मुंबई (अनिल बेदाग) : जब सांसारिक रंग फीके पड़ जाएँ और वैराग्य सबसे गहरा रंग बन जाए—तब जन्म लेता है ऐसा उत्सव, जो केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी स्पर्श करता है। मुंबई में पहली बार आयोजित हो रहे 64 दीक्षा महोत्सव के अवसर पर शुरू हुआ ‘संयम रंग उत्सव’ इसी आध्यात्मिक अनुभूति का सजीव उदाहरण बना। मंत्रोच्चार, भक्ति, वैराग्य और उत्साह से ओतप्रोत इस उत्सव ने पहले ही दिन यह स्पष्ट कर दिया कि यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मिक परिवर्तन का विराट पर्व है।
4 फरवरी को मुंबई में पहली बार आयोजित हो रहे 64 दीक्षा महोत्सव के उपलक्ष्य में सुबह 7 बजे 700 से अधिक साधु-साध्वीजी भगवन्तों ने विशेष रूप से निर्मित आध्यात्म नगरी में मंगल प्रवेश किया। यह दृश्य अपने आप में ऐतिहासिक था—जहाँ त्याग, तप और संयम सजीव प्रतीत हो रहे थे। इस प्रवेश यात्रा में देश के विभिन्न राज्यों से आए 64 दीक्षार्थी अपने पूरे परिवार के साथ सहभागी बने। परिवारों की आँखों में गर्व, भावुकता और आशीर्वाद के भाव स्पष्ट झलक रहे थे।
आध्यात्म नगरी का उद्घाटन अमेरिका निवासी राजेशभाई शाह द्वारा किया गया, जिन्होंने उदारतापूर्वक दान अर्पित कर दीक्षा मंडप के उद्घाटन का सौभाग्य भी प्राप्त किया।
इस अवसर पर आध्यात्म परिवार संस्था द्वारा जैन शासन के लिए किए गए विराट कार्यों को दर्शाने वाली विशेष प्रदर्शनी आम जनता के लिए खोली गई। प्रदर्शनी में मानव जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणादायक, कलात्मक और भावनात्मक प्रस्तुतियाँ श्रद्धालुओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती रहीं।
धर्म रक्षा, उत्साह और शौर्य का संदेश देने वाली जैन शासन शौर्यगाथा का भी इसी दिन शुभारंभ हुआ। प्रत्येक एक घंटे की प्रस्तुति में हजारों श्रद्धालु सहभागी बन रहे हैं और जैन इतिहास के गौरवशाली अध्यायों से साक्षात्कार कर रहे हैं।
उत्सव के पहले दिन दोपहर में 64 दीक्षार्थियों के दीक्षा उपकरणों की छाब सजाई गई, जो संयम पथ की तैयारी का प्रतीक बनी। इसके पश्चात दीक्षा वस्त्रों को केसरिया मंगल तिलक से रंगने का कार्यक्रम और दीक्षार्थियों के लिए मेंहदी रस्म संगीतपूर्ण और उल्लासमय वातावरण में संपन्न हुई।
संध्या समय आयोजित विशेष संध्या भक्ति श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रही। वहीं रात्रि में वैराग्य भाव से ओतप्रोत 64 मुमुक्षु रत्नों की वंदोली में हजारों लोगों ने भावपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। पूरा वातावरण त्याग, श्रद्धा और आत्मिक आनंद से सराबोर हो उठा। संयम रंग उत्सव ने अपने पहले ही दिन यह सिद्ध कर दिया कि जब भक्ति उत्सव बन जाए और वैराग्य उत्सव का केंद्र—तब वह आयोजन स्मृति नहीं, संस्कार बन जाता है।
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