पासी समाज का गौरवशाली इतिहास -अंशुल वर्मा पूर्व सांसद हरदोई

लेख

नई दिल्ली, फरवरी 07: मदारी पासी आज भी अवध के लोकगीतों और कथाओं में जीवित हैं, लेकिन मुख्यधारा इतिहास में उन्हें कम ही स्थान मिला क्योंकि राष्ट्रवादी इतिहास संभ्रांतवादी नेताओं पर केंद्रित रहा। आंदोलन ने किसान अधिकारों की बहस को मजबूत किया, जो स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों में योगदान दिया। हालांकि, इसका हिंसक स्वरूप और दमन ने दिखाया कि औपनिवेशिक शासन कितना क्रूर था।

मदारी पासी का जन्म सन 1860 में उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मोहनजगंज गाँव में हुआ था। उनके पिता मोहन पासी एक गरीब किसान थे। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के धूल-धूसरित खेतों में जन्मे एक साधारण किसान पुत्र, पासी जाति के उस योद्धा की कहानी, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अनकही पीड़ा और आग का प्रतीक बन गया। ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूर नजर में “अस्पृश्य” और “अपराधी जनजाति” ठहराई गई उनकी जाति के बावजूद, उन्होंने 1921-1922 में अवध की मिट्टी में ईका आंदोलन (एकता आंदोलन) की जड़ें बोईं—एक ऐसा विद्रोह जो किसानों की टूटी कमर, भूखी आँखों और जमींदारों की ज्यादतियों (उच्च लगान, बेगार, नजराना) के खिलाफ खड़ा हुआ, जैसे कोई दबी हुई चिंगारी आग बनकर भड़की।

पासी जाति मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर निर्भर थी, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें “अपराधी” घोषित कर रखा था, जिससे उन्हें सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। मदारी पासी ने युवावस्था में पशुपालन शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति सुधारी, जिसमें उन्होंने काफी संख्या में पशुधन प्राप्त किया। हालांकि, वे हमेशा किसानों की दुर्दशा से प्रभावित रहे, विशेष रूप से तालुकदारों और जमींदारों द्वारा लगाए जाने वाले उच्च किराए और अवैध करों से।

गांधीवादी टोपी सिर पर सजाकर लेकिन धनुष-बाण हाथ में थामे मदारी ने जाति की जंजीरें तोड़ीं, हिंदू-मुस्लिम किसानों के दिलों को जोड़ा, “स्वदेशी” और “स्वराज” के नारों से अवध की हवाओं को गुंजाया। असहयोग आंदोलन की छाया में जन्मा यह संघर्ष उनकी करिश्माई अगुवाई में हिंसक लावा बनकर फूटा, जमींदारों की हवेलियों को थरथराया और ब्रिटिश तख्त को चुनौती दी—निचले वर्गों की दबी सिसकियों को आवाज देकर, सशक्तिकरण की एक अमर मशाल जलाई।

ऐतिहासिक रूप से, मदारी का संघर्ष औपनिवेशिक भारत में किसान आत्माओं का करुण जागरण था, जो संभ्रांतवादी इतिहास की चमकदार किताबों से हाशिए पर धकेल दिया गया—क्योंकि यह महलों की नहीं, झोपड़ियों की क्रांति थी। राष्ट्रीय महत्व में, उन्होंने ग्रामीण भारत की आहों को स्वतंत्रता संग्राम में गूँजाया, भूमि सुधारों की नींव में अपना खून मिलाया, दलित-पिछड़े वर्गों के सीने में विद्रोह की चिंगारी सुलगाई—एक ऐसा शेर जो जंगलों की ओट में 1931 तक लड़ा, कभी घुटनों पर नहीं आया। आज भी अवध के लोकगीतों में उनकी धड़कनें गूँजती हैं, हमें सिखाती हैं कि आजादी की कीमत केवल स्याही की नहीं, बल्कि आम आदमी के आंसुओं और बलिदान की कहानी है।

