भारत सरकार गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करे
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Agra, Uttar Pradesh India Bharat.
वैदिक सूत्रम रिसर्च संस्था के चेयरमैन
पं प्रमोद गौतम, जो भारत के नास्त्रेदमस के नाम से सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हैं, उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया कि गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग
भारतवर्ष के अधिकांश राज्यों में जोर पकड़ रही है।
कई हिंदूवादी संगठनों ने गाय को राष्ट्रीय सम्मान देने के लिए देशव्यापी अभियान शुरू किया है।
इसके तहत 26 अप्रैल 2026 तक अर्थात 15 दिनों तक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया और
27 अप्रैल 2026 को लगभग 5000 तहसीलों में तहसीलदारों को ज्ञापन सौंपे गए।
पं प्रमोद गौतम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि
“अहिंसा परमो धर्म” जैसे आदर्शों और नीतियों वाले देश में गाय की हत्या कहाँ तक उचित है,
इस पर हम सभी को गंभीरता से मनन करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि क्या हम करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ मांस का परित्याग नहीं कर सकते?
गाय का दूध हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी पीते हैं, इसलिए गाय को बचाना बहुत जरूरी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि अलग-अलग राज्यों में कानून बनाने की बजाय भारत सरकार को
गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करना चाहिए। इससे गौ हत्या पर रोक लगेगी और
देशभर में एक सख्त कानून लागू होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि गाय को किसी धर्म विशेष से नहीं जोड़ा जाना चाहिए,
बल्कि हमें धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर गौ संरक्षण के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।
बृज क्षेत्र में अभियान:
वैदिक सूत्रम रिसर्च संस्था की उत्तर प्रदेश की मुख्य संयोजिका एवं
अखिल भारत हिन्दू महासभा मथुरा अध्यक्ष
सुश्री छाया गौतम
ने सम्पूर्ण बृज क्षेत्र में 15 दिनों तक हस्ताक्षर अभियान चलाया।
27 अप्रैल को मथुरा सदर तहसील में सैकड़ों गौ भक्तों के साथ
तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा गया।
सुश्री छाया गौतम ने कहा कि वर्तमान समय में
जब विश्व में हिंसा बढ़ रही है, तब महावीर स्वामी के “जियो और जीने दो”
सिद्धांत को अपनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने अपील की कि भारत सरकार समस्त हिन्दू समाज की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए
गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा प्रदान करे।
संपादकीय: आस्था, संवेदना और संविधान के बीच—गौ माता पर राष्ट्रीय बहस की ज़रूरत
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक रही है। सदियों से भारतीय समाज में गाय को “माता” का दर्जा दिया गया है—यह भावनात्मक जुड़ाव हमारी संस्कृति की गहराई को दर्शाता है। ऐसे में समय-समय पर उठती यह मांग कि गौ माता को “राष्ट्र माता” घोषित किया जाए, केवल धार्मिक आग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय भी बन जाती है।
हाल के अभियानों और हस्ताक्षर आंदोलनों से स्पष्ट है कि देश के एक बड़े वर्ग में यह भावना गहरी है। उनके लिए यह केवल सम्मान का प्रश्न नहीं, बल्कि संरक्षण और सुरक्षा का मुद्दा भी है। उनका तर्क है कि यदि गाय को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष दर्जा दिया जाए, तो इसके संरक्षण के लिए एकसमान और सख्त कानून बन सकेगा, जिससे अवैध कटान और क्रूरता पर रोक लगेगी।
लेकिन दूसरी ओर, यह मुद्दा जितना भावनात्मक है, उतना ही संवेदनशील भी। भारत एक बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक राष्ट्र है, जहाँ अलग-अलग समुदायों की अपनी-अपनी परंपराएँ और जीवनशैली हैं। ऐसे में किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को राष्ट्रीय दर्जा देना एक व्यापक संवैधानिक और सामाजिक बहस की मांग करता है। सवाल यह भी है कि क्या ऐसा कदम समाज में समरसता को मजबूत करेगा या कहीं नए विवादों को जन्म देगा?
गौर करने वाली बात यह भी है कि गाय के संरक्षण का प्रश्न केवल कानून से हल नहीं होगा। इसके लिए ठोस जमीनी प्रयासों की आवश्यकता है—जैसे गौशालाओं की बेहतर व्यवस्था, किसानों को आर्थिक सहायता, और पशुपालन को लाभकारी बनाना। जब तक गाय को पालने वाले किसान को उसका उचित लाभ नहीं मिलेगा, तब तक संरक्षण की बात अधूरी रहेगी।
अहिंसा और करुणा भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य हैं। “जियो और जीने दो” का सिद्धांत केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। यदि इस भावना को व्यापक रूप से अपनाया जाए, तो किसी भी जीव के प्रति हिंसा स्वतः कम हो सकती है।
अंततः, यह विषय केवल “घोषणा” का नहीं, बल्कि “दृष्टिकोण” का है। सरकार को चाहिए कि वह सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और व्यावहारिक निर्णय ले। साथ ही समाज को भी चाहिए कि वह भावनाओं के साथ-साथ विवेक का सहारा ले, ताकि देश की एकता और विविधता दोनों सुरक्षित रह सकें।
गाय के प्रति सम्मान बना रहे—यह हमारी संस्कृति की खूबसूरती है। लेकिन यह सम्मान ऐसा हो जो पूरे समाज को साथ लेकर चले, न कि उसे विभाजित करे।
डॉ भानु प्रताप सिंह, संपादक
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