हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बेगुनाहों को जेल भेजने वाले पुलिस अफसरों से होगी वसूली, अवैध हिरासत पर ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजे का आदेश

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प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति को आठ दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को छह सप्ताह के भीतर पीड़ित को दो लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि राज्य सरकार पहले अदा करेगी और बाद में जिम्मेदार अधिकारी से इसकी वसूली की जाएगी।

प्रति दिन 25 हजार रुपये के हिसाब से तय हुआ मुआवजा

अदालत ने यह राशि अवैध हिरासत के प्रत्येक दिन के लिए 25,000 रुपये की दर से निर्धारित की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार यह राशि पहले पीड़ित को अदा करे और बाद में सहायक पुलिस आयुक्त (बारा), प्रयागराज के खिलाफ विभागीय जांच पूरी होने के तीन माह के भीतर उससे इसकी वसूली करे।

14 सितंबर तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट

मंसूर अहमद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 14 सितंबर तक प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट दाखिल नहीं होने की स्थिति में पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। याचिका के अनुसार, 19 मार्च 2026 की रात खीरी थाने में एसएचओ कृष्ण मोहन सिंह, उपनिरीक्षक उमेश सिंह और कांस्टेबल अंकित सिंह और त्रिभुवन पांडेय याचिकाकर्ता मंसूर अहमद के घर में जबरन घुसे और उसे थाने ले गए।

घर से उठाकर थाने ले जाने का आरोप

परिजनों का आरोप है कि गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया और हिरासत के दौरान उनके साथ मारपीट की गई। याचिकाकर्ता को रिहा नहीं किए जाने पर 23 मार्च को यह याचिका दायर की गयी। पुलिस ने अपने जवाब में कहा कि शांति भंग की आशंका से संबंधित मामले में आवश्यक कार्रवाई की गई थी। इस मामले में हिरासत में लिया गया व्यक्ति शांति बनाए रखने के लिए निजी बॉन्ड नहीं भरता तो कानून के मुताबिक उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है।

अधिकारों का किया गलत इस्तेमाल

हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने निजी मुचलका भरने से इनकार किया था। अदालत ने आठ जून के अपने आदेश में कहा, ”प्रयागराज कमिश्नरेट में यह चौकाने वाली स्थिति है। पुलिस आयुक्त को एक मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए हैं जिसका बुरी तरह से गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।”

गाजियाबाद के मामले का भी किया उल्लेख

उच्च न्यायालय ने कहा, ”इस अदालत ने गाजियाबाद कमिश्नरेट से जुड़े एक मामले में भी इसी तरह की स्थिति देखी है जहां चंद्रपाल सिंह बनाम राज्य सरकार के मामले में पुलिस आयुक्त द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग किया गया।” अदालत ने कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और उन पर जुर्माना लगाने के भी निर्देश दिए हैं।

Dr. Bhanu Pratap Singh