लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पुलिसिया कार्यप्रणाली और एफआईआर (FIR) दर्ज करने की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब प्रदेश में दहेज उत्पीड़न, चेक बाउंस, घरेलू हिंसा और मानहानि जैसे मामलों में पीड़ित सीधे थाने जाकर मुकदमा दर्ज नहीं करा सकेंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद डीजीपी राजीव कृष्ण ने एक नया सर्कुलर जारी किया है, जिसके तहत इन मामलों में पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष ‘परिवाद’ (Complaint Case) दाखिल करना अनिवार्य होगा।
अवैध मानी जाएगी सीधे दर्ज की गई FIR
डीजीपी की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि जिन मामलों में कानून के तहत कोर्ट सीधे संज्ञान लेता है, उनमें पुलिस द्वारा सीधे एफआईआर दर्ज करना न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इसे ‘अवैध’ माना जाएगा। अब थाना प्रभारियों और विवेचकों (Investigating Officers) को यह सुनिश्चित करना होगा कि मामला कहीं परिवाद की श्रेणी में तो नहीं आता।
इन मामलों में पुलिस नहीं करेगी सीधे कार्रवाई
सर्कुलर के अनुसार, लंबी सूची तैयार की गई है जिनमें पुलिस अब सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी। प्रमुख मामलों में शामिल हैं:
पारिवारिक व व्यक्तिगत विवाद: दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, विवाह से जुड़े विवाद, स्त्रीधन और मानहानि।
आर्थिक व व्यापारिक मामले: चेक बाउंस, कॉपीराइट या ट्रेडमार्क उल्लंघन और सिविल नेचर के विवाद।
अन्य अपराध: पशु क्रूरता, भ्रूण हत्या, पर्यावरण व प्रदूषण से जुड़े मामले।
मामूली विवाद: हल्की मारपीट, गाली-गलौज, धमकी, किरायेदारी और छोटे स्तर पर संपत्ति का नुकसान।
इन सभी मामलों में पीड़ित को पहले कोर्ट में शिकायत करनी होगी। यदि मजिस्ट्रेट उचित समझते हैं और आदेश देते हैं, तभी पुलिस आगे की कार्रवाई या एफआईआर दर्ज कर सकेगी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी बनी आधार
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि पुलिस अक्सर नियमों के विपरीत जाकर उन मामलों में भी एफआईआर दर्ज कर लेती है जो कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आते हैं। इससे कानूनी प्रक्रिया कमजोर होती है और आरोपियों को तकनीकी आधार पर कोर्ट में फायदा मिल जाता है। इसी विसंगति को दूर करने के लिए डीजीपी ने पुलिसकर्मियों को कानून का गहराई से अध्ययन करने और निर्देशों का कड़ाई से पालन करने को कहा है।
लापरवाही पर गिरेगी गाज
राजीव कृष्ण ने चेतावनी दी है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी इन निर्देशों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि दहेज निषेध अधिनियम और अन्य धाराओं के तहत कानून की कठोरता बरकरार है, लेकिन अब प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाया गया है।
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