स्वदेशी का अर्थ है- ‘अपने देश का‘ अथवा ‘अपने देश में निर्मित’। वृहद अर्थ में किसी भौगोलिक क्षेत्र में जन्मी, निर्मित वस्तुओं, नीतियों, धर्म, विचारों को स्वदेशी कहते हैं। महात्मा गांधी के भारत में आने से पहले स्वदेशी जागरण एक सफल आंदोलन था। यह 1905 में स्वदेशी आंदोलन का जन जागरण करके अपने देश के लोगों को स्वदेशी होने का एक मंत्र दिया था जो वर्ष 1911 तक चला। अरविंद घोष, रविंद्रनाथ ठाकुर, विनायक दामोदर सावरकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आंदोलन के मुख उद्घघोषक थे। आगे चलकर यही स्वदेशी आंदोलन महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य बिंदु बन गया। उन्होंने इसे स्वराज की आत्मा कहा।
देशप्रेम की भावना से वशीभूत होकर सामान्य से दिखने वाले बाबू गेनू सैद ने स्वदेशी आंदोलन में बहुत बड़ा काम कर दिया था। गेनू बाबू का जन्म 1960 में पुणे जिले के ग्राम महालुंगे पदवाल में हुआ था। आपके गांव के पास ही कुल गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था। गेनु बाबू बचपन में बहुत आलसी बालक थे। देर तक सोना, दिनभर खेलना, पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी। दुर्भाग्यवश पिता शीघ्र चले गए। उसके बाद बड़े भाई भीम उनके संरक्षक बन गए। वह सब आपसे बहुत कठोर थे। गेनु भाई अपने भाई की डांट से बचने के लिए मुंबई में एक कपड़ा मिल में नौकरी कर ली जहाँ उनकी मां भी काम करती थी। उन्हीं दिनों देश में स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन जोरों पर था। 22 वर्षीय बाबू गेनू भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे। अपने साथियों को एक-एक करके वह स्वदेशी का महत्व बताया करते थे। 26 जनवरी. 1930 को संपूर्ण स्वराज्य मांग आंदोलन में बाबू गेनू की सक्रियता देखकर उन्हें तीन महीने के लिए जेल भेज दिया गया पर इससे बाबू के मन की स्वतंत्रता प्राप्ति की चाह और तीव्र हो गई।
12 दिसंबर, 1930 को मिल मलिक मैनचेस्टर से आए कपड़ों को मुंबई शहर में भेजने वाले थे, जब बाबू गेनू को यह पता चला उनका मन विचलित हो उठा। उन्होंने अपने साथियों के साथ हर कीमत पर उसका विरोध करने का निश्चय किया। 11:00 बजे मिल के द्वार पर आ गए। धीरे-धीरे पूरे शहर में यह खबर फैल गई। हजारों लोग एकत्रित हो गए। पुलिस भी आ गई। कुछ ही देर में विदेशी कपड़ों से लदा ट्रक बाहर आया। उसे सशस्त्र पुलिस ने घेर रखा था| बाबू गेनू के संकेत पर एक साथी ट्रक के आगे लेट गया। इससे ट्रक आगे न बढ़ सका। जनता ने वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे लगाए। पुलिस ने उन्हें घसीट कर हटा दिया पर उनके हटते ही दूसरा कर्मचारी वहां लेट गया। बहुत देर तक यह क्रम चलता रहा। यह देखकर अंग्रेज सैनिक ने चिल्लाकर आंदोलनकारियों पर ट्रक चढ़ाने को कहा पर भारतीय चालक इसके लिए तैयार नहीं हुआ| इस पर पुलिस सार्जेंट ने उसे हटाकर उसके स्थान पर बैठ गया। यह देखकर बाबू गेनू भाई खुद ट्रक के आगे लेट गए। सार्जेंट की आंखों में खून उतर आया। उसने ट्रक चालू कर दिया। बाबू गेनू को ट्रक ने कुचल दिया। सड़क पर खून ही खून फैल गया। इस प्रकार स्वदेशी के लिए बलिदान देने वाले की माला में पहला नाम लिखा कर बाबू गेनू ने स्वयं को ना केवल अमर कर दिया बल्कि स्वदेशी विचार के लिए प्रेरित कर दिया।
हम सभी भारतीयों को बाबू गेनू भाई का बलिदान याद रखना चाहिए। स्वदेशी वस्तु अपना कर अपने देश को स्वदेशी विचारधारा और आर्थिक उन्नति करने के लिए बाबू गेनू को याद किया जाता है। हमें स्वदेशी अपनाने का प्रण लेना चाहिए। कारण साफ़ है विदेशी वस्तुओं और कंपनियों का सामान खरीद कर आप धीरे-धीरे अपने देश का पैसा बाहर भेज रहे हैं और भारत में गरीबी को बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही वर्तमान स्थिति में हम लोग आज भी दिखावे के लिए विदेशी ब्रांड के ग़ुलाम हैं जिस कारण एक बार फिर भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी कम्पनियों की गुलाम बन जायेगी। इससे बचने का एक मात्र उपाय है “स्वदेशी प्रचार”। अपने जीवन में जितना सम्भव हो सके स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग कीजिये।
राजीव गुप्ता जनस्नेही
लोक स्वर आगरा
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