आगरा नगर निगम: ‘अफ़सरशाही’ बनाम ‘जनप्रतिनिधि’ या रणनीतिक चूक? मेयर और नगर आयुक्त के टकराव की पूरी इनसाइड स्टोरी

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आगरा: ताजनगरी के नगर निगम सदन में 23 मार्च को जो कुछ हुआ, उसने शहर की राजनीति में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है जहाँ नियम, प्रक्रियाएं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं आपस में टकराती नजर आ रही हैं। नगर आयुक्त के खिलाफ पारित ‘निंदा प्रस्ताव’ को मेयर भले ही अपनी जीत और अफ़सरशाही की हार बता रही हों, लेकिन घटनाक्रम की कड़ियां कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।

विवाद की जड़: 13 मार्च का ‘अनउत्तरित’ पत्र

​पूरे विवाद की पटकथा 9 मार्च को लिखी गई जब मेयर ने सदन बुलाने का पत्र लिखा। इसके जवाब में 13 मार्च को नगर आयुक्त ने 2022 के शासनादेश का हवाला देते हुए कुछ बुनियादी सवाल पूछे:

​सत्र की अनिवार्यता: लोकसभा/विधानसभा सत्र के दौरान बैठक तभी हो सकती है जब सदन 3 दिन के लिए स्थगित हो।

​सदस्यों की उपस्थिति: सांसद और विधायक भी सदन के सदस्य हैं, उनकी अनुपस्थिति में बैठक की वैधानिकता क्या होगी?

हैरानी की बात यह है कि 13 मार्च से 23 मार्च तक मेयर कार्यालय ने इस पत्र का कोई लिखित जवाब नहीं दिया।

​बिना एजेंडा ‘अघोषित’ बैठक?

​नगर आयुक्त के स्पष्टीकरण न मिलने के कारण नगर निगम सचिवालय ने बैठक का कोई आधिकारिक एजेंडा जारी नहीं किया। बावजूद इसके, मेयर कार्यालय से पार्षदों को फोन कर बुलाया गया। नतीजा यह हुआ कि पार्षद तो आए, लेकिन कानूनी पेचीदगियों और विधानसभा कमेटी के दौरे के कारण अधिकारी नदारद रहे। बिना एजेंडा और बिना अधिकारियों के मेयर का डायस पर बैठना खुद कई सवाल खड़े कर गया।

रणनीतिक चूक या सोची-समझी चाल?

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मेयर 13 मार्च के पत्र का जवाब देतीं, तो शासनादेश के उल्लंघन की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ जाती। माना जा रहा है कि उन्होंने ‘चुप्पी’ को हथियार बनाया ताकि अधिकारियों की अनुपस्थिति को ‘अफ़सरशाही की मनमानी’ का रंग दिया जा सके। लेकिन अब यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है क्योंकि शासन स्तर पर प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) का मामला मेयर के पाले में जाता दिख रहा है।

विधानसभा कमेटी का दौरा बना ‘इवेसिव’ फैक्टर

23 मार्च को ही विधानसभा की एक उच्चस्तरीय कमेटी आगरा के दौरे पर थी। नगर आयुक्त ने इसकी पूर्व सूचना मेयर को दी थी। वरिष्ठ अधिकारियों की वहां मौजूदगी अनिवार्य थी, ऐसे में बिना एजेंडा वाली बैठक में अधिकारियों का न आना एक प्रशासनिक मजबूरी भी थी, जिसे सदन में ‘निंदा प्रस्ताव’ का आधार बना दिया गया।

गेंद अब मुख्यमंत्री के पाले में

​मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह अब इस मामले को मुख्यमंत्री के समक्ष ले जाने की तैयारी में हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय केवल अफ़सरशाही की शिकायत सुनेगा या उस 13 मार्च के पत्र और 2022 के शासनादेश की फाइलों को भी खंगालेगा?

आगरा नगर निगम का यह गतिरोध विकास कार्यों पर ब्रेक लगा रहा है, और अब देखना यह होगा कि लखनऊ से इस ‘ईगो वॉर’ पर क्या फैसला आता है।

Dr. Bhanu Pratap Singh