ईका आंदोलन का उदय और नेतृत्व

ईका आंदोलन की शुरुआत 1921 के अंत में हरदोई, बाराबंकी, बहराइच और सीतापुर जिलों में हुई। यह मूल रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और खिलाफत आंदोलन द्वारा शुरू किया गया किसान विद्रोह था, जो असहयोग आंदोलन का हिस्सा था। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य जमींदारों और तालुकदारों द्वारा लगाए जाने वाले उच्च किराए, अवैध लेवी (जैसे नजराना, बेगार) और किसानों के शोषण के खिलाफ था। मदारी पासी ने 1921 के अंत में आंदोलन का नेतृत्व संभाला और इसे हिंसक मोड़ दिया, जिससे यह असहयोग आंदोलन से अलग हो गया क्योंकि मदारी गांधीवादी अहिंसा के सिद्धांतों का पालन नहीं करना चाहते थे।

मदारी ने सभी जातियों (पासी, कुरमी, ब्राह्मण, आदि) और धर्मों (हिंदू, मुस्लिम) के किसानों और छोटे जमींदारों को एकजुट किया। उन्होंने “स्वदेशी” और “स्वराज” के नारे लगाए, और आंदोलन को राष्ट्रीय रंग दिया। एक रणनीति के तहत, उन्होंने चार आने की टिकट बेचीं, जिससे टिकट धारकों को “स्वराज” प्राप्त होने पर जमीन का हिस्सा मिलने का वादा किया गया। आंदोलन के दौरान, किसानों ने जमींदारों, करिंदों और तालुकदारों पर हमले किए, उन्हें उनके घरों में कैद किया और संपत्ति जब्त की। ब्रिटिश समाचार पत्रों ने इस विद्रोह को कवर किया, जो जमींदारों और तालुकदारों और औपनिवेशिक शासन को हिला देने वाला था।

ईका आंदोलन ने भारतीय समाज, विशेष रूप से अवध क्षेत्र में गहरा प्रभाव डाला। यह न केवल किसान विद्रोह था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बना।

आंदोलन ने निचली जातियों (जैसे पासी, कुरमी) और विभिन्न धर्मों के बीच वर्ग-आधारित एकता कायम की, जो औपनिवेशिक भारत में दुर्लभ थी। मदारी पासी ने जाति की दीवारें तोड़ीं और किसानों को शोषण के खिलाफ एकजुट किया, जो बाद के किसान आंदोलनों (जैसे किसान सभा) के लिए प्रेरणा बना।

मदारी पासी “अस्पृश्य” जाति से थे, फिर भी उन्होंने जमींदारों और तालुकदारों और ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। यह निचली जातियों के लिए अवज्ञा का प्रतीक बना, जो मुख्यधारा राष्ट्रवादी इतिहास में अक्सर हाशिए पर रखा जाता है। आंदोलन ने दलित और पिछड़े वर्गों में आत्मविश्वास जगाया और सामाजिक न्याय की मांग को मजबूत किया।

ईका शपथ

ईका आंदोलन में शामिल होने वाले किसानों द्वारा ली गई शपथ, जो धार्मिक अनुष्ठान के साथ थी। इसमें एक गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरकर गंगा का प्रतीक बनाया जाता था, और पंडित द्वारा प्रार्थना के साथ शपथ ली जाती थी। शपथ के मुख्य बिंदु थे:

1. अवैध रूप से निकाले जाने पर खेत नहीं छोड़ना।

2. केवल रिकॉर्डेड किराया देना।

3. किराए की रसीद के बिना भुगतान न करना।

4. बिना भुगतान के बेगार न करना।

5. हरि और भूसा का भुगतान न करना।

6. अपराधियों की मदद न करना।

7. जमींदारों के अत्याचार का विरोध करना।

8. विवादों को पंचायत में सुलझाना।

किसान सभा प्रतिज्ञा

ईका आंदोलन से पहले अवध किसान सभा द्वारा मई-जून 1920 में तैयार की गई प्रतिज्ञा, जो ईका शपथ की पूर्ववर्ती थी। इसमें 8 बिंदु थे, जैसे सत्य बोलना, अत्याचार का विरोध करना, अवैध कर न देना, और पंचायत से विवाद सुलझाना। ईका आंदोलन में इसे अपनाया गया और विस्तारित किया गया।

