बसंत पंचमी और राधास्वामी मत का गहरा नाता: 1861 के ‘सत्संग आम’ से लेकर DEI की स्थापना तक, जानें दयालबाग के बसंत का गौरवशाली इतिहास

RELIGION/ CULTURE

आगरा। ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ ही दयालबाग पूरे बसंतोत्सव के रंग में रंग गया। हर गली, हर प्रांगण और हर मन में उल्लास की झलक साफ दिखाई दी। सौर ऊर्जा से सुसज्जित विद्युत झालरों से दयालबाग की इमारतें और सत्संग कॉलोनियां दिव्य आभा से जगमगा उठीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर चेहरे पर बसंत का उत्साह नजर आया।

राधास्वाआमी मत के अनुयायियों ने बसंत पंचमी को श्रद्धा, स्वच्छता और संयम के साथ मनाते हुए इसे सिर्फ मौसम का उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और सामूहिक आनंद का पर्व बना दिया।

बसंत का संदेश: प्रकृति, मन और चेतना में नवजीवन

शीत ऋतु के विदा होते ही बसंत की दस्तक प्रकृति के साथ-साथ मन और चेतना में भी नई ऊर्जा भर देती है। दयालबाग में बसंत को केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्संग, साधना और संस्कृति के जीवंत उत्सव के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि यह पर्व मानव ही नहीं, पशु-पक्षियों तक में आनंद और उत्साह का संचार करता है।

दयालबाग में बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व

दयालबाग, आगरा शहर में स्थित राधास्वाआमी मत का मुख्यालय है। यहां बसंत पंचमी का दिन सत्संगियों के लिए अत्यंत पावन और ऐतिहासिक माना जाता है। इसी शुभ तिथि 15 फरवरी 1861 को मत के प्रथम आचार्य परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामी जी महाराज ने जगत उद्धार का संदेश प्रगट कर सत्संग आम का शुभारंभ किया था। यही कारण है कि दयालबाग में बसंत पंचमी महाआनंद और आध्यात्मिक उल्लास का पर्व बन गई है।

शहतूत के पौधे से जुड़ा एक और ऐतिहासिक अध्याय

बसंत पंचमी के अवसर से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण स्मृति भी दयालबाग में जीवंत है। राधास्वाआमी मत के पांचवें आचार्य सर साहबजी महाराज ने 20 जनवरी 1915 को दयालबाग में मुख्यालय स्थापित करने के उद्देश्य से शहतूत का पौधा रोपित किया था। यह पौधा आगे चलकर दयालबाग की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नींव का प्रतीक बन गया।

शिक्षा और संस्कृति को जीवन-दृष्टि के रूप में विकसित किया

दयालबाग में शिक्षा को सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे जीवन की तर्ज-ए-जिंदगी के रूप में विकसित किया गया। 1 जनवरी 1916 को मिडिल स्कूल के रूप में शुरू हुआ राधास्वाआमी एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (आरईआई) आज दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (डीईआई) के रूप में एक विशाल संस्थान बन चुका है। इसका प्रभाव देश ही नहीं, विदेशों तक फैल चुका है।

बसंत पंचमी से शुरू होता है राधास्वामी संवत का नववर्ष

राधास्वाआमी मत में बसंत पंचमी से राधास्वामी संवत का नववर्ष प्रारंभ माना जाता है। इस दिन सत्संगी प्रेम और श्रद्धा भाव से हुजूर राधास्वाआमी दयाल का गुणगान करते हैं।

बसंत के स्वागत की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। घरों, गलियों और मोहल्लों की सफाई और सजावट में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी जुट जाते हैं। इन सामूहिक प्रयासों से दयालबाग की छटा बसंत के दिन विशेष रूप से अद्भुत हो जाती है।

पर्यावरण-संवेदनशील बसंतोत्सव, दीये नहीं सौर ऊर्जा की सजावट

दयालबाग में बसंतोत्सव को पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी विशेष रूप से मनाया जाता है। रात्रि के समय दयालबाग सहित देश-विदेश की सत्संग कॉलोनियों में भव्य विद्युत सज्जा की जाती है, लेकिन इसमें मोमबत्ती या दीयों का प्रयोग नहीं होता। सजावट के लिए सौर ऊर्जा से संचालित बल्बों का उपयोग किया जाता है, जो पर्यावरण के प्रति दयालबाग की जागरूकता और जिम्मेदारी को दर्शाता है।

भक्ति, स्वच्छता और संयम का संदेश

दयालबाग का बसंतोत्सव दिखावे का नहीं, बल्कि आंतरिक आनंद, सेवा, कृतज्ञता और संयम का पर्व है। सत्संगी इसे आरती, पूजा, अभ्यास और सेवा के माध्यम से मनाते हैं और अपने गुरु महाराज के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं। यही भाव इस उत्सव को एक आध्यात्मिक अनुभव बना देता है।

Dr. Bhanu Pratap Singh