आगरा: सात समंदर पार अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच गहराता तनाव अब ताजनगरी की गरीब बस्तियों और रसोइयों तक पहुँच गया है। वैश्विक स्तर पर उपजे ऊर्जा संकट ने न केवल एलपीजी (LPG) की कीमतों में आग लगा दी है, बल्कि इसकी किल्लत ने उन मानवीय पहलों की कमर तोड़ दी है जो जरूरतमंदों का पेट भरती थीं। आगरा का ‘एसओएस (SOS) भोजनालय’ आज इस वैश्विक मंदी और युद्ध की विभीषिका की सबसे बड़ी ‘केस स्टडी’ बनकर उभरा है।
₹10 वाली थाली और ‘स्पॉन्सरशिप’ का टूटता गणित
एसओएस भोजनालय का संचालन एक नेक मकसद से शुरू हुआ था—गरीबों को मात्र 10 रुपये में भरपेट भोजन उपलब्ध कराना। एक थाली की वास्तविक लागत करीब 20 रुपये आती है, जिसे स्पॉन्सर्स के सहयोग से आधा करके परोसा जाता है। प्रतिदिन 100 थालियों के लिए महीने भर में करीब 30,000 रुपये की जरूरत होती है। लेकिन गैस की बढ़ती कीमतों और घटती आपूर्ति ने इस सामाजिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
मातादीन का संघर्ष: जब चूल्हा जलना भी हुआ दूभर
भोजनालय के रसोइया मातादीन की कहानी इस संकट की कड़वी हकीकत बयां करती है। हाल ही में गैस की किल्लत के चलते मातादीन को पूरा दिन एक अदद सिलेंडर के लिए कतारों में भटकना पड़ा। भारी सिलेंडर ढोने की मशक्कत और घंटों के इंतजार के बाद भी जब गैस नहीं मिली, तो उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि उस दिन भोजनालय बंद रहा, सैकड़ों लोग भूखे रहे और मातादीन को अपनी दिहाड़ी से भी हाथ धोना पड़ा।
धर्मसंकट: कीमत बढ़ाएं या सेवा जारी रखें?
भोजनालय प्रबंधन के सामने अब एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा है। क्या थाली की कीमत 10 रुपये से बढ़ाकर जरूरतमंदों पर बोझ डाला जाए, या फिर अतिरिक्त आर्थिक भार स्पॉन्सर्स पर छोड़ दिया जाए? दोनों ही रास्ते कांटों भरे हैं, क्योंकि बढ़ती महंगाई के बीच स्पॉन्सरशिप जुटाना भी अब चुनौती बनता जा रहा है।
शास्त्री जी के ‘त्याग’ से प्रेरणा की जरूरत
व्यवहार विज्ञानी और इस भोजनालय के सूत्रधार डॉ. नवीन गुप्ता का कहना है कि आज हमें पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के उस आह्वान को याद करने की जरूरत है, जिन्होंने युद्धकाल में देश से एक वक्त का भोजन छोड़ने की अपील की थी। डॉ. गुप्ता के अनुसार, “वैश्विक संकट के इस दौर में अनावश्यक दावतों से बचना और गैस की खपत कम करना ही इस लड़ाई में हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा।”
एसओएस भोजनालय की यह स्थिति महज एक उदाहरण है कि कैसे हजारों मील दूर होने वाले युद्ध हमारे पड़ोस की थाली से निवाला छीन लेते हैं। अब देखना यह है कि समाज इस संकट की घड़ी में अपनी जिम्मेदारी कैसे निभाता है।
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