Report on the Administration of the United Provinces of Agra and Oudh, 1921-22 (Allahabad, 1922), पृष्ठ 31-32; बाबा रामचंद्र के संग्रह (Nehru Memorial Museum & Library)।

यह दस्तावेज आंदोलन की निरंतरता दिखाता है, जहां किसान सभा से ईका तक संक्रमण हुआ।

ब्रिटिश प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए। जून 1922 में मदारी पासी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन वे जंगलों में छिपकर विद्रोही जीवन जीते रहे। आंदोलन 1922 तक चला, लेकिन दमन से समाप्त हो गया। मदारी पासी की मृत्यु 1931 में भूमिगत रहते हुए हुई। वे कभी आत्मसमर्पण नहीं किए और किसानों के बीच लोक नायक बने रहे।

कुल मिलाकर, मदारी पासी का जीवन और आंदोलन भारतीय इतिहास में निचले वर्गों के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो प्रमाणिक दस्तावेज़ों से सिद्ध होता है।

समाचार पत्र क्लिपिंग्स

Englishman (Calcutta), 28 फरवरी 1922 – इसमें ईका आंदोलन के प्रसार का वर्णन है, जैसे हरदोई से अन्य जिलों में फैलना और किसानों द्वारा समानांतर शासन स्थापित करना।

Pioneer, 25 मई 1922 – मदारी पासी को शाह मदर का अवतार बताते हुए आंदोलन की धार्मिक अपील का जिक्र।

Government of India, Home Dept., Pol. Branch, File 862 of 1922 (National Archives of India, NAI); Police Abstract of Intelligence, 4 अक्टूबर 1925।

ये समकालीन रिपोर्ट्स हैं जो आंदोलन की घटनाओं को रियल-टाइम में रिकॉर्ड करती हैं।

अभिलेखागार दस्तावेज़

Uttar Pradesh State Archives (UPSA), U.P. General Administration Dept. (GAD) File 50/1921 – इसमें आयुक्त, लखनऊ डिवीजन से मुख्य सचिव, यूपी को 14 जनवरी 1921 का पत्र शामिल है, जो अवध रेंट एक्ट में संशोधन की आवश्यकता पर चर्चा करता है। साथ ही, V.N. Mehta का ‘Report on Agrarian Disturbances in Pratapgarh’ (1920), जो किसानों की शिकायतों (जैसे मुरदा फरोशी कानून) का विस्तार से वर्णन करता है।

ये सरकारी फाइलें आंदोलन की पृष्ठभूमि और ब्रिटिश प्रतिक्रिया को दर्शाती हैं।

स्मृतियां और मौखिक इतिहास (Memoirs and Oral Histories)

शिव वर्मा की अप्रकाशित आत्मकथा (Bhagat Singh Archives, New Delhi) – मदारी पासी के वनवासी जीवन, शपथ अनुष्ठानों और क्रांतिकारियों से संपर्क का वर्णन। जैदेव कपूर का मौखिक इतिहास ट्रांसक्रिप्ट (NMML) – आंदोलन में अल्हा-उदल गाथाओं का उपयोग और हिंदू-मुस्लिम एकता।

ये व्यक्तिगत खाते हैं जो आंदोलन की आंतरिक गतिशीलता को उजागर करते हैं।

ये उदाहरण ईका आंदोलन के प्रमुख दस्तावेज़ हैं, जो मुख्य रूप से ब्रिटिश अभिलेखों और भारतीय इतिहासकारों के कार्यों से प्राप्त हैं। पूर्ण दस्तावेज़ राष्ट्रीय अभिलेखागार (NAI), दिल्ली या उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार, लखनऊ में उपलब्ध हैं। अधिक विस्तार के लिए, ज्ञान पांडे के “Peasant Revolt and Indian Nationalism” जैसे अध्ययन उपयोगी हैं।

इस लेख को लिखने का अभिप्राय सिर्फ़ याद दिलाना है इतिहास से सीखने की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि उन नायकों को भी याद करना है जिन्होंने इस इतिहास का निर्माण किया था।

सदर नमन वीर मदारी पासी।

Dr. Bhanu Pratap Singh