​श्री प्रेमनीधि मंदिर में सखी भाव में नजर आए ठाकुरजी: काली घटा श्रृंगार और अलौकिक हिंडोला दर्शन से भाव-विभोर हुए भक्त

RELIGION/ CULTURE

आगरा। सावन की रिमझिम फुहारों, हरियाली और मल्हार के बीच गुरुवार को नाई की मंडी स्थित श्री प्रेमनीधि मंदिर में हिंडोला उत्सव के अंतर्गत ठाकुरजी के काली घटा सखी रूप दर्शन ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। काली घटा श्रृंगार में सजे ठाकुरजी को भव्य हिंडोले पर विराजमान कर भक्तों ने उनके अलौकिक स्वरूप के दर्शन किए। मंदिर परिसर में हरि नाम संकीर्तन और भक्ति संगीत से वातावरण भक्तिमय हो उठा।

ठाकुरजी के सखी रूप की छवि का वर्णन करते हुए दिनेश पचौरी ने “मुखचंद की उज्यारी, मृदुहास फंदिनी, मम मान सीख लीजे सुंदरी। कान्हा सखी रूप धरि, आए झूलन पर, छबि देखत मन मोहे री।।“… जैसे पदों को स्वर देकर भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित की।

मुख्य सेवायत हरिमोहन गोस्वामी और सुनीत गोस्वामी ने बताया कि ठाकुरजी का सखी रूप धारण कर हिंडोला झूलना मधुर भक्ति और निकुंज सेवा का अत्यंत भावपूर्ण प्रतीक है। सखी भाव में भगवान की प्रभुता से अधिक उनकी प्रेममयी, कोमल और सेवाभावी छवि का दर्शन होता है।

उन्होंने बताया कि ब्रज की भक्ति परंपरा में सखी भाव का संबंध नित्य विहार रस से है। गोपियों और सखियों का भाव भगवान के प्रति माधुर्य एवं सख्य प्रेम से जुड़ा है। सखी भाव का उद्देश्य केवल स्वयं आनंद प्राप्त करना नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम मिलन में आनंद पाना और स्वामिनी जी को सुख प्रदान करना है।

सखी रूप में ठाकुरजी का दर्शन स्वामिनी-प्रिय प्रीति का संदेश भी देता है। भगवान श्रीकृष्ण का अपना सुख भी श्रीराधारानी के प्रेम से जुड़ा है। सखी भाव इसी पूर्ण समर्पण को प्रकट करता है, जिसमें प्रभु स्वयं सेविका के कोमल भाव को स्वीकार करते हुए प्रेम की पराकाष्ठा का अनुभव कराते हैं।

मुख्य सेवायतों ने कहा कि पुरुषोत्तम भगवान का सखी रूप धारण करना अहंकार के शमन और पूर्ण समर्पण का आध्यात्मिक संदेश देता है। प्रभु का यह स्वरूप भक्त को सिखाता है कि वास्तविक भक्ति में प्रभुता का भाव नहीं, बल्कि प्रेम, विनम्रता और सेवा सर्वोपरि है।

सावन मास में हिंडोला उत्सव का विशेष महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि हरियाली, वर्षा, मल्हार और झूले ब्रज की प्रेममयी संस्कृति की स्मृति कराते हैं। सखी-सखियों का समाज जब ठाकुरजी के साथ झूला झूलता है तो उसका भाव जीव और ईश्वर के बीच की दूरी समाप्त कर प्रेम के एकाकार होने का होता है।

काली घटा श्रृंगार में ठाकुरजी का श्यामल स्वरूप, सखी भाव की मनमोहक छवि और पुष्पों से सुसज्जित हिंडोला श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा।

-up18News

Dr. Bhanu Pratap Singh