आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर देश के पांच प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में सियासी हलचल तेज हो गई है। हालिया जानकारी के अनुसार, इन राज्यों में चुनाव समय से पहले, यानी इसी साल नवंबर या दिसंबर के महीनों में संपन्न कराए जा सकते हैं। इस संभावित बदलाव के पीछे का मुख्य कारण अगले साल फरवरी में प्रस्तावित ‘जनगणना’ का दूसरा चरण है।
चुनाव और जनगणना का टकराव
इन पांच राज्यों में वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल फरवरी-मार्च के आसपास समाप्त हो रहा है, जिसके चलते चुनाव इसी समय सीमा के भीतर प्रस्तावित हैं। हालांकि, फरवरी 2027 में जनगणना का दूसरा चरण 9 से 28 फरवरी तक निर्धारित है। इस कार्य में सरकारी कर्मचारियों और तंत्र की भारी व्यस्तता को देखते हुए, चुनाव आयोग और सरकार के लिए एक साथ दोनों कार्यों का प्रबंधन करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इसी बाधा को टालने के लिए अब चुनावों को नवंबर-दिसंबर में कराने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
मतदाता सूची की प्रक्रिया और तैयारी
जानकारों का मानना है कि यदि नवंबर-दिसंबर में चुनाव कराए जाते हैं, तो मतदाता सूची किसी भी प्रकार की बाधा नहीं बनेगी। इन राज्यों में एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया पहले ही अंतिम चरण में है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यदि आवश्यकता पड़ी तो जनवरी में तैयार होने वाली अंतिम मतदाता सूची को तीन महीने पहले ही फाइनल किया जा सकता है, ताकि चुनावी प्रक्रिया में कोई कानूनी अड़चन न आए। भाजपा आलाकमान ने भी स्थिति को भांपते हुए अपनी सभी राज्य इकाइयों को अलर्ट कर दिया है और चुनावी तैयारियों को युद्धस्तर पर शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं।
विपक्ष की बढ़ती सक्रियता और गठबंधन का गणित
चुनावों की आहट सुनते ही विपक्षी दलों ने भी अपनी कमर कस ली है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में विशेष रूप से सरगर्मी बढ़ गई है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लगातार प्रदेश के विभिन्न जिलों का तूफानी दौरा कर रहे हैं और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ चुनावी रणनीति पर गहन मंथन कर रहे हैं। वहीं, विपक्षी खेमे में गठबंधन की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस एक साथ मिलकर भाजपा को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।
दूसरी ओर, अन्य राज्यों में भी विपक्षी दलों के नेता रणनीतिक बैठकें कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि यदि चुनाव नवंबर-दिसंबर में होते हैं, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा होगा। अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में मतदाता नई सरकार चुनने के लिए साल के अंत तक मतदान केंद्र पहुंचेंगे।
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