जलीय जीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

विपक्ष का आरोप है कि नदी पुनर्जीवन और सफाई के लिए आवंटित धन का अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी और पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति गंभीरता के अभाव ने गोमती को संकट में डाल दिया है।

हालांकि, सरकार का कहना है कि गोमती के संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए अनेक परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं और नदी के पुनर्जीवन के प्रयास जारी हैं। गोमती का सवाल केवल एक नदी का नहीं, बल्कि पर्यावरण, जल सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है। इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर वैज्ञानिक और पारदर्शी प्रयासों के जरिए बचाने की आवश्यकता है।

गोमती नदी सफाई एवं पुनर्जीवन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद गंभीर पारिस्थितिक संकट में है। प्रदूषण का स्तर चिंता का विषय बना हुआ है, जलीय जैव विविधता घट रही है, और तीव्र शहरीकरण उस नदी पर नया दबाव डाल रहा है जो शहर के लिए कच्चे पानी का प्राथमिक स्रोत है।

लखनऊ शहर के बीचों बीच बहने वाली गोमती नदी लाखों लोगों को पीने का पानी मुहैया कराती है, भूमिगत जल भंडारों को फिर से भरती है और एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करती है जो इसके किनारों से बहुत दूर तक फैला हुआ है। एक स्वस्थ नदी जलभंडारों को पुनर्जीवित करने, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने और मछलियों, पक्षियों, सरीसृपों और सूक्ष्म जीवों के लिए आवास प्रदान करने में सहायक होती है, जो सामूहिक रूप से पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं। जलवायु परिवर्तन के तीव्र होने और शहरी केंद्रों के बढ़ते तापमान और जल संकट से जूझने के साथ, गोमती जैसी नदियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बीबीएयू के पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता ने कहा कि गोमती नदी को बचाने की दिशा में पहला कदम नगरपालिका के सीवेज का 100 फीसदी उपचार सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि लखनऊ के लगभग आधे सीवेज का उपचार किए बिना ही नदी में प्रवेश हो जाता है। मौजूदा सीवेज संयंत्रों का उचित रखरखाव किए बिना केवल नए सीवेज संयंत्र बनाने से ही काम नहीं चलेगा।

उन्होंने कहा कि नदी के दोनों किनारों पर बने तटबंधों, सड़कों और पुलों ने नदी को सांस लेने के लिए बहुत कम जगह छोड़ी है। सीमेंट से बने तटबंध भूजल पुनर्भरण को बाधित करते हैं, जबकि नदी तल पर जमी गाद की मोटी परत प्राकृतिक पुनर्भरण को रोकती है। उन्होंने आगे कहा कि गोमती बैराज की चल रही मरम्मत का काम जमा हुए कीचड़ को हटाने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।

हजारों करोड़ के खर्च का क्या हुआ असर?

पिछले दो दशकों में, सरकारों ने नदी से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं में भारी निवेश किया है, जिसका अनुमान 2,500 करोड़ रुपये से अधिक है। इसका उद्देश्य था कि नदी में बिना उपचारित मल-मूत्र को जाने से रोकना, जल की गुणवत्ता में सुधार करना और गोमती नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को बहाल करना, लेकिन नदी को अपेक्षित पुनर्जीवन प्राप्त नहीं हो सका।

जहां अधिकारी बुनियादी ढांचे और सीवेज उपचार क्षमता में सुधार की ओर इशारा करते हैं, वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि पारिस्थितिक संकेतक एक अधिक जटिल कहानी बयां करते हैं। हालिया मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि लखनऊ से गुजरते समय नदी के जल की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आती है। यह गिरावट मुख्य रूप से सीवेज के निर्वहन, पारिस्थितिक प्रवाह में कमी और बढ़ते शहरी दबाव से जुड़ी है।

उपचार सुविधाओं के विस्तार के बावजूद, शहर द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट जल की एक महत्वपूर्ण मात्रा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदी प्रणाली में प्रवेश करती रहती है। एक वरिष्ठ पर्यावरण योजनाकार ने कहा कि चुनौती यह है कि शहर की वृद्धि अक्सर पर्यावरणीय बुनियादी ढांचे के विस्तार से कहीं अधिक रही है।

जलीय जीवन के विलुप्त होने का खतरा

प्रदूषण का प्रभाव संभवतः नदी की बदलती पारिस्थितिकी में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। किसी नदी के स्वस्थ रहने के लिए उसमें जलीय जीवन का होना आवश्यक है। मछलियां, प्लवक, जलीय पौधे और सूक्ष्मजीव एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं जो नदी को प्राकृतिक रूप से स्वयं को साफ करने और जैव विविधता को बनाए रखने में सक्षम बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है। देशी मछलियों की आबादी में गिरावट आई है, और वर्षों से नदी के शहरी क्षेत्रों में तो ये लगभग विलुप्त होने की कगार पर हैं। मछलियों का लुप्त होना केवल जैव विविधता का मुद्दा नहीं है। मछलियों की आबादी में गिरावट अक्सर कम घुलनशील ऑक्सीजन स्तर, प्रदूषण और पर्यावास क्षरण जैसी गहरी पर्यावरणीय समस्याओं का संकेत देती है।

जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाला सुधार सीमित

लखनऊ में गोमती की प्रमुख सहायक नदियों में से एक कुकरैल नदी पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, ताकि मुख्य नदी में प्रवेश करने वाले प्रदूषण को कम किया जा सके। पिछले कुछ वर्षों में, कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें सीवेज ले जाने वाली नालियों को रोकना, अपशिष्ट जल को उपचार संयंत्रों की ओर मोड़ना, तालाबों और आर्द्रभूमि का पुनरुद्धार करना और नदी में पारिस्थितिक प्रवाह को बहाल करने की योजना शामिल है।

इन पहलों के बावजूद, पर्यावरणविदों का कहना है कि जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाला सुधार सीमित ही है। कुकरैल नदी के बड़े हिस्से में प्रदूषण और अतिक्रमण का दबाव बना हुआ है, जिससे यह चिंता बढ़ रही है कि जब तक सहायक नदियों का प्रभावी ढंग से जीर्णोद्धार नहीं किया जाता, गोमती नदी को पुनर्जीवित करने के प्रयास अपने अपेक्षित प्रभाव को प्राप्त करने में विफल हो सकते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अस्वस्थ गोमती नदी के परिणाम नदी तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इससे कहीं अधिक व्यापक होंगे।

साभार सहित

Dr. Bhanu Pratap Singh